कविता
कहलाती है माँ
राजकुमार कुम्भज
हथेलियों में नरम धूप
और पलकों पर सपनों की राख लिए
क़दम-क़दम नापती चलती है वह जो
कभी चिड़िया रही,पर नहीं, घर नहीं
हज़ारों-प्रहर, हज़ारों जन्मों का सफ़र
सोते-जागते, उठते-बैठते हर कहीं
धॅंसते ही जाते हैं फिर-फिर
पाँव-पाँव, गाँव-गाँव तीनों लोक
उसके भीगे इरादों में रहते हैं देवता
अँकुरित अन्न जैसे बॅंधी पोटली में
शोर बहुत है सरकारों की ओर से
पढ़ेगी बेटी तो बढ़ेगी बेटी
चूल्हा फूँकते हुए धुऍं में ऑंखें अपनी
खोती है,खोजती है रह-रहकर
मिलता नहीं है पता-ठिकाना
कच्चे धागे से दु:ख सिलती रहती है
खाती है बचा-खुचा सभी से छुपाकर
मुदित-मन मुस्काती है फिर हर सुबह
कहलाती है माँ
नन्हें-नन्हें हाथों के लिए कभी दस्ताने
और कभी रॅंग-बिरॅंगे स्वेटर बुनती रहती है
भूलते हुए स्वैग़ अपना.
