सोनिया गांधी की क़िताब
राजकुमार कुम्भज
सोनिया गांधी की प्रस्तावित क़िताब ‘बिलाँगिंग ए ज़र्नी ऑफ़ लव’ को छापने अथवा नहीं छापने को लेकर प्रकाशक की ओर से की गई बयानबाज़ी से देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं तथा अटकलों का माहौल गरमाया हुआ है.
इस समूचे प्रहसन में पुस्तक-लेखिका श्रीमती सोनिया गांधी का बयान आना इसलिए भी अनिवार्य हो जाता है;क्योंकि प्रकाशक की ओर से सार्वजनिक बयानबाज़ी की गई है.
पुस्तक की एक लाख प्रतियों का आर्डर,पुस्तक छपने से पहले ही आ गया है.अब ये सिर्फ़ एक सूचना मात्र नहीं है.
बिक्री बढ़ाने की ख़ातिर पुस्तक को चर्चा में ले आने के स्टंट किए जाना कोई नया मामला नहीं है.
प्रकाशक और लेखक के मध्य ऐसी कौन-सी बातें हैं,जिसे प्रकाशक ‘गोपनीयता’ बताकर ‘सनसनी’ बना रहे हैं?
जो क़िताब ‘जस की तस’ जब भारत के बाहर छप ही रही है,तो क्या वह भारत नहीं आएगी?
प्रकाशक ‘गोपनीयता’ बताकर ‘सनसनी’ फैलाते हुए एक लेखक के प्रति दोहरा किन्तु बेहद ही मासूमियतभरा व्यवहार क्यों दर्ज़ कर रहे हैं?
‘अघोषित सेंसरशिप’ के आरोप को ‘काल्पनिक’ अथवा ‘द्वेषपूर्ण’ समझकर ख़ारिज़ कर देना क्या अन्यथा नहीं हो सकता है?
मानाकि मुर्दे ग़वाही नहीं देते हैं,लेकिन जो ज़िंदा हैं,वे आख़िर कब तक ‘चुप रहने के अपराधी’ बने रह सकते हैं?
‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया और वो भी मरी हुई’ का आकलन अभी करना जल्दबाज़ी होगी.यह भी हो सकता है कि कोई ऐसा-वैसा ‘जिन्न’सामने आ बैठे,जिसकी वज़ह से असली-नकली चेहरों का तमाम ‘सौंदर्यशास्त्र’ ध्वस्त हो जाए?
लेकिन एक बात तय होती जा रही है कि ‘अघोषित सेंसरशिप’ का मामला भयभीत करने के प्रसंग और संदर्भ से ज़रा भी अछूता नहीं है.
सोनिया गांधी की प्रस्तावित क़िताब ‘बिलाँगिंग:ए जर्नी ऑफ़ लव’ अगर एक पारिवारिक-सामाजिक- राजनीतिक संस्मरण अथवा आत्म-विश्वासभरे संघर्षों की कोमलकांत विवरणिका साबित हुई,तो फिर क्या कीजिएगा?

लेखक- राजकुमार कुम्भज
