कहाँ गए वो दिन… जब बच्चे रिश्तों में बड़े होते थे?

कहाँ गए वो दिन… जब बच्चे रिश्तों में बड़े होते थे?

सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन बचपन कहीं पीछे छूट गया

 डॉ रीटा अरोड़ा

 

“दादी, एक कहानी सुनाओ ना…”

“पहले ये बताओ, आज स्कूल में क्या सीखा?”

दादी मुस्कुराईं, बच्चा उनकी गोद में सिर रखकर लेट गया।

कुछ ही देर में कहानी सुनते-सुनते उसे नींद आ गई।

आज वही बच्चा मोबाइल देखकर सोता है।

और दादी… वीडियो कॉल तक सीमित रह गई हैं।

समय बदल रहा है।

जीवन तेज़ हो गया है, सुविधाएँ बढ़ गई हैं और परिवार छोटे होते जा रहे हैं। लेकिन इस बदलाव के बीच सबसे बड़ा असर शायद बचपन पर पड़ा है।

एक समय था जब बच्चे केवल स्कूल से नहीं, घर से भी सीखते थे। दादा-दादी की कहानियाँ, माँ की आदतें, पिता का व्यवहार और परिवार का वातावरण ही उनके व्यक्तित्व की नींव बनते थे। बच्चे बिना समझाए बहुत कुछ सीख जाते थे – कैसे बात करनी है, बड़ों का सम्मान कैसे करना है और रिश्तों को कैसे निभाना है।

छोटी-सी बेटी अक्सर माँ का दुपट्टा ओढ़कर साड़ी की तरह पहन लेती थी। आईने के सामने खड़ी होकर बिल्कुल माँ जैसी चलने की कोशिश करती थी। कभी माँ की तरह रसोई में जाने का नाटक करती, तो कभी खिलौनों को डाँटते हुए कहती – “पहले खाना खा लो।”

उसे किसी ने सिखाया नहीं था। वह केवल देखकर सीख रही थी।

सुबह दादा जी पूजा करते थे, तो छोटा पोता भी उनके पास बैठ जाता था। कभी आँखें बंद करके हाथ जोड़ लेता, तो कभी आरती की घंटी बजाने की जिद करता।

उसे मंत्रों का अर्थ नहीं पता था, लेकिन घर की शांति और संस्कार उसके भीतर उतर रहे थे।

दादी जब शाम को आरती गाती थीं, तो छोटी बच्ची भी उनके पीछे-पीछे वही शब्द दोहराने की कोशिश करती थी। कई बार शब्द गलत होते थे, लेकिन भाव सच्चे होते थे। यही वो पल थे, जहाँ बच्चे केवल भाषा नहीं, संस्कृति भी सीखते थे।

यही बचपन की सबसे बड़ी सच्चाई है – बच्चे हमारी बातों से कम, हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।

अतीत में दादा-दादी केवल परिवार के सदस्य नहीं होते थे, बल्कि बच्चों के पहले शिक्षक होते थे। रात को सुनाई जाने वाली कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि उनमें जीवन की सीख छिपी होती थी। रामायण, महाभारत और लोककथाओं के माध्यम से बच्चे धैर्य, त्याग, सत्य और रिश्तों का महत्व समझते थे।

दादा-दादी की उपस्थिति बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा भी देती थी। उनके पास समय था, धैर्य था और अनुभव था। यही कारण था कि पहले घरों में अपनापन अधिक महसूस होता था।

लेकिन आज की वास्तविकता अलग है। न्यूक्लियर फैमिली और कामकाजी जीवनशैली के कारण अब बहुत कम बच्चे दादा-दादी के साथ बड़े हो पाते हैं। माता-पिता दोनों काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों का बड़ा हिस्सा स्क्रीन, स्कूल या केयरटेकर के साथ गुजरता है।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि कामकाजी माता-पिता होना गलत नहीं है। आज की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि कई परिवारों में दोनों का काम करना आवश्यक हो गया है। माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित भविष्य और अच्छी सुविधाएँ देना चाहते हैं। समस्या उनकी नीयत में नहीं, बल्कि समय और भावनात्मक जुड़ाव की कमी में पैदा होती है।

एक केयरटेकर बच्चे की देखभाल कर सकता है, लेकिन वह वह भावनात्मक रिश्ता नहीं दे सकता जो परिवार देता है। उसके लिए यह एक पेशा है, जबकि बच्चे के लिए वही वातावरण उसका बचपन बन जाता है।

धीरे-धीरे इसका असर बच्चों के स्वभाव पर भी दिखाई देने लगा है। आज कई बच्चे तकनीक से जुड़े हुए हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले महसूस करते हैं। उन्हें जानकारी बहुत है, लेकिन धैर्य कम है। वे जल्दी चिड़चिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर तनाव महसूस करते हैं और रिश्तों को लंबे समय तक निभाने में कठिनाई महसूस करते हैं।

इसका एक कारण यह भी है कि बच्चे अनजाने में वही सीखते हैं जो वे रोज़ देखते हैं। यदि घर में हर समय भागदौड़, तनाव और मोबाइल की दुनिया है तो वही उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। वहीं, यदि बच्चे कहानियों, बातचीत और परिवार के साथ समय बिताने के माहौल में बड़े होते हैं तो उनके भीतर भावनात्मक स्थिरता और अपनापन स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

आज सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि बच्चों के पास सुविधाएँ ज्यादा हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं सुविधाओं की इस दौड़ में रिश्तों की गर्माहट पीछे तो नहीं छूट रही।

बच्चों को हमेशा महंगे खिलौने याद नहीं रहते।

उन्हें याद रहता है –

किसने उनके साथ बैठकर खाना खाया,

किसने उनकी बातें सुनीं,

और किसने उन्हें बिना शर्त अपनापन दिया।

समाधान केवल अतीत को याद करने में नहीं, बल्कि वर्तमान में संतुलन बनाने में है। यदि दादा-दादी साथ नहीं रहते, तब भी उनकी कहानियाँ और संस्कार बच्चों तक पहुँचाए जा सकते हैं। माता-पिता चाहे कितने भी व्यस्त हों, यदि वे प्रतिदिन कुछ समय बच्चों के साथ बिना मोबाइल और बिना जल्दबाज़ी के बिताएँ, तो वही समय बच्चे के व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव बन सकता है।

क्योंकि अंततः सच्चाई यही है –

*बच्चों को बड़ा करने के लिए पैसा जरूरी है,*

*लेकिन अच्छा इंसान बनाने के लिए समय, संस्कार और रिश्तों की गर्माहट उससे भी ज्यादा जरूरी है।*

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