त्रिभुवन की कहानी – बाघ से बड़ा बिलाव

कहानी

बाघ से बड़ा बिलाव

त्रिभुवन

यह राजस्थान की रेतीली सीमाओं से परे इस प्रदेश की उस कालखंड की कहानी है, जब पूरे इलाके में सरस्वती सहित कितनी ही नदियाँ बहती थीं और राजस्थान के जैसलमेर में समुद्र ठाठें मारता था। इस इलाके़ में एक काला पहाड़ था। उस पहाड़ की सबसे ऊँची चट्टान पर कभी एक बाघ बैठता था। वह बाघ जंगल का पहला निर्वाचित रखवाला था। जानवर कहते थे कि उसने घाटियों को रास्ते दिए, नदियों को बाँधों से जोड़ा, बर्फ़ में विद्यालय खुलवाए और जंगल को यह विश्वास दिया कि वह किसी शिकारी की जागीर नहीं, सबकी साझी धरती है।

बाघ बहुत समय तक उस चट्टान पर रहा। एक दिन वह चला गया; लेकिन चट्टान पर उसके पंजों के निशान रह गए।

बहुत वर्षों बाद उसी पहाड़ पर एक बिलाव पहुँचा। वह आकार में छोटा था, मगर उसके पीछे ढोल पीटने वाले सियार, संख्या गिनने वाले कौए और गाथाएँ गाने वाले वाले जीवों की पूरी सेना थी।

बिलाव प्रतिदिन चट्टान पर बैठता, मूँछें सँवारता और नीचे जंगल की ओर देखकर कहता :
“देखो, मैं भी वहीं बैठा हूँ जहाँ कभी बाघ बैठता था।”

एक दिन दरबारी लोमड़ी दौड़ती हुई आई और बोली, “महाराज! आज आपने बाघ का कीर्तिमान तोड़ दिया। आप उससे अधिक दिनों तक इस चट्टान पर बैठ चुके हैं। और वे एक पेड़ पर चढ़कर बिलाव महाराज के प्रशस्ति गान में एक टीवी चैनलनुमा जगह बनाकर प्रशस्तिगान करने लगी।”
बिलाव ने तुरंत पूरे जंगल में उत्सव घोषित कर दिया। देवदारों पर झंडे बाँधे गए। हिमनदों के पास नगाड़े बजाए गए। उल्लुओं से प्रशस्तियाँ लिखवाई गईं।

“बाघ से महान बिलाव! जंगल के इतिहास का सबसे विशाल प्राणी!”

इतने में एक बूढ़ा बारहसिंगा आगे आया। उसने पूछा, “महाराज, आपने बाघ से अधिक दिनों तक बैठने का रिकॉर्ड तोड़ दिया है, पर क्या आपने उससे अधिक दूर तक छलाँग भी लगाई?”
बिलाव चुप रहा।

बारहसिंगे ने फिर पूछा, “क्या आपकी दहाड़ उससे बड़ी है?”

बिलाव ने मुँह खोला, पर निकली केवल म्याऊँ।

“क्या आपके पंजे जंगल की रक्षा कर सकते हैं?”

बिलाव ने पंजे दिखाए। वे कालीन कुरेदने लायक थे।

बूढ़ा बारहसिंगा हँसा और बोला, “चट्टान पर बैठने की अवधि से कोई बाघ नहीं हो जाता।

कब्रिस्तान का पत्थर भी राजा से अधिक समय तक सिंहासन जैसी जगह पर पड़ा रह सकता है।”

यह सुनते ही दरबारी सियार चिल्लाए, “यह बाघ का एजेंट है! यह बिलाव की ऐतिहासिक उपलब्धि का अपमान कर रहा है!”

बारहसिंगे को जंगल छोड़ने का आदेश दे दिया गया।

उत्सव फिर शुरू हो गया। बिलाव के चित्र पहाड़ों पर टाँग दिए गए। इतिहास की नई पुस्तक छपी, जिसमें लिखा था; “बाघ नामक कोई प्राणी कभी था ही नहीं। वह वास्तव में एक छोटा बिलाव था, जिसका वर्तमान बिलाव ने रिकॉर्ड तोड़ दिया।”

उस रात बर्फ़ बहुत तेज़ गिरी। सारे जानवर अपनी गुफाओं में छिप गए। बिलाव चट्टान पर बैठा रहा; क्योंकि वह अपना रिकॉर्ड और लंबा करना चाहता था।

सुबह जंगल वालों ने देखा, चट्टान पर बर्फ़ का एक छोटा-सा ढेर था, जिसके बाहर केवल दो मूँछें दिखाई दे रही थीं।

लेकिन दरबारी घोषणा कर रहे थे : “महाराज हिमालय से भी ऊँचे हो गए हैं!”

उस प्रागैतिहासिक राजस्थान के बूढ़े आज भी बच्चों से कहते हैं, समय अवधियाँ कभी भी सिंहासन पर बैठे प्राणी की विशिष्टताएँ नहीं बदल सकतीं। बिलाव सौ वर्ष भागता रहे तो भी बाघ का एक सिंहावलोकन सम्मोहक होता है!

“सिंहासन पर बैठना ही बाघ होना नहीं है।” (तस्वीर ग्रोक के सौजन्य से)

त्रिभुवन के फेसबुक वॉल से साभार

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