पांच उंगलियां नहीं, एक अंगूठा और चार उंगलियां!
मंजुल भारद्वाज
आधुनिक, शिक्षित पीढ़ी अपने ऑफिस में हाज़िरी देते समय अंगूठा लगाती है, मशीन उस अंगूठे की पहचान करती है।
इस शिक्षित वर्ग को पूछो कि एक हाथ में कितनी उंगलियां होती है तो तपाक से उत्तर देता है पांच !
यही त्रासदी है शिक्षित वर्ग की । उसे पता ही नहीं शिक्षा का अर्थ क्योंकि सत्ता उसे शिक्षित नहीं शिक्षा के माध्यम से अपने अनुकूल बनाती है यानी सत्ता ने शिक्षा का अनुकूलन यानी appropriation कर दिया है। इस अनुकूलित शिक्षा से दृष्टिहीन वर्ग तैयार होता है पर कहने को शिक्षित !
विडम्बना यह है कि उंगलियां पांच होती हैं पर स्मार्टफ़ोन के उपयोग, बायोमेट्रिक जायदाद में अंगूठा लगाता है यह वर्ग ।
उंगलियां पांच नहीं होती , चार होती हैं और अंगूठा एक ।
एक अंगूठा और चार उंगलियां!
इस शिक्षित वर्ग को पूछो कि किसने किसका अंगूठा लिया था ? तो सिर खुजलाते हुए जवाब देता है एकलव्य का अंगूठा गुरु द्रोणाचार्य ने लिया था पर मूढ़ बुद्धि समझ नहीं पाता प्रश्न में अंतर्निहित अर्थ !
दूसरा सवाल पूछना पड़ता है अंगूठा क्यों लिया था? उंगलियां क्यों नहीं ली? फ़िर उत्तर मिलता है की धनुष बाण में अंगूठा प्रमुख होता है।
सिलसिला प्रश्न उत्तर का आगे बढ़ता है पर दृष्टि नहीं जगती !
गुरु द्रोणाचार्य कौन थे? किस वर्ण के थे ? एकलव्य किस वर्ण का था? यह वर्ण व्यवस्था आज भी है? संविधान लागू होने के बावजूद ! और आत्मघाती स्थिति यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर वर्णवादियों का कब्ज़ा है!
दरअसल अंगूठा आपकी पहचान है, आपका अधिकार है, आपका न्याय बोध है,आपका अस्तित्व है!
अंगूठा आपकी न्याय दृष्टि है,समता बोध है जो आपको शोषक और शोषित का फ़र्क करना सिखाता है। शोषक भावनाओं,परंपराओं की आड़ में आप से आपका अंगूठा दक्षिणा में मांग लेता है और मनुस्मृति में वो अधिकार से ले लेता है। यह अंगूठा है आपकी पहचान,मेहनत, संपत्ति!
उच्च वर्ण सदा से निम्न वर्ण के हक़,अस्तित्व और संपत्ति को छीनता आया है, एक तरह से उन्हें गुलाम बनाता आया है। और आज भी गुलाम बनाए हुए है नहीं तो वर्णवादी सरकार का समर्थन बहुजन क्यों करता?
संविधान और विज्ञान ने आपके अंगूठे की महत्ता को पहचाना है। आपके अंगूठे जैसा किसी दूसरे का अंगूठा नहीं है। इसलिए पांच उंगलियों के भ्रम से निकलिए और अपने न्याय और समता बोध को जगाइए !
