मंजुल भारद्वाज की कविता – अपने को मथती लेखनी

कविता

अपने को मथती लेखनी

मंजुल भारद्वाज

 

इंतज़ार कर रहा हूं

घड़ियां गिन रहा हूं

लिखते हुए सफ़र को

ठिठक कर देख रहा हूं

अतीत को वर्तमान के

आईने में जीते हुए

भविष्य का आईन

लिखने के लिए !

 

अपने को मथती लेखनी

कागज़ के कैनवास पर

अपने रंग बिखेर रही है

बिखरे रंगों की

सजावट

बनावट

लिखावट

के साथ जी रहा हूं

हर वो लम्हा

जहां

निराकार दृष्टि

अपने को सृष्टि में

साकार करती है!

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