हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 128
प्रबुद्ध, तर्कशील और व्यापक सोच के साथ काम करने में सिद्धहस्त हैं रघुभूषण गुप्ता
सत्यपाल सिवाच
नरवाना निवासी रघुभूषण लाल गुप्ता उन व्यक्तियों में शामिल हैं जिन्हें उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और उत्तरदायी नागरिक की दृष्टि से याद किया जाता है। जबसे उनसे परिचय हुआ है तब से अब तक उनके प्रति सम्मान भाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया है। जितने भी लोग सामाजिक जनजीवन में अपना योगदान देते हैं वे आम आदमी से कुछ अलग और विशिष्ट तो होते ही हैं। उनमें से गुप्ता जी विशेष श्रेणी में गिने जाने के पात्र हैं, क्योंकि उनमें समग्रता के साथ घटनाक्रम को देखने-समझने और उसमें से रास्ता ढूंढने की योग्यता है। निस्संदेह, ऐसे लोग बहुत अधिक नहीं होते।
उनका जन्म 7.5.1959 को संगरूर में मामा जी के घर हुआ। उनके पिता जी श्री रामेश्वर दास शिक्षित एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों में गिने जाते थे। वे नायब तहसीलदार पद से रिटायर हुए थे। पिता जी व परिवार के संस्कारों और परिवेश का रघुभूषण लाल गुप्ता पर भी पड़ा। वे प्रतिभावान, प्रखर बुद्धि, कुशल प्रशासक एवं अच्छे वक्ता के रूप में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। वे असाधारण तर्कशक्ति से सम्पन्न होने के साथ-साथ अच्छे वक्ता भी हैं। उन्होंने बी.एस.सी., बी.एड., एम.ए., एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की।
फरवरी 1983 में वे अस्थायी रूप से विज्ञान अध्यापक नियुक्त हुए। दो माह बाद अप्रैल 1983 में वे सीधी भर्ती के जरिए नियमित आधार पर सेवा में आ गए। वे जनवरी 1998 को सीधी भर्ती से मुख्याध्यापक बने और जनवरी 2006 प्रिंसिपल पदोन्नत हो गए। दिनांक 31.5.2017 को वे प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। सन् 1984 में वे अध्यापक संघ से जुड़ गए और खंड नरवाना के सचिव चुने गए। सन् 1986 में उन्हें एक प्रतिभा सम्पन्न कार्यकर्ता के रूप में राज्य भर में पहचाना जाने लगा था। व्यक्तिवादी कार्यप्रणाली को चुनौती देने के बाद जब जीन्द 1986 में राज्य सम्मेलन आयोजित करवाया गया तो राज्य नेताओं को उनकी उम्दा समझ और बेहतरीन सांगठनिक क्षमताओं का पता चला।1990-94 तक जिला सचिव तथा उसके बाद राज्य में जोनल सचिव चुने गए। संगठनकर्ता के लिए सभी आवश्यक गुण और कौशल होने के कारण उन्होंने विशेष पहचान बना ली थी।
विशेषकर अध्यापकों के निजी लंबित मामलों को इकट्ठा करने का प्रपत्र बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। उनकी प्रेरणा से ही इसे राज्य स्तर पर भी प्रयोग में लाया जाने लगा। जिला स्तर तक अध्यापकों के मामलों के समयबद्ध निपटारे में उनके कौशल व प्रभाव को आज भी याद किया जाता है।
मुख्याध्यापक बनने के बाद वे हरियाणा राजकीय मुख्याध्यापक एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। प्राचार्य पदोन्नत होने हरियाणा स्कूल प्रिंसिपल एसोसिएशन जिला जीन्द के सचिव, हरियाणा स्कूल एजुकेशन ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव और गवर्नमेंट स्कूल प्रिंसिपल्ज एसोसिएशन की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रहे।
सन् 1984 से सेवानिवृत्ति तक सभी आंदोलनों में अग्रणी रहे। वे जो भी उत्तरदायित्व स्वीकार करते उसमें अपना अधिकतम देने का प्रयास करते। एक प्रकरण मुझे कलीराम खत्री ने बताया था। अध्यापक संघ के जिला सचिव के रूप में वे 1992 में जुलाना खण्ड का चुनाव करवाने गए। वहाँ अपेक्षा से कम अध्यापक आए तो उन्होंने चुनाव के लिए नई तिथि तय कर दी। इसकी सभी स्कूलों को औपचारिक सूचना दी गई। काफी प्रचार किया गया और अध्यापकों के अन्तर्मन को झिंझोड़ने का प्रयास किया।
कलीराम जी ने बताया वे उनकी इतनी गहरी लग्न और साफगोई से प्रभावित होकर खण्ड सचिव बनने को तैयार हुए। उनके साथ पूर्णमल दलाल खण्ड प्रधान बने। गुप्ता जी से यूनियन में सक्रिय होने का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा – ” अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की प्रवृत्ति विद्यार्थी जीवन में ही उनका संस्कार बन चुकी थी। उनकी सोच है कि संगठन से जुड़े बिना इस दिशा में ठोस काम नहीं किया जा सकता।” इस सम्बन्ध में पूर्व राज्याध्यक्ष ऋषिकांत शर्मा ने एक प्रकरण सुनाया। सन् 1987 में नरवाना हल्के में जाली वोट कटवाने के लिए रघुभूषण जी ने काफी संघर्ष और सफलता भी प्राप्त की। वे इस दौरान चौधरी देवीलाल के नजदीक आ गए थे।
रघुभूषण जी के बारे इतनी ही सूचनात्मक जानकारी देना नई पीढ़ी को एक ऊर्जावान एवं समर्पित शिक्षक तथा नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने वाले शख्स से परिचित रखना होगा। वे शिक्षक के रूप में सुपात्र, विषय की समझ रखने वाले और अपने ज्ञान को व्यवस्थित रूप से सहज बच्चों तक पहुंचाने में माहिर थे। उन्हें नियमों में बांधने की स्थिति कभी नहीं आई, क्योंकि वे स्वानुशासन में विश्वास रखते थे। संस्थान के मुखिया बनने पर उन्होंने स्टाफ से जो उम्मीद रखी, वह पहले अपने ऊपर लागू की। इस स्वभाव के चलते अपने साथियों ही नहीं, बल्कि अधिकारियों पर भी उनका नैतिक बल काम करता था। वे लीपापोती करने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि दोटूक और सटीक ढंग से विनम्रता व दृढ़ता से अपनी बात कहते थे।
उनकी योग्यता और शैक्षिक लगाव को देखकर पहले एस.डी.सीनियर सेकेंडरी स्कूल जीन्द और बाद में आर्य सीनियर सेकेंडरी स्कूल नरवाना के प्रबंधन ने उन्हें प्राचार्य नियुक्त किया। पिता जी की मृत्यु होने उन्हें घरेलू उत्तरदायित्व के चलते एस.डी. स्कूल छोड़ना पड़ा। आर्य स्कूल के प्रबंधक उनकी इन्तजार में ही थे। उन्होंने बताया कि दोनों जगह प्रबंधन ने उनकी अकादमिक स्वायत्तता का सम्मान किया। आर्य स्कूल इसलिए छूट क्योंकि स्कूल के संचालन को लेकर दो सोसायटियों का झगड़ा चल रहा है। अन्ततः उन्होंने सेवाभाव के लिए वकालत करना शुरू कर दिया। परिवार में उनकी धर्मपत्नी व एक बेटी है।

लेखकः सत्यपाल सिवाच
