डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा – जिम्मेदारी थी या जीवनसाथी ?

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

 

लघु कथा

ज़िम्मेदारी थी या जीवनसाथी?

डॉ रीटा अरोड़ा

 

 

चालीस साल की शादी में पहली बार शरद जी की सुबह बिना चाय के हुई। पत्नी सुमित्रा तेज़ बुखार में बिस्तर पर थीं।

“सुमित्रा, आज चाय नहीं बनेगी क्या?”

“तबीयत ठीक नहीं है जी। आज आप ही कुछ बना लीजिए।”

“अरे, मुझे कहाँ आता है ये सब! तुम ही तो सँभालती आई हो।”

शरद जी रसोई में गए। चायपत्ती, चीनी, दवाइयाँ—कुछ भी ढूँढ़ नहीं पाए। असहाय होकर पत्नी के पास लौट आए।

“सुमित्रा, तुम भी तो नौकरी करती थीं। फिर घर-बच्चे, सब कैसे सँभाल लेती थीं?”

“जैसे-तैसे…” सुमित्रा ने आँखें फेर लीं।

“कभी बताया क्यों नहीं कि परेशानी होती है?”

सुमित्रा की आँखें भर आईं।

“बताया था जी, कई बार। लेकिन आप कहते थे, घर सँभालना पत्नी का फ़र्ज़ है। फिर कहना छोड़ दिया।”

शरद जी चुप रह गए।

“तुम मुझसे नाराज़ हो?”

“नहीं जी। नाराज़गी तो तब होती है, जब सामने वाले से कुछ उम्मीद बची हो।”

ये शब्द शरद जी को भीतर तक चुभ गए।

धीरे से बोले, “मैं जीवनभर तुम्हें अपना सहारा समझता रहा, कभी तुम्हारा सहारा नहीं बन पाया।”

सुमित्रा ने कोई जवाब नहीं दिया।

शरद जी उनका हाथ थामकर बोले, “आज से सीखूँगा, सुमित्रा। शायद बहुत देर कर दी…”

सुमित्रा की चुप्पी जैसे पूछ रही थी-“जिसे उम्रभर मेरा कर्तव्य कहते रहे, कभी उसे अपना फ़र्ज़ क्यों नहीं समझा?”

 

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