प्रगतिशील आंदोलन का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन – 1936

प्रगतिशील आंदोलन का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन – 1936

सज्जाद ज़हीर

 

मूल उर्दू से हिंदी अनुवाद : तनवीर हसन

प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणापत्र के ड्राफ्ट के छपने और दो-ढाई महीने तक भारत के अलग-अलग शहरों में संस्था की गतिविधियों से बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग में प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन से जुड़ाव और दिलचस्पी बढ़ने लगी. इसका नतीजा यह निकला कि अलग-अलग शाखाओं और उन लोगों ने जो प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन के समर्थक थे, एकमत होकर यह मांग की कि हमें अपना एक अखिल भारतीय सम्मेलन करना चाहिए, ताकि आंदोलन में हिस्सा लेने वाले एक-दूसरे से मिल सकें, देश की अलग-अलग भाषाओं की साहित्यिक स्थिति का जायज़ा लिया जा सके और केंद्रीय संस्था का विधिवत गठन हो सके.

इस काम में पहला क़दम इलाहाबाद की संस्था ने उठाया. हम अस्थायी तौर पर आंदोलन के केंद्र के रूप में काम करने लगे थे और अब हमारे सामने सबसे बड़ा काम प्रगतिशील लेखकों का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन करना था.

सम्मेलन करना बहुत बड़ी कला है. इसके लिए बड़ी कुशलता की ज़रूरत है. हमारे देश में चूँकि सम्मेलन बहुत होते हैं, इसीलिए देश के हर एक हिस्से में ऐसे लोग पैदा हो गए हैं जिनको पेशेवर सम्मेलनबाज़ कहा जा सकता है. ये लोग कुछ ही दिनों में जंगल में मंगल कर देते हैं. उन्हें शहर के उन सभी ठेकेदारों के नाम मालूम होते हैं जिनके यहाँ शामियाने, तंबू, कुर्सियाँ, मेज़ें, दरियाँ और सोफ़े किराये पर मिलते हैं. वो यह जानते हैं कि रौशनी के लिए बिजली सस्ती पड़ती है या गैस के हंडे. उन्हें मालूम होता है कि किस दुकानदार का लाउडस्पीकर हमेशा भाषण के बीच में खराब हो जाता है और किसका आख़िरी वक़्त तक भयानक आवाज़ें निकाल सकता है. फिर उन्हें इसका भी पता होता है कि बाहर से आने वाले प्रतिनिधियों (डेलीगेटों) और मेहमानों को शहर के किन-किन लोगों के सिर मढ़ा जा सकता है. कौन ऐसा दानी है जो उनको खाना खिलाने से भी मना नहीं करेगा, और कौन ऐसा है जो नाक-भौं सिकोड़ कर ही सही लेकिन एक-दो बिस्तर डालने की जगह दे देगा.

उन्हें शहर के हर एक कोने, दीवार के हर उस टुकड़े और बिजली के हर उस खम्भे का पता होता है जिस पर पोस्टर चिपकाना ज़रूरी है. वो उस समय से भी वाकिफ होते हैं जब जनता ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में सड़कों पर, होटलों में और चाय-घरों में मनोरंजन के लिए जमा होती है और जिसको तांगे पर लाउडस्पीकर से घोषणा करके और पर्चे बाँट कर होने वाले तमाशे में दिलचस्पी लेने के लिए फुसलाया जा सकता है. फिर सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग सम्मेलन के खर्चों के लिए चंदा जमा करने, क़र्ज़ लेने, उधार पर चीज़ें हासिल करने, किराये पर ज़्यादा से ज़्यादा सामान लेकर बाद में बिल बिलकुल न चुकाने या कम से कम चुकाने की कलाओं के माहिर होते हैं. ऐसे जानकारों में भी अच्छे और बुरे की पहचान की जा सकती है.

वो जिनका संबंध देश की बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों या सरकारी संस्थाओं से होता है, और वो जिनका संबंध उन ग़रीब संगठनों से है, जिनकी झोली हमेशा खाली रहती है. वो जिनके सम्मेलनों और सभाओं के लिए बड़े-बड़े पूंजीपतियों और अमीरों से मिलकर स्वागत समितियाँ बनती हैं, और वो जिनकी स्वागत समितियाँ अगर बनती भी हैं तो उसके सदस्यों की सदस्यता फ़ीस दो रुपये होने के बावजूद बहुतों को इसे चुकाने से छूट देनी होती है. पहले समूह के सम्मेलनों के बाद आम तौर से चंदे के हिसाब का झगड़ा खड़ा होता है और यह बात सुनी जाती है कि स्वागत समिति के फलां-फलां लोगों के यहाँ खुशहाली आ गई. दूसरे समूह वाले सम्मेलन के बाद आम तौर से क़र्ज़ देने वालों से मुँह छिपाते फिरते हैं और उस दिन का इंतज़ार करते हैं जब आखिरकार उन्हें दिवालिया समझ कर ठेकेदार, प्रेस वाले और दुकानदार उनका पीछा छोड़ देंगे.

1936 प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कॉन्फ्रेंस

2.
इलाहाबाद की संस्था के हम कुछ कार्यकर्ता (फ़िराक़, अहमद अली, शिवदान सिंह चौहान आदि) कामयाब सम्मेलन करने के इन दाँव-पेचों से लगभग पूरी तरह अनजान थे. संस्था के पंद्रह-बीस सदस्य हर हफ़्ते या दूसरे हफ़्ते कोई कहानी, कविता या लेख सुनने के लिए सभा में जमा तो हो जाते थे, लेकिन उनमें ज़्यादातर ऐसे थे जिनको आंदोलन के प्रति अभी तक गहरा लगाव पैदा नहीं हुआ था. कुछ ऐसे थे जिनकी खामोशी एक स्थायी प्रश्नवाचक वाक्य बनकर हमें परेशान करती थी. वो संस्था की गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए नहीं बल्कि उसके बारे में, और खास तौर पर उनमें शामिल होने वाली दो-चार महिलाओं के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए आते थे. कुछ ऐसे थे जो एक-दो बार शामिल होकर फिर नहीं आये. उन्होंने नियमित रूप से अपनी क्षमता और समझ के अनुसार शहर में कानाफूसी करनी शुरू कर दी कि यह आंदोलन बेकार और निरर्थक है, और बहुत से दूसरे आंदोलनों की तरह दो-चार दिन में ख़त्म हो जाएगा. कुछ लाल-बुझक्कड़ों ने यह भी कहना शुरू कर दिया कि यह लोगों को कम्युनिस्ट जाल में फँसाने की एक चाल है.

इन मुश्किलों के बावजूद हमने इलाहाबाद की संस्था के सामने सभी मामलों को पेश कर दिया. यह तय हो गया कि अखिल भारतीय सम्मेलन होना चाहिए. अप्रैल में लखनऊ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन होने वाला था, जिसकी अध्यक्षता के लिए जवाहरलाल नेहरू चुने गए थे. सबकी राय हुई कि उस समय लखनऊ में हमारा भी सम्मेलन आयोजित किया जाए. कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने के लिए या सिर्फ दर्शक के रूप में देश के हर हिस्से से लोग जमा होने वाले थे. हमने सोचा कि हमारे सम्मेलन में जो लेखक आएँगे, उनके लिए कांग्रेस का अधिवेशन एक और आकर्षण का कारण होगा. इसके अलावा यह भी था कि वामपंथी दलों से संबंध रखने वाले, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट और दूसरे प्रगतिशील विचारों के लोग वहां इस मौके पर होंगे. उनकी मौजूदगी और समर्थन से भी हमें फायदा पहुँच सकता था. उस समय तक कांग्रेस और वामपंथी प्रगतिशील दलों और लोगों में वह अंतर नहीं था जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद पैदा हुआ. सबकी नज़रें नेहरू की तरफ थीं कि वह कांग्रेस को सुधारवादियों के प्रभाव से निकालकर लोकतांत्रिक जन-राजनीति के रास्ते पर चलाने में प्रगतिशील और क्रांतिकारी ताकतों की मदद करेंगे और कांग्रेस के संगठन को धुरी बनाकर उसके चारों ओर बाहरी साम्राज्यवाद के खिलाफ संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चा बनाएँगे. प्रगतिशील साहित्य का आंदोलन हालाँकि राजनीतिक नहीं था, फिर भी हमारी नज़र में वह साम्राज्यवाद-विरोधी जन-मोर्चे का एक हिस्सा था.

आम राय यह हुई कि मुंशी प्रेमचंद से अध्यक्षता का अनुरोध किया जाए. हमारी इस राय से बंगाल, बम्बई, अहमदाबाद, लाहौर और दूसरी जगहों के सभी लोग सहमत हो गए. मुंशी प्रेमचंद बनारस में रहते थे और मैं संस्था के गठन और दूसरे मामलों के बारे में उनसे लगातार पत्र-व्यवहार करता रहता था. प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन से उनकी भी दिलचस्पी दिनों-दिन बढ़ रही थी. लेकिन उनकी और भी बहुत सी व्यस्तताएँ थीं. उस वक्त स्थिति यह थी कि हिंदी या उर्दू का कोई भी साहित्यिक सम्मेलन या सभा देश के किसी हिस्से में हो, मुंशी प्रेमचंद को उसका अध्यक्ष बनाने के लिए सब लोग दौड़ते थे. मुंशी प्रेमचंद चूंकि नेक, विनम्र और सौम्य स्वभाव के इंसान थे, इसलिए उनके बारे में बहुत से लोग इस गलतफहमी में रहते थे कि उनकी शोहरत और साहित्यिक सम्मान की आड़ लेकर अपने टेढ़े-मेढ़े उद्देश्यों को हासिल किया जा सकता है. मुंशी जी की उदारता और इंसानों की नेक नियति पर उनका भरोसा उन्हें अलग-अलग किस्म और राय के लोगों से मिलने-जुलने और उनके आंदोलनों और योजनाओं में हिस्सा लेने के लिए तैयार कर देता था.

लेकिन असाधारण बुद्धिमानी और आज़ाद-पसंदी और मानवता की तरफ उनका झुकाव और सच्चाई की खोज हमेशा उन्हें खोटे और खरे की परख में सहारा देते थे.

इसी वजह से उनके रचे हुए साहित्य में भी हमें सच्चाई तक पहुँचने, इंसान के आपसी रिश्तों और सामाजिक बदलावों और प्रेरणाओं के अंदरूनी कारकों को देखने की एक लगातार कोशिश पाई जाती है. जब वो सुधारवादी गांधीवादी दर्शन को स्वीकार भी करते हैं तो उस नज़रिए को बिना वजह सच्चा साबित करने के लिए वो सामाजिक हकीकत को छिपाते नहीं, और जब आखिरकार सामाजिक हकीकत को देखने से उन्हें एक हद तक सुधारवाद की कमियाँ समझने में मदद मिलती है तो वो ऐसे नतीजों की तरफ कदम बढ़ाते हुए हिचकिचाते भी नहीं, जिससे उनके पहले के विचारों का खंडन होता है, लेकिन हकीकत यही मांग करती है. प्रगतिशील आंदोलन से प्रेमचंद का जुड़ाव उनकी ज़िंदगी के अनुभव और देखने के तरीके और उनके साहित्यिक विकास का एक अनिवार्य और स्वाभाविक नतीजा था. अफसोस कि उनकी बेवक्त मौत के कारण इस विकास का पूरा होना संभव न हो सका.

जब मैंने मुंशी जी को प्रस्तावित सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए लिखा तो पहले उन्होंने असमर्थता ज़ाहिर की. उन्होंने लिखा कि इस वक्त उनके पास लाहौर के हिंदी सम्मेलन और हैदराबाद दक्कन की हिंदी प्रचार सभा की अध्यक्षता के निमंत्रण आए हैं. इसके अलावा मिस्टर कन्हैयालाल मुंशी के कहने पर वर्धा में गांधी जी एक अखिल भारतीय साहित्यिक सभा (भारतीय साहित्य परिषद) अप्रैल में ही करना चाहते हैं. उसमें भी उन्हें शामिल होना है. अच्छे संयोग से मुंशी प्रेमचंद के वो पत्र, जो उन्होंने मुझे इस बारे में लिखे थे, मेरे पास सुरक्षित रह गए, और वो ‘नया अदब’ (मार्च-फरवरी 1940) में प्रकाशित किए गए थे. 15 मार्च के खत में उन्होंने मुझे लिखा:

“अध्यक्षता की बात, मैं इसके योग्य नहीं. विनम्रता से नहीं कहता. मैं अपने में कमज़ोरी पाता हूँ. मिस्टर कन्हैयालाल मुंशी मुझसे बहुत बेहतर होंगे, या डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन. पंडित नेहरू तो बहुत व्यस्त होंगे, वरना वो बहुत उपयुक्त होते. इस मौके पर सभी राजनीति के नशे में होंगे और साहित्य से शायद ही किसी को दिलचस्पी हो. लेकिन हमें कुछ न कुछ तो करना है. अगर मिस्टर जवाहरलाल नेहरू ने दिलचस्पी दिखाई तो जलसा कामयाब होगा. मेरे पास इस वक्त भी अध्यक्षता के दो संदेश हैं. एक लाहौर के हिंदी सम्मेलन का, दूसरा हैदराबाद दक्कन की हिंदी प्रचार सभा का. मैं इंकार कर रहा हूँ, लेकिन वो लोग ज़िद कर रहे हैं. कहाँ-कहाँ अध्यक्ष बनूँगा. हमारी संस्था में कोई बाहर का आदमी अध्यक्ष हो तो ज़्यादा ठीक है. मजबूरी में तो हूँ ही. कुछ रोऊँ-गाऊँगा… और क्या लिखूँ. तुम फिर पंडित अमरनाथ झा को तो आज़माओ. उन्हें उर्दू साहित्य से दिलचस्पी है और शायद वो अध्यक्षता मंज़ूर कर लें.”
(15 मार्च 1936)

लेकिन एक-दो और खतों के बाद आखिरकार मुंशी प्रेमचंद ने हमारा अनुरोध मान लिया और मुझे लिखा:

“अगर हमारे लिए कोई योग्य अध्यक्ष नहीं मिल रहा है तो मुझे ही रख लीजिए. मुश्किल यही है कि मुझे पूरा भाषण लिखना पड़ेगा. मेरे भाषण में आप किन विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं, इसका कुछ इशारा कीजिए. मैं तो डरता हूँ मेरा भाषण ज़रूरत से ज़्यादा निराश करने वाला न हो. आज ही लिख दो ताकि वर्धा जाने से पहले इसे तैयार कर लूँ.”
(19 मार्च 1936)

अब यह बात अजीब लगती है कि प्रेमचंद ने हमारे सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए कन्हैयालाल मुंशी को अपने से बेहतर समझा था. इससे यह पता चलता है कि उस शुरुआती समय में हमारे और उनके विचारों में कई बातों में फर्क था. लेकिन हमें यह न भूलना चाहिए कि कन्हैयालाल मुंशी 1936 में एक राष्ट्रवादी और गुजराती भाषा के महत्वपूर्ण उपन्यासकार के रूप में हमारे सामने आए थे. जब दो-तीन साल बाद बॉम्बे प्रांत में वो कांग्रेस के गृह मंत्री बने और उन्होंने जनता की नागरिक आज़ादी छीनना शुरू की और पूंजीपतियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हड़ताली मज़दूरों पर गोली चलवाई, तब ही लोगों को उनके राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति से दिलचस्पी की असली हकीकत मालूम हुई. धीरे-धीरे मुंशी साहब ने कांग्रेस से भी दूरी बना ली और मालदार सांप्रदायिक लोगों से खुलेआम मिल गए. बाद में उन्हें दोबारा कांग्रेस में शामिल कर लिया गया. बहरहाल उस वक्त भी प्रगतिशील संस्था के ज़्यादातर सदस्य कन्हैयालाल मुंशी से अपने सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए अनुरोध करने को तैयार न थे. रह गए पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, तो देश के सम्मानित और प्रगतिशील राष्ट्रीय और शिक्षा के क्षेत्र के मार्गदर्शक होने के रूप में हम अपने आंदोलन के लिए उनकी हमदर्दी के इच्छुक ज़रूर थे जो हमें हासिल हो गई थी. लेकिन हमारी नज़र में लेखकों के सम्मेलन में लेखक की ही अध्यक्षता सबसे अच्छी थी.

अध्यक्षता का मामला तय हुआ तो हम दूसरे कामों में लगे. सवाल यह था कि सम्मेलन में होगा क्या? भाषण, प्रस्ताव या और कुछ भी? कुछ ऐसा महसूस होता था कि यह काफी नहीं है.

 

बाएं से : सुल्ताना जाफरी, इस्मत चुगताई, विश्वमित्र अदित, अली सरदार जाफरी, कृश्न चंदर, महेंद्र नाथ, मुमताज हुसैन, राजिंदर सिंह बेदी  (सामने- साहिर लुधियानवी, हबीब तनवरी)

3.
साहित्यिक सम्मेलन में साहित्यिक विषयों पर ही विचार-विमर्श और चर्चा होनी चाहिए. फिर हमारे विशाल देश में चौदह-पंद्रह बड़ी भाषाएँ हैं. हर एक को लाखों-करोड़ों लोग बोलते हैं और उनमें बहुमूल्य साहित्य मौजूद है. अखिल भारतीय सम्मेलन में इन सभी या इनमें से ज़्यादा से ज़्यादा भाषाओं के आधुनिक साहित्य और साहित्यिक विषयों पर लेख तैयार होने चाहिए. हमारे देश में आम तौर से पढ़े-लिखे लोग सिर्फ अपनी भाषा के साहित्य को जानते हैं, या अगर अंग्रेज़ी जानते हैं तो कुछ हद तक अंग्रेज़ी साहित्य को. उर्दू वाले को गुजराती साहित्य का पता नहीं, गुजराती वाले तेलुगु साहित्य से अनजान हैं. तमिल वाले बंगाली साहित्य से अनजान हैं, और बंगाली वाले अपनी भाषा के अलावा भारत की सभी भाषाओं के साहित्य से.

बहुत से उर्दू और हिंदी वालों में तो यह आपसी अज्ञानता, सांप्रदायिक भेदभाव के कारण अलगाव और नफरत की हद तक पहुँच गई है. हालाँकि ये दोनों एक ही क्षेत्र की भाषा के दो साहित्यिक रूप हैं और इनकी बोलियाँ एक ही हैं. अगर हमारे सम्मेलन के माध्यम से देश की अलग-अलग भाषाओं के लेखकों को एक-दूसरे के साहित्य से थोड़ी बहुत भी जानकारी और दिलचस्पी हो जाए, अगर हम यही जान लें कि इस देश की बड़ी-बड़ी भाषाओं में इस वक्त कौन सी साहित्यिक समस्याएँ सामने हैं, और साहित्य की धारा का रुख क्या है, तो यह एक बड़े अच्छे काम की शुरुआत होगी, और इससे हमारे आंदोलन को समग्र रूप से फायदा पहुँचेगा.

दूसरा काम संस्था के संविधान का ढांचा तैयार करना था, ताकि अखिल भारतीय केंद्रीय संगठन बन सके, और क्षेत्रीय तथा स्थानीय संस्थाओं के आपसी संबंध और संस्था की सदस्यता की शर्तों को तय किया जा सके. इस तरह संस्था के केंद्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय संगठन विधिवत लोकतांत्रिक नियमों पर स्थापित हो सकते थे.

तीसरा मुद्दा हमारी संस्था का दूसरे बाहरी साहित्यिक संगठनों से जुड़ने का था.

फिर हमारे सामने दो और सवाल थे जो राजनीतिक थे. पहले तो यह कि हमारे देश में बाहरी साम्राज्यवाद ने लिखने, बोलने और विचारों की आज़ादी के लोकतांत्रिक अधिकार पर तरह-तरह की पाबंदियाँ लगा रखी थीं. नागरिक आज़ादी पर इन पाबंदियों और पकड़ का देशभक्त लेखकों पर सीधा असर पड़ता था. प्रगतिशील अखबार, पत्रिकाएँ और किताबें हमेशा सरकारी दमन का शिकार होती रहती थीं, और जो सुविधाएँ लेखकों को एक आज़ाद देश में मिलनी चाहिए, वो हमारे यहाँ गायब थीं. इनकी मदद या इनका उत्साह बढ़ाना तो दूर की बात, लेखकों की एकता इस मामले में उनकी ताकत का कारण बन सकती थी और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कर सकती थी.

दूसरा सवाल यह था कि इस समय अंतर्राष्ट्रीय माहौल बड़ी तेज़ी से खराब हो रहा था. जर्मन और इतालवी फासीवाद दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की तरफ खींचे लिए जा रहा था. इतालवी फासीवाद ने एक शांतिप्रिय देश, इथियोपिया पर हमला कर दिया था.

राष्ट्र संघ इटली को इस आक्रामक कदम से रोकने में बिल्कुल असमर्थ रहा था. उधर साम्राज्यवादी जापान ने चीन पर हमला करके उसके उत्तरी इलाकों को हड़प लिया था और चीन में युद्ध जारी था. देशों की आज़ादी को इस बेदर्दी से छीनना, लोकतंत्र की हत्या, अंतर्राष्ट्रीय युद्ध जिसका मकसद यह हो कि सारी इंसानियत को खून-खराबे में धकेल कर कुछ साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया को आपस में नए सिरे से बाँट लें, ये सब सभ्यता और संस्कृति के लिए भयानक खतरे हैं और कोई समझदार लेखक जिसे अपनी कला और मानव जाति से लगाव है, इसे अनदेखा नहीं कर सकता. हमारे लिए यह ज़रूरी था कि देश के सभी लेखक और कलाकार, वैचारिक और राजनीतिक मतभेद के बिना राष्ट्रीय आज़ादी, लोकतंत्र, साम्राज्यवाद-विरोध और अंतर्राष्ट्रीय शांति के समर्थकों की कतार में खड़े हों और अपनी कलात्मक शक्ति, मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव की क्षमता को मानव समाज की उन बुनियादों को सुरक्षित और मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल करें जिस पर सभ्यता और संस्कृति का वो घर टिका है जिसका रहवासी हर एक लेखक और कलाकार है.

सम्मेलन का दफ्तरी काम हम इलाहाबाद से करते रहे. अलग-अलग जगहों से हमारे पास जो पत्र और जवाब आए, उनसे हमको इसका तो विश्वास हो गया कि सम्मेलन में शामिल होने के लिए देश के लगभग सभी बड़े साहित्यिक क्षेत्रों के लेखक आएँगे और सम्मेलन अगर ‘शानदार’ नहीं तो कम से कम लाभदायक ज़रूर होगा, और अगर हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के साहित्य पर विस्तृत रिपोर्टें पेश न हुईं, और चर्चाएँ न भी हुईं तो कम से कम इन अलग-अलग भाषाओं के आधुनिक साहित्य पर कुछ रौशनी तो ज़रूर ही पड़ेगी, और प्रगतिशील लेखकों के लिए आम रास्ता तो ज़रूर तय होगा, और अगर कोई बड़ा और मज़बूत साहित्यिक संगठन नहीं तो एक ऐसा ढाँचा तो ज़रूर बन जाएगा, जिसके आसपास भविष्य में नई साहित्यिक इमारत खड़ी की जा सकेगी.

जब सम्मेलन के शुरू होने में आठ-दस दिन रह गए तो केंद्रीय दफ्तर… यानी मैं… तीन-चार फाइलों के साथ इलाहाबाद से लखनऊ चला गया. उस वक्त तक लखनऊ में प्रगतिशील लेखकों की कोई स्थानीय शाखा नहीं थी और स्थानीय लोगों में सिवाय हमारे निजी दोस्तों या रिश्तेदारों, या दो-तीन यूनिवर्सिटी के छात्रों के कोई हमारा मददगार तक नहीं था. स्थिति यह थी कि हमारे पास सम्मेलन के खर्चों के लिए शायद सौ-सवा सौ रुपये से ज़्यादा न थे और न कोई स्वयंसेवक थे, न चपरासी, न क्लर्क. अभी तक हमें सभा करने के लिए कोई हॉल भी नहीं मिला था.

4.
मैं जब लखनऊ पहुँचा तो उसके एक-दो दिन के अंदर अमृतसर से डॉक्टर रशीद जहाँ और महमूद ज़फ़र भी आ गए. हम सबका ठहरना लखनऊ में वज़ीर मंज़िल में था. मेरे पिता का यह मकान उन दिनों सजा-सजाया लेकिन ज़्यादातर खाली पड़ा रहता था. वो खुद इलाहाबाद में रहने लगे थे. इस काफी बड़े मकान के एक हिस्से में मेरे बड़े भाई डॉक्टर सैयद हुसैन ज़हीर रहते थे. लेकिन दो-तिहाई हिस्सा खाली पड़ा था. डॉक्टर ज़हीर की खासियत यह है कि हर उस अच्छे काम या आंदोलन में, जिसे वो अच्छा या लाभदायक समझते हैं, बेधड़क उदारता और लगन के साथ मदद करने के लिए तैयार हो जाते हैं. हालाँकि वो पेशेवर वैज्ञानिक हैं और उनका ज़्यादातर समय रासायनिक शोध में बीतता है. मैं तो खैर उनका छोटा भाई था, लेकिन मेरे सारे दोस्त और प्रगतिशील लेखकों के सम्मेलन के कार्यकर्ता धीरे-धीरे वज़ीर मंज़िल में आकर टिकते गए और सब उनके मेहमान हो गए.

डॉक्टर ज़हीर और उनकी पत्नी को इन पर एतराज़ नहीं था कि हम (आखिर में कुल मिलाकर वज़ीर मंज़िल में दस-बारह लोग ठहरे हुए थे और उनके अलावा खाने और चाय के वक्त दो-चार लोग और भी आ जाते थे) मान न मान उनके मेहमान हो गए हैं और उन पर बोझ डाल रहे हैं. वो मुझे और मेरे मेहमानों को इस बात पर डांटते रहते थे कि हम खाना समय से नहीं खाते. पहले से यह नहीं बताते कि एक समय में कितने लोग खाना खाएँगे. कभी खाना बच जाता है और बर्बाद हो जाता है, और कभी कम पड़ जाता है.

महमूद ज़फ़र के आ जाने से यकीनन हमारे काम में व्यवस्था आ गई और हालाँकि मैं संस्था का अस्थायी महासचिव था, लेकिन वो स्वाभाविक रूप से इसके जनरल मैनेजर बन गए. उन्होंने सम्मेलन के कागज़ात, पत्रों और दस्तावेज़ों की अलग-अलग फाइलें बनाईं. काम को व्यवस्थित करके उनका प्रोग्राम बनाया, रोज़ का काम रोज़ सबको बांटने लगे और शाम के वक्त सारे कामों का एक-एक करके जायज़ा लेने लगे. हमेशा की तरह अपने ज़िम्मे सबसे ज़्यादा काम लिया और उसे समय पर और अच्छी तरह पूरा किया.

लखनऊ में तीन-चार हॉल हैं जहाँ आम तौर से सम्मेलन आयोजित होते हैं, सबसे अच्छी जगह कैसर बाग की बारादरी है. लेकिन अवध के राजाओं के उत्तराधिकारियों के रूप में इस पर अवध के ज़मींदारों की संस्था का कब्ज़ा है. हमने अपने कुछ नौजवान ज़मींदार दोस्तों के माध्यम से इसको हासिल करने की कोशिश की. लेकिन ज़मींदार संस्था के कर्ता-धर्ता पक्के अंग्रेज़ों के समर्थक और रूढ़िवादी लोग थे. उन्होंने शायद पुलिस से पूछताछ की हो और उन्हें यह सूचना दी गई हो कि प्रगतिशील एक ‘खतरनाक चीज़’ है. इसलिए हमें वहाँ से टका-सा जवाब मिल गया.

फिर गंगा प्रसाद वर्मा हॉल को हासिल करने की कोशिश हुई. वहाँ उन दिनों में शायद क्षत्रिय सभा या गौरक्षा किस्म का कोई सम्मेलन होने वाला था. आखिरकार हमने रफा-ए-आम हॉल हासिल करने के लिए भाग-दौड़ शुरू की. यह सुंदर इमारत लखनऊ के एक आधे-पागल नवाब ने देश को दे दी थी, ताकि इसमें सार्वजनिक सभाएँ और सम्मेलन हुआ करें. लेकिन वो प्रगतिशील नवाब साहब बरसों पहले मर चुके थे. अब वहाँ शहर के कुछ वकीलों और बैरिस्टरों ने एक क्लब बना लिया था और उसका हॉल बिलियर्ड और ताश खेलने और शराब पीने के लिए समर्पित हो चुका था. एक ज़माना था जब रफा-ए-आम में बड़े-बड़े ऐतिहासिक जलसे और सम्मेलन होते थे. यहीं पर पहले विश्व युद्ध के समय में होम रूल लीग की वह सभा होनी तय हुई थी, जिसे मिसेज़ एनी बेसेंट की गिरफ्तारी पर विरोध जताने के लिए शहर के राष्ट्रवादियों ने बुलाया था. लेकिन अंग्रेज़ सरकार ने उसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया था.

यह लखनऊ में अपनी तरह की पहली घटना थी. हथियारबंद पुलिस से रफा-ए-आम भर गया था और सारे शहर में ज़बरदस्त सनसनी फैल गई थी. 1920 में यहीं पर खिलाफत सम्मेलन हुआ जिसमें अली बंधुओं और देश के सभी बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया. इस मौके पर मौलाना मोहम्मद अली ने लगातार छह घंटे भाषण दिया था और रफा-ए-आम के अहाते में अंग्रेज़ी कपड़ों के बड़े-बड़े ढेर जलाए गए थे. इसके बाद यहीं पर असहयोग आंदोलन के दौरान कांग्रेसियों और खिलाफत वालों ने लिबरल पार्टी के सम्मेलन में हंगामा करके हॉल पर कब्ज़ा कर लिया था और उनके ही मंच से लिबरलों के खिलाफ प्रस्ताव पास करवाए थे.

हमारी किस्मत अच्छी थी कि वकीलों के वर्ग में कुछ प्रगतिशील भी थे. पंडित आनंद नारायण मुल्ला, हालाँकि प्रगतिशील साहित्यिक विचारों से कुछ मतभेद रखते थे, लेकिन वो एक अच्छे कवि, देशभक्त और साहित्य-प्रेमी इंसान थे. उनकी और कुछ अन्य लोगों की कोशिशों से रफा-ए-आम हॉल हमें मुफ्त मिल गया और हमारी सबसे बड़ी परेशानी दूर हो गई.

हमें इसकी भी फिक्र हुई कि अगर लखनऊ में विधिवत स्वागत समिति नहीं बनाई जा सकती तो कम से कम स्वागत समिति के नाम पर सौ-पचास टिकट बेच कर कुछ चंदा ही इकट्ठा हो जाए, और अगर पूरी समिति नहीं तो कम से कम स्वागत समिति का एक अध्यक्ष ही बना लिया जाए. हमने आपस में विचार-विमर्श किया और इस पद के लिए सबसे उपयुक्त चौधरी मोहम्मद अली साहब रुदौलवी को समझा. यूँ तो चौधरी साहब ज़मींदार हैं और अवध के अमीरों में से हैं, और वो हमसे एक पीढ़ी पहले के व्यक्ति हैं, लेकिन उनके अंदर कुछ अजीब आदतें जमा हो गई हैं जिनकी वजह से उनका व्यक्तित्व अवध की धरती की सबसे दिलचस्प हस्तियों में से एक है.

उनके शिष्टाचार और तौर-तरीके अवध के पुराने रईसों की तरह हैं. लेकिन उनकी सूरत, दाढ़ी-मूंछ साफ, गोरा रंग, आधुनिक अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त नौजवानों जैसी है. वो उर्दू लिखते हैं तो उसमें वो लचीलापन और मिठास, व्यंग्य और मज़ाक होता है जिससे पुराने लखनऊ की महक आती है. लेकिन बातें करने पर आ जाते हैं तो नीत्शे और मार्क्स, टैगोर और इकबाल एक तरफ, तो लैंगिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ फ्रायड और हैव्लॉक दूसरी तरफ उनके निशाने पर होते हैं.

बुज़ुर्गों और बड़ों के बीच होते हैं तो उनसे परलोक, संपत्ति और उनकी संतान की चर्चा करेंगे, और नौजवानों में होंगे तो यौन से जुड़े विषयों पर ऐसी शोधपूर्ण बातें करेंगे कि बड़े-बड़े रंगीन-मिज़ाजों की आँखें खुल जाएँ. अगर किसी महफिल में सुंदर औरतों और नौजवान लड़कियों की भीड़ हो तो वो उनके झुंड में यूँ पहुँच जाते हैं जैसे लोहा चुंबक से खिंचता है और पल-भर में अपने अजनबीपन को भूल कर उनसे ऐसी राज़ वाली बातें करने लगते हैं जो सिर्फ राजा इंदर अपनी परियों से करते होंगे. वो उर्दू साहित्य की बेहतरीन परंपराओं के जानकार और एक सुंदर लेखन शैली के मालिक थे और आधुनिक साहित्य से भी गहरी दिलचस्पी रखते थे. जब हमने उनसे अपनी स्वागत समिति की अध्यक्षता के लिए कहा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह अनुरोध उनसे किया गया. दिखावे के लिए नहीं बल्कि पूरी सच्चाई के साथ उन्होंने इससे अपनी असमर्थता यह कह कर जताई कि वो कभी किसी आंदोलन में शामिल नहीं हुए हैं और हर तरह के राजनीतिक झगड़ों और हंगामों से दूर भागते हैं. लेकिन हमारे, ख़ास तौर पर रशीद जहाँ की ज़िद पर वो ‘नहीं’ भी न कर सके और आखिर में राज़ी हो गए. इसके बाद सबसे पहला काम उन्होंने यह किया कि बहुत माफी मांगते हुए चुपके से सौ रुपये हमें दान भी दे दिया. यह हमारे लिए एक अप्रत्याशित वरदान था. चौधरी साहब को इसकी शर्मिंदगी थी कि यह रकम बहुत कम थी, लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि हमें सम्मेलन के लिए किसी एक व्यक्ति से दस रुपये से ज़्यादा चंदा नहीं मिला था और हम कुल मिलाकर सौ-डेढ़ सौ रुपये लेकर अखिल भारतीय सम्मेलन करने चले थे.

हमने सम्मेलन के हॉल के लिए कोई दो-तीन सौ कुर्सियाँ किराये पर ले तो लीं, लेकिन अब यह फिक्र सताने लगी कि हॉल भरेगा भी या नहीं. देश के अलग-अलग हिस्सों से जिन प्रतिनिधियों के आने की हमें सूचना मिली थी, उनकी संख्या मुश्किल से तीस-चालीस रही होगी. दो बंगाल से, तीन पंजाब से, एक मद्रास से, दो गुजरात से, छह महाराष्ट्र से और शायद बीस-पच्चीस संयुक्त प्रांत (यूपी) के अलग-अलग हिस्सों से. लखनऊ में उस वक्त तक हमारा आंदोलन बिल्कुल शुरू ही नहीं हुआ था. इलाहाबाद में तो फिराक, एजाज़ हुसैन, अहमद अली आदि यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे, और उनके प्रभाव में छात्रों की अच्छी-खासी संख्या हमारी सभाओं में आ जाती थी. यहाँ यूनिवर्सिटी में भी हमारा कोई न था.

उस वक्त तक डॉक्टर अलीम, डॉक्टर रामविलास शर्मा, एहतेशाम हुसैन और आल अहमद सुरूर लखनऊ यूनिवर्सिटी में नियुक्त नहीं हुए थे. हमारी साधनहीनता और कमज़ोरी का इससे बड़ा सुबूत क्या होता कि लखनऊ जैसे साहित्यिक शहर में हमारे सम्मेलन में दिलचस्पी लेने वाले गिनती के हों. हमें इसका एहसास था कि अगर ऐसा हुआ था तो यह लखनऊ वालों की बदज़ौकी या रूढ़िवादिता के कारण नहीं, बल्कि इस वजह से था कि उन्हें हमारे आंदोलन या सम्मेलन के बारे में बताया नहीं गया है और उनमें सम्मेलन के लिए दिलचस्पी नहीं पैदा की गई है. कुछ दिनों में कुछ आदमी इस कमी को किस तरह पूरी कर सकते थे? फिर भी हमने हार नहीं मानी.

यूनिवर्सिटी में कुछ छात्रों के ज़रिये हमने पर्चे बंटवाए, और जब सम्मेलन के दो दिन पहले बड़े पोस्टर छप कर आ गए तो महमूद ज़फ़र अपने साथ दो और साथियों को लेकर शहर के मुख्य हिस्सों, नुक्कड़ों और चौराहों पर रात भर उन्हें चिपकाते फिरे. रशीदा लखनऊ में कुछ साल पहले डॉक्टरी की प्रैक्टिस कर चुकी थीं, और यहाँ पर बहुतों को जानती थीं. उन्होंने घूम-घूम कर सम्मेलन की रिसेप्शन कमेटी के तीन-तीन रुपये वाले टिकट बेचने शुरू किए. अगर ये लोग साहित्य से दिलचस्पी लेने वाले नहीं भी थे तो तीन रुपये की हद तक तो उन्हें साहित्य-प्रेमियों की लाइन में शामिल कर ही लिया गया. इसके अलावा कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में शामिल होने के लिए हज़ारों लोग लखनऊ आने लगे थे. उनमें सोशलिस्ट नेता और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी थे, जिनमें ज़्यादातर अगर लेखक न थे तो प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन के हमदर्द थे.

आचार्य नरेंद्र देव संस्कृत, पाली और हिंदी के विद्वान थे और उर्दू के बेहतरीन वक्ताओं में से गिने जाते थे. जयप्रकाश नारायण की सोशलिस्ट राजनीतिक ज़िंदगी की शानदार शुरुआत थी. कमला देवी चट्टोपाध्याय एक लाल शोले की तरह चमक रही थीं. मियाँ इफ्तिखारुद्दीन पूरे ज़ोर-शोर के साथ कांग्रेस की वामपंथी राजनीति से जुड़ गए थे. इन सबने हमारे सम्मेलन में शामिल होने का वादा किया. सरोजिनी नायडू नए कवियों और लेखकों का साथ देने और उनका हौसला बढ़ाने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं. वो भी लखनऊ में थीं और उन्होंने भी सम्मेलन में शामिल होने का वादा किया था.

5.

जैसे-जैसे सम्मेलन का दिन करीब आता, हमारी घबराहट बढ़ती जाती. रुपयों की कमी की वजह से हम अपने प्रतिनिधियों को ठहराने और उनके खाने-पीने का इंतज़ाम भी नहीं कर सकते थे. कुछ को हमने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के यहाँ ठहराने का इंतज़ाम किया था. बहुत से कांग्रेस के कैंप में जाकर टिक गए थे, जहाँ एक झोपड़ी कुछ रुपयों में किराये पर मिल जाती थी और खाना बहुत सस्ता था. कुछ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल के खाली कमरों में ठहरे. यह इंतज़ाम हमारे लिए बड़ी परेशानी का कारण था. इसलिए कि सम्मेलन हॉल और मेरे घर से, जहाँ सम्मेलन का अस्थायी दफ्तर था, यह सब जगहें कई-कई मील की दूरी पर थीं. लेकिन मजबूरी थी, हमने अपने मेहमानों को अपनी हालत बता दी थी और उनसे पहले कह दिया था कि लखनऊ में उनके ठहरने का उचित इंतज़ाम करने में हम असमर्थ हैं.

बाहर से आने वाले लोगों का रेलवे स्टेशन पर स्वागत भी हम न कर सकते थे. तीन-चार आदमी आखिर क्या-क्या करते? फिर भी अपने अध्यक्ष मुंशी प्रेमचंद को स्टेशन पर लेने जाने का हमने पक्का इरादा किया. महमूद किसी और काम में लगे हुए थे. इसलिए रशीदा और मैंने तय किया कि हम दोनों स्टेशन जाएँगे. कहीं से थोड़ी देर के लिए हमने एक कार भी हासिल कर ली थी. सुबह का समय था, गाड़ी नौ बजे के करीब आने वाली थी. हमने सोचा कि साढ़े आठ बजे घर से निकलेंगे. हम आठ बजे के करीब बैठे चाय पी रहे थे कि घर में एक तांगे के आने की आवाज़ आई और साथ ही नौकर ने आकर मुझे बताया कि कोई साहब आपको बुला रहे हैं. मैं बाहर निकला तो क्या देखा कि प्रेमचंद जी और उनके साथ एक और साहब हमारे मकान के बरामदे में खड़े हुए हैं. मुझ पर हैरानी और शर्मिंदगी से थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया. लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, प्रेमचंद जी ने हँसते हुए कहा:

“भई तुम्हारा घर बड़ी मुश्किल से मिला है. बड़ी देर से इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं.”

इतने में रशीदा भी बाहर निकल आईं और हम दोनों अपनी सफाई और माफी पेश करने लगे. मालूम हुआ कि हमें ट्रेन के समय की गलत सूचना थी. उसके आने का समय एक घंटे पहले का था. पहली अप्रैल से समय बदल गया था. लेकिन अब उल्टे प्रेमचंद जी ने माफी मांगनी शुरू कर दी:

“हाँ, मुझे चाहिए था कि चलने से पहले तार (टेलीग्राम) दे देता. लेकिन मैंने सोचा कि क्या ज़रूरत है. अगर स्टेशन पर कोई न भी मिला तो तांगा करके सीधा तुम्हारे यहाँ चला आऊँगा.”

मैं दिल में सोच रहा था कि आम तौर से सम्मेलनों के अध्यक्ष का शानदार स्वागत किया जाता है. उन्हें प्लेटफॉर्म पर हार पहनाए जाते हैं, उनके जुलूस निकलते हैं. उनकी जय-जयकार होती है और हमारा अध्यक्ष है कि खुद अपनी जेब से रेल का टिकट खरीद कर चुपके से आ गया. स्टेशन पर स्वागत तो क्या, रास्ता बताने के लिए भी कोई उसे नहीं मिला. एक मामूली से तांगे पर बैठकर वो खुद ही बिना किसी औपचारिकता के सम्मेलन के आयोजकों के घर पर चला आया. उनकी कमी की शिकायत तो दूर की बात, उसके माथे पर शिकन भी नहीं पड़ी, और हमसे यूँ घुल-मिल गया जिससे मालूम होता था कि दिखावे की बातों पर समय बर्बाद करना उसके नज़दीक बिल्कुल गैर-ज़रूरी है. यकीनन हमारा आंदोलन एक नई तरह का आंदोलन था और इसका अध्यक्ष नए तरह का अध्यक्ष था. उसकी शान, उसकी विनम्रता और सादगी से ज़ाहिर होती थी.

मुंशी जी हमारे यहाँ ही ठहरे. उनके साथ जो साहब थे उनसे हम पहले से अनजान थे. यह हिंदी के मशहूर कहानीकार और उपन्यासकार, दिल्ली के बाबू जैनेंद्र कुमार थे. मुंशी प्रेमचंद ने हमारा उनसे परिचय कराया. वो भी हमारे मेहमान हुए. हमें इसकी खुशी हुई कि मुंशी जी हिंदी के एक लेखक को, जो उनके दोस्त थे, अपने साथ लाए. उस वक्त तक हिंदी के बड़े लेखकों में से मुंशी प्रेमचंद के अलावा हमारे आंदोलन में कोई शामिल नहीं हुआ था. बाबू मैथिलीशरण गुप्त, पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान, पंडित बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि ने हमारे आंदोलन से हमदर्दी दिखाई थी. लेकिन उनमें से कोई भी सम्मेलन में शामिल होने के लिए नहीं आ रहा था.

हिंदी के लेखकों में गुटबाज़ी भी बड़ी सख्त थी. कुछ उनमें से शायद ऐसे भी थे जो उर्दू के लेखकों के साथ मिल कर कुछ करना भी पसंद नहीं करते थे. मैंने प्रेमचंद जी से उनके रुझान का ज़िक्र भी किया था. उन्होंने मुझे लिखा कि हिंदी के बहुत से लेखक शायद हीन भावना के शिकार हैं. बहरहाल हमें अपनी कोशिश जारी रखनी चाहिए. इन सभी बातों को देखते हुए बाबू जैनेंद्र कुमार का सम्मेलन में शामिल होने के लिए आना हमारे लिए दुगनी खुशी का कारण था.

इसके बाद जैनेंद्र कुमार साहब से मिलने का मुझे कई बार मौका मिला और उनसे बड़ी-बड़ी बहसें और बातचीत हुईं. यकीनन उनका व्यक्तित्व अपने आप में अनोखा है. बहस को उलझाने, आसमान का सिरा ज़मीन से मिलाने, एक ही समय में प्रगति और रूढ़िवाद, भौतिकवाद और आध्यात्मिकता का समर्थन करने में उनको महारत हासिल है. उनका विश्वास भगवद्गीता पर भी है और ऑस्वल्ड स्पेंगलर के पतन और मौत के दर्शन पर भी, लोकतंत्र पर भी और फासीवाद पर भी. उनसे घंटों बात करने पर भी पता नहीं चलता कि महोदय किस चीज़ को मानते हैं और कहना क्या चाहते हैं. वो प्रगतिशील लोगों के सम्मेलनों और सभाओं में नियमित रूप से शामिल भी होते हैं. लेकिन बहुत सी बातों में उनके विरोधी भी हैं. बड़े मिलनसार आदमी हैं. बातचीत के दौरान अगर कोई परेशान होकर उनसे लड़ने पर उतारू हो जाए तो मुसकुरा कर टाल देते हैं.

सम्मेलन शुरू होने के दिन हमने अपनी फाइलें, कागज़ात और टाइपराइटर संभाला और सुबह से ही रफा-ए-आम को चले गए. अब हॉल के बगल में एक छोटे से दफ्तर में सम्मेलन का दफ्तर बनाया गया, और महमूद ज़फ़र इसके इंचार्ज हुए. उन्हें टाइप करना भी आता था. इसलिए प्रस्ताव और हर एक सत्र का प्रोग्राम आदि टाइप करने का काम भी उन्हीं के ज़िम्मे पड़ा. रशीद जहाँ और हाजरा बेगम के ज़िम्मे हॉल के दरवाज़े पर बैठना, टिकट बेचना और लोगों को उनकी सीटों तक पहुँचाना था, और आम देखभाल का काम भी था. इन दोनों ने अपनी मदद के लिए मालूम नहीं कैसे और कहाँ से तीन-चार अच्छे स्वभाव वाली और फुर्तीली महिलाओं को इकट्ठा कर लिया था. इनके अलावा हॉल में सजावट बिल्कुल नहीं थी. हॉल के बाहर और अंदर के दरवाज़ों पर लाल कपड़े की चौड़ी-चौड़ी पट्टियों पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में “अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का पहला सम्मेलन” लिख कर लटका दिया गया था और बस! मंच भी बहुत ही मामूली था.

यह कोई एक फुट ऊँचे, छह गज़ लंबे और चार गज़ चौड़े खड़े तख्तों का था, जिस पर एक मामूली लकड़ी की मेज़ थी. मंच पर चार कुर्सियाँ थीं जो हत्थेदार थीं मगर उनकी पॉलिश उड़ चुकी थी. हॉल में बाकी जो कुर्सियाँ थीं, बिना हत्थे के थीं. ज़मीन पर दरी आदि कुछ नहीं थी, मंच पर भी दरी नहीं थी. अच्छे फर्नीचर और सजावट का सामान हासिल करने के लिए ज़्यादा रुपयों की ज़रूरत थी जो हमारे पास नहीं थे. उस वक्त तक हमको जो रुपया मिला था, वो ज़्यादातर छपाई में खर्च हो गया था. जो कुर्सियाँ आदि हमने सम्मेलन के लिए किराये पर ली थीं, वो उधार थीं और हम यह उम्मीद करते थे कि एक-एक रुपये के दर्शकों के दो सौ टिकट बेच कर हम उनका किराया चुका देंगे.

खुला सम्मेलन सिर्फ दो दिन के लिए होना तय हुआ था. दस बजे सुबह से साढ़े बारह बजे तक और फिर दोपहर को तीन बजे से साढ़े पाँच बजे तक. बीच के खाली समय में दोबारा प्रतिनिधियों की मीटिंग करके नियम और संगठन संबंधी मामले तय करने का प्रोग्राम था.

नौ, साढ़े नौ बजे के करीब एक-एक करके लोग आना शुरू हुए. सबसे पहले आने वालों में हमारे अध्यक्ष मुंशी प्रेमचंद थे, जो बिना किसी संकोच के हमारे पास आकर इधर-उधर की बातें करने लगे. उनके चेहरे से आज जैसे खुशी और संतोष के भाव झलक रहे थे, जिससे हम सबकी बहुत हिम्मत बंधी थी. स्वागत समिति के अध्यक्ष चौधरी मोहम्मद अली साहब आए तो थोड़ी ही देर में उनकी बातचीत और व्यवस्थापक महिलाओं के ठहाके गूंजने लगे. डॉक्टर अब्दुल अलीम (इन दिनों अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में अरबी के लेक्चरर थे) अपने साथ गंभीरता ले आए. डॉक्टर अब्दुल अलीम हालाँकि हमारी उम्र के थे और बर्लिन यूनिवर्सिटी के पी.एच.डी. थे, लेकिन उनकी बाकायदा कटी हुई तिकोनी दाढ़ी, खादी की कड़क टोपी और शेरवानी, गोल चेहरा और गोरा रंग, नाप-तौल कर कदम रखना और सावधानी से बात करना उनमें एक मौलवियों जैसा और जांच-पड़ताल वाला अंदाज़ पैदा कर देता है. वो गाज़ीपुर (पूर्वी यू.पी.) के काज़ियों के परिवार के सदस्य हैं, और उनके व्यक्तित्व में धार्मिक शिक्षा, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया और जर्मन ट्रेनिंग का मेल हुआ है. उनके तार्किक दिमाग में राजनीतिक और साहित्यिक प्रगतिशीलता ने इस तरह जगह बनाई है जैसे अरबी व्याकरण के नियमों ने, और प्रगतिशीलता के सीधे रास्ते से भटकने या हटने को वो इस तरह पकड़ते हैं जैसे पुराने तरीके के मौलवी नियम रटाते वक्त मात्राओं की गलतियों को. उनकी उदारता में एक आकर्षक सख्ती है, और उनकी स्वतंत्र सोच और आधुनिक वैज्ञानिक विचार राष्ट्रीय परंपरा के मज़बूत और चमकदार फ्रेम से घिरी हुई मालूम होती है.

धीरे-धीरे हॉल भरने लगा. मद्रास, बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, सिंध, बिहार और यू.पी. के प्रतिनिधियों से आगे की दो लाइनें भर गईं. उनके बराबर पंद्रह-बीस स्वागत समिति वाले लोग रहे होंगे, और हॉल के दो-तिहाई हिस्से में एक रुपया टिकट वाले दर्शक रहे होंगे. छात्र, दफ्तरों में काम करने वाले दुबले-पतले, थोड़े झेंपे और शर्माए हुए साहित्य-प्रेमी, शिक्षक, नौजवान वकील, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी के कुछ साहित्य से शौक रखने वाले कार्यकर्ता, ट्रेड यूनियनों के कार्यकर्ता, कुछ किसानों में काम करने वाले कार्यकर्ता जो भारत के अलग-अलग हिस्सों से इस वक्त लखनऊ में जमा हुए थे, और जिन्हें नए प्रगतिशील राष्ट्रीय और सामाजिक आज़ादी के साहित्य से दिलचस्पी थी… यह थे हमारे देश के नए राष्ट्रीय और सामाजिक एहसास और समझ रखने वाले बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधि. हॉल में गहमागहमी और शोर-शराबा नहीं था. लोगों के बोलने की आवाज़ें धीमी थीं, और शांति कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही थी. इस भीड़ में जोश बिल्कुल मालूम नहीं होता था.

करीब साढ़े दस बजे जब हॉल लगभग दो-तिहाई भर गया तो हमने सम्मेलन की कार्रवाई शुरू करने का इरादा किया. इतने में बाहर एक तांगा आकर रुका. उसमें से एक छोटे कद के बुज़ुर्ग उछल कर उतरे. हमने देखा तो यह मौलाना हसरत मोहानी थे. मुंशी प्रेमचंद, डॉक्टर अब्दुल अलीम और मैं, जो पास ही खड़े थे और मौलाना को पहले से जानते थे उनके स्वागत के लिए बढ़े. हमें बड़ी खुशी थी कि मौलाना ने सिर्फ एक निमंत्रण पाकर हमारे सम्मेलन में शामिल होने के लिए कानपुर से लखनऊ आने की तकलीफ उठाई. उन्होंने अपने आने के बारे में हमको पहले से सूचना नहीं दी थी. इसलिए हमें उनके आने की कोई ख़ास उम्मीद भी नहीं थी.

आम रिवाज़ तो यह है कि कवियों को जब बुलाया जाता है तो पहले वो अपनी असमर्थता जताते हैं. फिर लोग उनसे जाकर मिलते हैं और शामिल होने के लिए ज़िद करते हैं. सेकंड क्लास का आने-जाने का किराया और इसके अलावा सफर का खर्च दिया जाता है, स्टेशन पर स्वागत किया जाता है, दावतें और मेहमान-नवाज़ी होती है और फिर ठहरने की जगह से कार में बिठाकर कवि को महफिल में लाया जाता है. यह रिवाज़ ऐसा बुरा भी नहीं, क्योंकि इन मौकों के अलावा कवि और लेखक का कोई हाल पूछने वाला नहीं होता और आम तौर से उसकी और उसके बच्चों की ज़िंदगी गरीबी और भुखमरी की होती है, और अगर ऐसा है तो आम लोगों का क्या कसूर? खुद आम लोगों की ज़िंदगी भी तो ऐसे ही कटती है.

लेकिन हमारे देश में अगर कोई ऐसी हस्ती थी, जिसे हर तरह के दिखावे, बनावट, कृत्रिम और रस्मी तौर-तरीकों से सख्त नफरत थी, और जो इस बात की परवाह किए बिना कि लोग उसकी बात का बुरा मानेंगे या नाराज़ हो जाएँगे, सच्ची बात कहने और उसके अनुसार काम करने से कभी नहीं झिझकती थी, वो हसरत मोहानी की हस्ती थी. इसका मतलब यह नहीं कि वो जो बात कहते थे वो ठीक ही होती थी. लेकिन जब राजनीति या सांस्कृतिक और सामाजिक मामलों में वो कोई रुख अपनाते थे तो उसकी सख्ती और सच्चाई पर उन्हें पूरा भरोसा होता था और फिर दुनिया इधर की उधर हो जाए, उसकी वजह से उन पर मुसीबतों और दुखों के पहाड़ टूट पड़ें, वो अपनी जगह पर अटल रहते थे.

मौलाना का कद छोटा था और वो बेहद बदसूरत थे. शरीर गठीला था जिस पर वो एक काफी लंबी मैली सी, गहरे सलेटी रंग की खादी की शेरवानी पहनते थे. उनकी तस्वीर तो सबने देखी हैं और उनकी शक्ल से सब वाकिफ हैं. चेचक के दागों वाला चेहरा, ढलता हुआ रंग और सारा चेहरा एक बड़ी घनी गोल सी दाढ़ी से ढका हुआ था जो शायद छह इंच से भी कुछ लंबी ही थी, और जिसके बाल सफेद-काले थे. ऐसा मालूम होता था कि इस दाढ़ी को न वो कभी काटते थे और न इसमें कंघी करते थे, इसलिए कि वो चारों तरफ उड़ती हुई मालूम होती थी. सिर पर वो हमेशा गहरे लाल रंग की छोटी सी फेल्ट की तुर्की टोपी पहनते थे जिसमें फुंदना नहीं होता था. आँखों पर चश्मा लगाते थे जिसका फ्रेम लोहे का था और जिसके शीशे पुराने डिज़ाइन के छोटे-छोटे और अंडाकार थे. लेकिन उनके पीछे से भी उनकी छोटी-छोटी आँखों की चमक और फुर्तीलापन झलकता रहता था. उनके बात करने के अंदाज़ में चंचलता और मिठास थी. वो तेज़ी से मुस्कुरा कर बात करते थे. इस उम्र और बुज़ुर्गी के बावजूद उनके शरीर में एक चुलबुलाहट और फुर्ती सी थी. उनकी आवाज़ पतली थी और जब वो जोश में आकर पूरी लगन से बोलते थे, जैसा कि अक्सर होता था, तो ऐसा लगता था जैसे किसी बच्चे की टूटी हुई सीटी हो, जिसे ज़ोर देकर फूंका जा रहा है लेकिन जो फिर भी मुश्किल ही से बजती है.

हमने मौलाना को सीधे ले जाकर मंच पर बिठा दिया. बीच में मुंशी प्रेमचंद थे. उनके दाईं तरफ मौलाना बैठे थे और उनके बगल में चौधरी मोहम्मद अली. मैं मुंशी जी की बाईं तरफ नीचे तख्त पर किनारे की तरफ बैठा था, ताकि प्रोग्राम और कागज़ात आदि उन्हें समय-समय पर दे सकूँ.

चौधरी साहब के स्वागत भाषण से सम्मेलन की शुरुआत हुई. उन्होंने यह भाषण लिख लिया था. अफसोस है कि वो अब हमारे पास नहीं है. नहीं तो उससे पता चलता कि किस तरह हमारी (ख़ास तौर से लखनऊ की) पुरानी संस्कृति और साहित्य के एक रसिक ने नए प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन का स्वागत किया था. चौधरी साहब के भाषण के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वसम्मति से सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने अपना अध्यक्षीय भाषण पढ़ना शुरू किया. यह आसान उर्दू में लिखा था लेकिन ज़ाहिर है कि इस भीड़ में गैर-हिंदी/उर्दू बोलने वाले इलाकों के जितने भी प्रतिनिधि और दर्शक थे (जिनकी संख्या आधी से कुछ ही कम थी), उनकी समझ में वो बिल्कुल नहीं आ रहा था. वो लोग तो चुप थे ही, लेकिन हम उर्दू-हिंदी वाले भी जो इस भाषण को शांति से सुन रहे थे, बिल्कुल चुप थे. बल्कि ऐसा मालूम होता था कि एक तरह की तल्लीनता सी भीड़ पर छा गई है. किसी सभा में ज़बानी भाषण की जगह अगर कोई चीज़ लिख कर पढ़ी जाए तो थोड़ी ही देर में मन ऊबने लगता है.

लेकिन इस भाषण में हमारी भाषा और हमारे देश में पहली बार एक बड़े लेखक ने हमें प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन के स्वरूप और उद्देश्यों से परिचित कराया था. इस भाषण में हमारी भाषा के कहानीकार और उपन्यासकार ने हमें सीधे-सादे और असरदार शब्दों में बताया कि अच्छे साहित्य की बुनियाद सच्चाई, सुंदरता, आज़ादी और मानवता पर ही कायम हो सकती है.

“जिस साहित्य से हमारी सही रुचि न जगे, आत्मिक और मानसिक शांति न मिले, हम में ताकत और गर्मी न पैदा हो, हमारा सौंदर्य-बोध न जगे, जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलों पर जीत पाने के लिए सच्चा संकल्प न पैदा करे, वो आज हमारे लिए बेकार है. उस पर साहित्य का नाम लागू नहीं हो सकता.”

उन्होंने लेखकों को याद दिलाया कि उनकी अदालत समाज है और इस अदालत के सामने उनकी जवाबदेही होगी, और जनता की इस अदालत में उनका मुकदमा इसी हालत में कामयाब होगा अगर वो इंसानियत, शराफत, इंसाफ और सच का निष्पक्ष प्रचार करेंगे. प्रेमचंद ने कहा कि एक कलाकार में सही सौंदर्य-बोध और प्यार की गर्मी होना ज़रूरी है, और वो प्रकृति और मानव समाज में संतुलन और तालमेल की तलाश करता है.

“साहित्य कलाकार के आत्मिक संतुलन का बाहरी रूप है और तालमेल सुंदरता को जन्म देता है, विनाश को नहीं. वो हम में वफा और सच्चाई और हमदर्दी और इंसाफ और समानता की भावनाओं को बढ़ाता है. जहाँ ये भावनाएँ हैं वहीं मज़बूती है, ज़िंदगी है. जहाँ इनकी कमी है वहाँ बँटवारा, स्वार्थ, नफरत और दुश्मनी और मौत है… साहित्य हमारी ज़िंदगी को स्वाभाविक और स्वतंत्र बनाता है… इसकी बदौलत आत्मा का परिष्कार होता है. यह इसका पहला उद्देश्य है.”

आगे चलकर प्रेमचंद ने इसको साफ कर दिया कि जब वो साहित्य में सौन्दर्य और प्रेम की तलाश करते हैं तो इससे उनका मतलब क्या है. उनके नज़रिए से यह सौन्दर्य बोध और प्रेम सिर्फ एक निजी और व्यक्तिगत चीज़ नहीं है. वो इस अस्पष्ट से एक आत्म मुग्ध दृष्टिकोण, ‘कला कला के लिए’ का प्रचार नहीं कर रहे थे बल्कि एक अच्छे कलाकार की खूबी ही उनकी नज़र में यह थी कि अपने आसपास जहाँ भी वो देखे कि एक वर्ग समाज और रीति-रिवाज़ों की बेड़ियों में पड़ कर दुख पा रहा है, इसे बर्दाश्त न करे और इस वर्ग को गुलामी और गरीबी से मुक्ति दिलाने के साधन जुटाए और उसकी आज़ादी के लिए बेचैन हो…

“वो इस दर्द को जितनी बेताबी के साथ महसूस करता है, उतना ही उसके लेखन में ज़ोर और सच्चाई पैदा होती है. वो अपने एहसासों को जिस संतुलन के साथ पेश करता है, वही उसके कमाल का राज़ है.”

प्रेमचंद ने और स्पष्ट करते हुए बड़ी खूबसूरती के साथ यह बात समझाई कि सुंदरता या आत्मिक खुशी कोई निरपेक्ष और भौतिक ज़िंदगी से अलग चीज़ नहीं, बल्कि इसका इंसानों की ज़िंदगी से संबंध है और इसका हमेशा एक उपयोगी पहलू होता है…

“एक ही चीज़ से हमें उपयोगिता के हिसाब से खुशी भी होती है और दुख भी. आसमान पर छाई हुई लालिमा बेशक एक सुंदर नज़ारा है. लेकिन तपते असाढ़ में अगर आसमान पर लालिमा छा जाए तो वो हमारे लिए खुशी का कारण नहीं हो सकती, क्योंकि वह अकाल की खबर देती है. उस वक्त तो हम आसमान पर काले-काले बादल देख कर ही खुश होते हैं.”

इसी तरह कुछ अमीरों और रईसों की खुशी दूसरों के लिए दुख का कारण हो सकती है. लेकिन एक समझदार और जागरूक इंसान

“इस इमारत के साज़ ओ सामान को सबसे बुरी चीज़ समझता है जो गरीबों और मज़दूरों के खून से दागदार रही हो.”

उन्होंने कहा कि इंसानियत के बेहतरीन धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक गुरुओं ने इंसानियत के सामने हमेशा भाईचारे, समानता, सभ्यता का आदर्श पेश किया और अपने इस सपने को हकीकत में बदलने की कोशिश की. लेकिन अनुभव बताता है कि इंसानी आज़ादी, भाईचारे, समानता का यह सुनहरा सपना इसी हालत में हकीकत में बदल सकता है, और इस आदर्श का पूरा होना तब ही संभव है, जब हम तरक्की की ताकतों का साथ दें.

“हमें तरक्की के मैदान में कदम रखना है. एक नई व्यवस्था बनानी है जहाँ समानता सिर्फ नैतिक पाबंदियों पर न रह कर कानूनों का रूप ले ले और हमारे साहित्य को इसी आदर्श को पेश करना है.”

प्रेमचंद की ज़बान से राजनीतिक और सामाजिक जन-क्रांति का इन शब्दों में समर्थन और प्रचार साबित करता था कि अब वो आदर्शवाद और सुधारवाद के दायरे से निकल गए हैं. उनकी इंसान दोस्ती और गांधीवादी राजनीति के नाकाम अनुभव ने उन्हें इस सच्चाई तक पहुँचा दिया था कि जो लोग सिर्फ बड़े-बड़े धार्मिक और नैतिक उसूलों का उपदेश देकर इंसान की भौतिक और आध्यात्मिक मुश्किलों का खात्मा करना चाहते हैं, वो कामयाब नहीं हो सकते. आज के ज़माने में इंसाफ और नैतिकता और इंसानियत का निर्माण इसी हालत में मुमकिन है जब एक ऐसी नई आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें इंसानों के ज़रिये इंसानों की लूट संभव ही न हो सके.
उन्होंने लेखकों से कहा कि लोगों की ज़िंदगी और उनके जीवन-संघर्ष में ‘सौंदर्य का उत्कर्ष’ देखने की कोशिश करें और यह न समझें कि सुंदरता सिर्फ रंगे होंठों वाली, इत्र लगाई औरतों के गालों और भौंहों में है. उन्होंने लेखकों से कहा कि…

“अगर तुम्हें इस गरीब औरत में सुंदरता नज़र नहीं आती जो बच्चे को खेत की मेड़ पर सुलाए पसीना बहा रही है, तो यह तुम्हारी छोटी सोच का कसूर है. इसलिए कि इन मुरझाए हुए होंठों और कुम्हलाए हुए गालों के पीछे त्याग, श्रद्धा और संघर्ष है. यौवन, सीने पर हाथ रख कर कविता पढ़ने और महिलाओं के नखरों की शिकायत करने या उनके नखरों और चोंचलों पर सिर धुनने का नाम नहीं. यौवन नाम है आदर्श का, हिम्मत का, मुश्किलों से लड़ने का, बलिदान का…”

उन्होंने कहा कि…

“जब लेखकों में इस तरह का सौन्दर्य बोध पैदा होगा तब हम इस समाज की जड़ें खोदने के लिए सीना तान कर तैयार हो जाएँगे और इसे बर्दाश्त न करेंगे जहाँ हज़ारों इंसान एक अत्याचारी की गुलामी करें. तब हमारी स्वाभिमानी इंसानियत इस पूंजीवाद, सैन्यवाद और राजशाही के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करेगी, और हम कागज़ के पन्नों पर रचना करके चुप न हो जाएँगे बल्कि उस व्यवस्था का निर्माण करेंगे जो सौन्दर्य, आनंद, स्वाभिमान और इंसानियत के खिलाफ नहीं है.”

अंत में प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की शाखाओं को जगह-जगह बनाने के लिए कहा:

“जहाँ साहित्य के रचनात्मक रुझानों पर नियमित चर्चा हो, लेख पढ़े जाएँ, बहसें हों, आलोचनाएँ हों, तभी ऐसा माहौल बनेगा जिसमें चाहा गया साहित्य पैदा हो सके और उसका विकास हो सके.”

भाषा के मसले पर उन्होंने कहा कि आदर्श के फैलाव के साथ भाषा अपने-आप सरल हो जाती है. जो लेखक अमीरों का है वो अमीरों का अंदाज़ अपनाता है, जो आम जनता का है वो जनता की भाषा लिखता है. और इस यादगार वाक्य पर अपना भाषण खत्म किया:

“हमारी कसौटी पर वो साहित्य खरा उतरेगा जिसमें चिंतन हो, आज़ादी की भावना हो, सुंदरता का सार हो, निर्माण की आत्मा हो, ज़िंदगी की सच्चाइयों की रौशनी हो, जो हम में हलचल, हंगामा और बेचैनी पैदा करे… सुलाए नहीं… क्योंकि अब ज़्यादा सोना मौत का लक्षण होगा.”

 

6.
इस भाषण को पढ़ने में (जो बाद में छपा तो पंद्रह पेज का था) कोई चालीस-पैंतालीस मिनट के करीब लगे. मेरा अब भी मानना है कि हमारे देश में प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन के उद्देश्य के बारे में शायद इससे बेहतर कोई चीज़ अभी तक नहीं लिखी गई है. हम प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों को तो जानते थे लेकिन हिंदी/उर्दू में उनका कोई साहित्यिक लेख कभी नहीं पढ़ा था. उन्होंने ऐसी चीज़ें बहुत कम ही लिखी हैं. चूँकि यह हमारी भाषा के सबसे महान यथार्थवादी कहानीकार के सच्चे विचारों का प्रकटीकरण था, इसलिए इसका महत्व और भी ज़्यादा है. हमने महसूस किया कि दरअसल हमारे नए यथार्थवादी और जन-जीवन का आईना दिखाने वाले साहित्य का वो कारवां, जिसका नेतृत्व बीस साल से खुद प्रेमचंद अपनी रचनाओं से कर रहे थे, अब नए और ज़्यादा साफ और ऊंचे स्तर पर बढ़ने के लिए तैयार है. हम नौजवान प्रगतिशील लोगों का नज़रिया उस वक्त शायद साफ और स्पष्ट नहीं था और हम अपने जोश और गुस्से में कभी बाईं तरफ को झुक जाते, तो कभी सावधानी और समझदारी की ज़रूरत समझ कर दाईं तरफ लुढ़क पड़ते. लेकिन इस मौके पर हमारे अध्यक्ष प्रेमचंद के तरीके में कोई हेर-फेर और उनकी सोच में कोई उलझाव मालूम नहीं होता था.

इसका कारण साफ है. प्रेमचंद एक मेहनती, देशभक्त और निष्पक्ष लेखक थे, जो अपनी कला को बेहतर बनाने और अपने अनुभव और ज्ञान को बढ़ाने की फिक्र में हमेशा लगे रहते थे. हम नौजवानों में से ज़्यादातर अपने वैचारिक दर्शन और शिक्षा के आधार पर प्रगतिशीलता के रास्ते पर अभी आकर खड़े हुए थे. प्रेमचंद ज़िंदगी के मुश्किल संघर्ष और कलात्मक रचना की मेहनत, यानी कर्म और अनुभव की बुनियाद पर वहाँ पहुँचे थे. इसी वजह से उनके विचारों में संतुलन, ऐतिहासिक निरंतरता, समग्रता और सहनशीलता थी. उनकी बात सच्ची मालूम होती थी, वो समझ में आती थी, इसी वजह से उसका दिल पर असर होता था.

मुंशी प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण के बाद मैंने संस्था की उस वक्त तक की संगठनात्मक स्थिति के बारे में एक छोटी सी रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में लिखी गई थी. यह अटल सच्चाई हमारे सामने थी कि उस वक्त तक किसी भी अखिल भारतीय सम्मेलन में अंग्रेज़ी भाषा ही एक ऐसी भाषा थी जो हर प्रांत के पढ़े-लिखे लोगों के बीच इस देश की किसी भी भाषा से ज़्यादा आम थी. हमारी देशभक्ति को इससे चिढ़ ज़रूर होती थी लेकिन इस ऐतिहासिक सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता था. यही नहीं कि एक-दूसरे की बात को समझने के लिए अलग-अलग प्रांतों के पढ़े-लिखे लोग अंग्रेज़ी इस्तेमाल करने पर मजबूर थे, बल्कि अक्सर ऐसा भी होता था कि अपने ही देश की दूसरी भाषाओं के साहित्य की जानकारी हमको अंग्रेज़ी के ज़रिये से ही होती थी. उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी जानने वाले हिंदी/उर्दू लोगों ने रबींद्रनाथ टैगोर की रचनाएँ ज़्यादातर अंग्रेज़ी के अनुवादों में ही पढ़ी हैं, और हमारी अपनी भाषाओं में हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के साहित्य के अनुवाद अंग्रेज़ी के मुकाबले में बहुत कम होते हैं.

सम्मेलन का पहला सत्र खत्म होने वाला रहा होगा कि साग़र निज़ामी, गिरते-पड़ते (जल्दी में) पहुंचे. हमें इसकी पहले से सूचना थी कि वो सम्मेलन में शामिल होने के लिए आ रहे हैं और उनके अभी तक न आने के कारण हमें चिंता सता रही थी. साग़र निज़ामी उर्दू के उन मशहूर कवियों में हैं, जिनकी शायरी में देशभक्ति की जोशीली आवाज़ें गूँजती हैं. जैसे उनके शेर सुनाने के मनमोहक अंदाज़ हैं, इसी तरह उनकी कविता में एक आकर्षक संगीत और लय होती है, और उनके गीतों के बाग़ में भी नए भारत की आज़ादी की हवाएँ चलती हुई महसूस होती हैं. उनके संपादन में छपने वाली पत्रिका ‘एशिया’ उस वक्त उर्दू की बेहतरीन, खुले विचारों वाली और सुंदर पत्रिकाओं में से थी. हमारे आंदोलन से उनका जुड़ना हम सबके लिए संतोष और खुशी का कारण था.

साग़र निज़ामी चूँकि मेरठ से आने वाले थे, इसलिए हमने सोचा शायद ट्रेन लेट हो गई हो. लेकिन मौलाना नियाज़ फतहपुरी भी अभी तक नहीं आए थे. वो तो लखनऊ में ही थे. उन्होंने हमारे घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर भी किए थे और सम्मेलन में बुलाए जाने पर शामिल होने का वादा भी किया था. आखिर वो क्यों नहीं आए? महीना-डेढ़ महीना पहले ‘निगार’ पत्रिका के सम्मानित संपादक के पास डॉक्टर अलीम के साथ मैं खुद गया था और प्रगतिशील आंदोलन के बारे में बातचीत की थी. मौलाना नियाज़ फतहपुरी से यह मेरी पहली मुलाकात थी, और उस दौर के ज़्यादातर साहित्य-प्रेमी नौजवानों की तरह मैं भी अपने को उनकी गद्य-रचना के चाहने वालों में गिनता था. इसके अलावा, मौलाना नियाज़ ने एक सीमित तरीके से ही सही, लेकिन पूरे ज़ोर-शोर के साथ मुसलमानों में प्रचलित धार्मिक मान्यताओं की संकीर्ण वैचारिकी के खिलाफ कई कट्टरपंथियों से लड़ाइयाँ लड़ी थीं.

उनके साहित्यिक लेखों में रूमानियत ज़्यादा खुशी देने वाली और भरपूर ज़िंदगी से लबरेज़ थी. हालाँकि अवास्तविक तत्वों की सजावट और बनावटीपन से मन और मस्तिष्क को पूरी तरह से शांति नहीं मिलती थी. बहरहाल मौलाना नियाज़ का व्यक्तित्व उस वक्त तक एक पूरी संस्था का रूप ले चुका था और साहित्य में उनकी एक ख़ास जगह थी. हमारे आंदोलन के साथ उनकी हमदर्दी कीमती थी.

साग़र साहब ने हमें बताया कि उनको सम्मेलन में आने में देर इस वजह से हुई कि वो सुबह से नियाज़ फतहपुरी साहब के यहाँ बैठे थे, और मौलाना नियाज़ फतहपुरी इस इंतज़ार में थे कि सम्मेलन के आयोजकों में से कोई उनके लिए सवारी (गाड़ी) लेकर उनके मकान पर पहुँचे, तब वो चलें. घंटे-डेढ़ घंटे इंतज़ार के बाद साग़र तो तांगे पर बैठकर खुद ही सम्मेलन तक आ गए लेकिन मौलाना नियाज़ इसलिए नहीं आए कि कोई उन्हें लाने के लिए नहीं गया. वो हमसे रूठ गए थे. साग़र साहब ने हमें यह भी बताया कि मौलाना ने सम्मेलन में पढ़ने के लिए एक लेख भी लिखा था, इस वजह से वो हमसे और भी ज़्यादा नाराज़ थे.

इन बातों को सुनकर हमें अपनी कमी पर शर्मिंदगी हुई और अपने अभावों का दुख. लेकिन हम यह सोचने पर मजबूर थे कि हमारे सम्मेलन में शामिल होने वाले दो बड़े लेखक प्रेमचंद और हसरत मोहानी बिल्कुल दूसरी तरह से हमारे सम्मेलन में आकर शामिल हुए थे और उनके अलावा बहुत से और नौजवान लेखक देश के दूर-दराज़ इलाकों से किराये का खर्च कर्ज़ लेकर तीसरे दर्जे (थर्ड क्लास) में सफर करके लखनऊ तक पहुँचे थे और असुविधाजनक जगहों पर ठहरे थे.

पंजाब की संस्था के प्रतिनिधि फैज़ अहमद फैज़ ने रशीदा को चुपके से बताया कि उनके पास बस लखनऊ आने-जाने भर का किराया तो था लेकिन अब सिगरेट या तांगे के किराये तक के लिए जेब में एक पैसा भी नहीं है. यकीनन इन लोगों और मौलाना नियाज़ में साफ फर्क था, जो अपने लखनऊ के मकान से जो रफा-हे-आम, जहाँ सम्मलेन का आयोजन था, से कोई मील भर की ही दूरी पर था, सवारी न पहुँचने की वजह से नहीं आ सके थे. ज़ाहिर है कि मौलाना का स्वभाव नए प्रगतिशील आंदोलन के स्वभाव से पूरी तरह मेल नहीं खाता था.

बाद के सत्रों में जिन लोगों ने लेख पढ़े, उनमें अहमद अली, महमूद ज़फ़र, फिराक थे. बंगाल की संस्था के सचिव ने आधुनिक बंगाली साहित्य के रुझानों और बंगाल में संस्था के संगठन पर लिखी हुई एक अच्छी रिपोर्ट पेश की. गुजरात, महाराष्ट्र और मद्रास प्रांत की भाषाओं के प्रतिनिधियों ने ज़बानी भाषण दिए. यह सब लेख और भाषण अंग्रेज़ी भाषा में थे. साग़र निज़ामी ने देशभक्ति और आज़ादी के विषय पर अपनी कई कविताएँ सुनाईं. अहमद अली ने प्रगतिशील साहित्य पर जो लेख लिखा था, उसमें नए साहित्यिक आंदोलन के उद्देश्य और नियम बताए गए थे. इसकी एक मुख्य खूबी यह थी कि इसमें साहित्यिक आलोचना के कुछ दार्शनिक बिंदु गणित के फार्मूलों के ज़रिये से समझाए गए थे जो मामूली समझ और ज्ञान रखने वाले लोगों की समझ से बाहर थे. इकबाल और टैगोर का बीच में ज़िक्र था और उन्हें रूढ़िवादी करार दिया गया था.

हकीकत यह है कि अहमद अली के लेख की ज़्यादातर कमियाँ उनकी निजी कमियाँ न थीं, बल्कि हममें से ज़्यादातर की आलोचनात्मक कम-समझी को दिखाती थीं. ज़रूरत इसकी थी कि हम अहमद अली के लेख पर अच्छी तरह बहस करते, उनकी खूबियों को सराहते और कमियों पर बुराई न करते. लेकिन हममें से कई, जो इन कमियों को कुछ हद तक महसूस भी करते थे, हँस कर चुप हो गए, और हमने ऐसा नहीं किया. मुश्किल यह थी कि अहमद अली आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते थे और अगर कोई उन पर एतराज़ करे तो वो यह समझते थे कि वो व्यक्ति ऐसा जलन की वजह से कर रहा है और इसका मकसद उनकी साहित्यिक गरिमा को गिरा कर उन्हें बदनाम करना है. इस डर से अहमद अली के दोस्त भी उन पर आलोचना करने से झिझकते थे. लेकिन यह हमारी बहुत बड़ी गलती थी. शायद इसी का नतीजा है कि अहमद अली धीरे-धीरे आत्म मुग्धता के खोल में घुस कर साहित्यिक दुनिया से गायब हो गए और उनकी अच्छी-खासी साहित्यिक क्षमताएँ उतना विकास नहीं कर सकीं जितना कि मुमकिन था. घमंड और रूढ़िवाद का चोली-दामन का साथ है. अगर किसी को ‘मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं’ का भ्रम हो जाए तो फिर उसके लिए ईश्वर की बाकी सृष्टि से प्यार करना ज़रा मुश्किल है, और जब तक बाकी इंसानों से मुहब्बत और अपने अलावा दूसरों का भी दुख-दर्द महसूस करने और उसका इलाज ढूँढने की क्षमता न होगी, कोई प्रगतिशील कैसे हो सकता है?

फिराक के लेख में हमारे देश की उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के सांस्कृतिक और धार्मिक आंदोलनों पर रौशनी डाली गई थी (ब्रह्मो समाज, आर्य समाज, वहाबी और सर सैयद अहमद खाँ के आंदोलन), और साथ ही साथ इसमें यह बताया गया था कि भारत की अलग-अलग भाषाओं में आधुनिक साहित्य का विकास भी इन्हीं आंदोलनों से जुड़ा था. अंत में यह कहा गया था कि प्रगतिशील साहित्य का नया आंदोलन दरअसल हमारे देश के सांस्कृतिक विकास का तार्किक नतीजा है. यह लेख बहुत जल्दी में लिखा गया था और पूरा भी न था. लेकिन फिराक बहुत दिलचस्प वक्ता भी हैं. इसलिए उन्होंने सिर्फ लेख पढ़ा ही नहीं बल्कि अंत में एक छोटी सी तकरीर भी की.

फिराक के व्यक्तित्व के बारे में उस समय जो बात अजीब लगती थी, वो यह थी कि उनकी अपनी शायरी और उनके प्रगतिशील विचारों में कोई ख़ास मेल नहीं मालूम होता था. मालूम होता था कि जैसे उनका व्यक्तित्व अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है. उस वक्त तक उनकी काव्यात्मक सोच पुरानी सीमाओं को तोड़ नहीं सकी थी. उनका वो ख़ास रंग जिससे वो मुहब्बत की कमियों और निराशाओं को अँधेरी रात के झिलमिलाते हुए तारों की तरह सुंदर बनाकर इंसानी आत्मा को ज़्यादा दर्दमंदी देते हैं, और उनका वो धीमा लहज़ा, जो दरबारी राग के सुरों की तरह अपनी गंभीर उदासी से जैसे ज़िंदगी की गरिमा को जगाता है, अभी तक नहीं उभरा था. उनकी बुद्धिमानी और आज़ाद-सोच ने उन्हें मानसिक तौर पर प्रगतिशील तो बना दिया था और वो हमारे आंदोलन से जुड़ भी गए थे, लेकिन जहाँ तक उनकी कला का सवाल था, वो पुरानी उर्दू शायरी की उन परंपराओं से गहराई से जुड़ा था जिन्हें बाद में फिराक खुद बहुत हद तक छोड़ने वाले थे. फिराक की कला पर फिराक के मानसिक बदलाव का असर जैसे न के बराबर था. हमारे और कई कलाकारों की तरह फिराक, उस वक्त अपने दोहरे व्यक्तित्व के टकराव को हल करने की कोशिश शुरू कर रहे थे और एक ईमानदार और अच्छे कलाकार के लिए यह काम कोई आसान नहीं है.

 

7.
यहाँ सिर्फ इतनी बात नहीं है कि पुरानी राह को छोड़ कर नया रास्ता अपना लिया जाए, या रूढ़िवाद के कपड़े उतार कर प्रगतिशीलता का नया चोला पहन लिया जाए. हमें अतीत से संस्कृति, कला और भाषा की एक कीमती विरासत मिली है. इसमें हमने अपनी क्षमता और ज़रूरत के अनुसार दूसरे देशों और समाजों की संस्कृति, ज्ञान और कला का समावेश किया है. अगर हमारा आज का व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन इस बात की मांग करता है कि भौतिक भलाई, मानसिक तरक्की, नैतिक और आध्यात्मिक ऊंचाई के लिए हम नए और क्रांतिकारी साधन खोजें और अपनाएँ, तो समझदारी और अनुभव की यह लगातार मांग है कि संस्कृति, ज्ञान और नैतिकता की वो सच्ची बातें जो हमारे पुराने और महान समाज को विरासत में मिली हैं, हमारे नए सांस्कृतिक निर्माण की आत्मा में समा जाएँ. कोई नई इमारत जो लंबे समय तक टिकने वाली हो, हमारी ज़रूरतों को अच्छी तरह पूरा करती हो और जिसकी सुंदरता हमारे लिए खुशी और आत्मिक शांति का कारण हो, आसानी से नहीं बनती. इसलिए अगर हमारा कोई कलाकार इस काम में सोच-विचार और देरी से काम लेता है, अगर उसके बहुत से प्रयोग नाकाम होते हैं, अगर वो फूँक-फूँक कर कदम रखता है, अगर उसे अतीत की उन कल्पनाशील और कलात्मक परंपराओं को खारिज करने में देर लगती है जो हमारी नई समझ के नज़दीक नुकसानदेह हैं लेकिन जिनकी सुंदरता अभी तक हमको प्रभावित करती है, तो हमें सब्र से काम लेना चाहिए.

सांस्कृतिक विश्लेषण और नई परंपराओं का निर्माण बहुत मेहनत और बारीक दृष्टि, साफ नज़र और आध्यात्मिक साधना का काम है. हम लेखकों और कलाकारों की कोताहियाँ, मानसिक सुस्ती और वैचारिक ठहराव पर आलोचना कर सकते हैं, उनके सतहीपन और कलात्मक कच्चेपन पर उँगली रख सकते हैं, उनके घमंड, कायरता या जनता से गद्दारी पर ऐतराज़ कर सकते हैं और ऐसे हालात में प्रगतिशील आलोचक का चुप रह जाना ही अपने कर्तव्यों से बहुत बड़ी चूक है. लेकिन अगर किसी कलाकार में इंसानी दर्द और आज़ाद ख्याली के गुण मौजूद हैं तो फिर हमारी सबसे बड़ी मांग उससे यही हो सकती है कि वो कोशिश करें और ज़िंदगी की सच्चाइयों को बेहतर और ज़्यादा असरदार तरीके से सामने लाए.

मौलाना हसरत मोहानी इस बात पर अड़े थे कि उन्हें पहले ही दिन भाषण का मौका दिया जाए. लेकिन हम कामयाब सम्मेलन करने के कुछ तरीके तो आखिर जान ही गए थे. पहले ही दिन हम अपने सबसे बुज़ुर्ग और बेहतरीन वक्ताओं को बुलवा कर महफिल की रौनक खत्म कर देना नहीं चाहते थे. इसलिए उनका भाषण दूसरे दिन शाम के सत्र में हुआ. मौलाना ने अपने भाषण में पहले तो प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र और इसके उद्देश्यों से पूरी सहमति जताई.

उन्होंने कहा कि हमारे साहित्य को राष्ट्रीय आज़ादी के आंदोलन की बात करनी चाहिए, इसे राजाओं और ज़ुल्म करने वाले अमीरों का विरोध करना चाहिए, इसे मज़दूरों और किसानों और सभी सताए हुए इंसानों का साथ देना चाहिए और उनकी हिमायत करनी चाहिए. इसमें जनता के दुख-सुख, उनकी बेहतरीन इच्छाओं और तमन्नाओं को इस तरह सामने लाना चाहिए जिससे उनकी क्रांतिकारी ताकत बढ़े और वो एकजुट और संगठित होकर अपने क्रांतिकारी संघर्ष को कामयाब बना सकें. मौलाना अपने विचारों को छिपाने या किसी फायदे के लिए इस पर पर्दा डालने को मानने वाले तो थे ही नहीं. उन्होंने कहा कि केवल प्रगतिशीलता काफी नहीं है. आधुनिक साहित्य को समाजवाद और साम्यवाद का भी प्रचार करना चाहिए. इसे क्रांतिकारी होना चाहिए. उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि इस्लाम और साम्यवाद में बिल्कुल कोई टकराव नहीं है. उनकी नज़र में इस्लाम का लोकतांत्रिक लक्ष्य यह मांग करता है कि सारी दुनिया में मुसलमान, समाजवादी व्यवस्था कायम करने की कोशिश करें. चूँकि आज के दौर में ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है, इसलिए प्रगतिशील लेखकों को इन्हीं विचारों को फैलाना चाहिए.

अंत में मौलाना ने खुद अपनी शायरी का ज़िक्र किया और हँसते हुए कुछ इस तरह की बात कही कि…

“आप सोचते होंगे… जब मैं लेखकों के सामने यह लक्ष्य पेश कर रहा हूँ तो खुद इस पर अमल क्यों नहीं करता. ज़ाहिर है कि मेरी शायरी में इस तरह की कोई बात नहीं होती. लेकिन आपको इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए… आपको ज़िंदगी के ज़्यादा ज़रूरी और गंभीर मुद्दों की तरफ ध्यान देना चाहिए, और मैं इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए ख़ास तौर पर इसीलिए आया हूँ कि आपके इन उद्देश्यों का समर्थन करने का ऐलान करूँ जो आपकी रचना हो. पुरानी बातों से काम नहीं चलेगा. वो केवल दिल बहलाने की चीज़ें हैं. शायरी के मामले में आपको मेरी नक़ल करने की ज़रूरत नहीं बल्कि मैं खुद इस तरह के नए प्रगतिशील साहित्य के निर्माण में आपकी पूरी तरह मदद करूँगा…”

 

मौलाना हसरत मोहानी के भाषण से हमारा बहुत हौसला बढ़ा, और मौलाना अपनी बात पर खरे उतरे. कानपुर में जब संस्था की शाखा बनी तो मौलाना हसरत इसके अध्यक्ष हुए. जब भी संस्था पर वो लोग हमला करते थे जिनके त्याज्य विचार और रूढ़िवादी चेहरे धर्म के नकाब से ढके होते थे, तो मौलाना हसरत मोहानी आंदोलन के लिए हर वक्त सीना तान कर खड़े हो जाते थे और उन्हें मुँह तोड़ जवाब देते थे. लेकिन मौलाना राजनीति की तरह साहित्य में भी संयुक्त मोर्चे (मिली-जुली एकता) के विचार के सख्त विरोधी थे. हमारे खयाल में प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन में केवल सोशलिस्ट या कम्युनिस्ट नहीं बल्कि अलग-अलग सोच के लोगों के लिए भी जगह थी. संस्था उनसे देश की आज़ादी और लोकतंत्र में विश्वास रखने की मांग करती थी, समाजवाद में नहीं. मौलाना इस मामले में कट्टर थे. उनकी नज़र में प्रगतिशील होने के लिए समाजवादी होना ज़रूरी था. हमारे लिए यह ज़रूरी नहीं था.

गीत या प्यार-मोहब्बत वाली शायरी के बारे में, जिसे मौलाना बुरी शायरी कहते थे, हम में से ज़्यादातर की राय वो नहीं थी जो मौलाना की थी. यह सही था कि पुराने सामंती दौर की ऐसी प्रेम-शायरी जिसके ज़रिये से कम-हिम्मती, नैतिक पतन, भाग्य-भरोसे बैठना और हार मान लेने का प्रचार किया गया था हमारे लिए नामंजूर थी. लेकिन ऐसी शायरी जिसमें सच्चे प्यार की कसक हो या जिसमें इंसान की नाकामियों और कमियों को सामने रखकर उसकी आत्मा को शुद्ध किया जाए, जो हम में दर्दमंदी और पवित्रता पैदा करे, जिसमें इंसानी आदतों को बेहतर बनाने के लिए लोगों और समाज की आलोचना हो, जिससे हमारी ज़िंदगी की सुंदरता बढ़े, और इंसानी जज्बात में बुलंदी और मिठास पैदा हो, वो बिल्कुल ऐसी नहीं है जिसे खारिज किया जाए. एक प्रगतिशील या क्रांतिकारी के लिए ऐसी शायरी उतनी ही ज़रूरी और लाभदायक है जितनी कि किसी दूसरे सभ्य इंसान के लिए ऐसी शायरी की चुनी हुई रचनाएँ, और खुद हसरत की बेहतरीन शायरी इसी श्रेणी की है. मौलाना ने इसके बारे में जो कुछ कहा उसमे अतिरेक था.

8.
सम्मेलन के आखिरी दिन के शाम के सत्र में अन्य लोगों के साथ सोशलिस्ट नेताओं जयप्रकाश नारायण, युसूफ मेहर अली, इंदुलाल जनक और कमला देवी चट्टोपाध्याय और मियाँ इफ्तिखारुद्दीन ने भी हिस्सा लिया. ये लोग इस समय में देश के मध्यम वर्ग के उन खुले विचारों वाले नौजवानों का प्रतिनिधित्व करते थे जो साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांति चाहते थे और समाजवाद के नए नज़रिए को अपनाते थे. कमला देवी ने सम्मेलन में एक छोटे से जोशीले भाषण में नए आंदोलन का स्वागत किया. सरोजिनी नायडू, जो ‘बुलबुल-ए-हिंद’ कहलाती थीं, भी कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने के लिए लखनऊ में मौजूद थीं. उन्होंने हमारे सम्मेलन में भी शामिल होने का वादा किया था. लेकिन बदकिस्मती से ठीक वक्त पर बीमार हो गईं. उन्होंने सम्मेलन को एक संदेश लिख कर भेजा जो पढ़ कर सुनाया गया.

सम्मेलन में प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा-पत्र भी पेश किया गया, और सबकी सहमति से पास हुआ. इस घोषणा-पत्र में, और उसमें जिसका ड्राफ्ट शुरू में लंदन में तैयार हुआ था और जिस पर इस वक्त तक हमने हस्ताक्षर लिए थे, सिर्फ कुछ शब्दों का फर्क था. ये बदलाव महाराष्ट्र के प्रतिनिधियों ने पेश किए थे जिनको सबने मान लिया.

संस्था का एक संविधान भी पास हुआ. इसका ड्राफ्ट डॉक्टर अब्दुल अलीम, महमूद ज़फ़र और मैंने मिल कर तैयार किया था. मुझे संस्था का महासचिव चुना गया और मुझे संस्था के केंद्रीय दफ्तर को इलाहाबाद में बनाने और चलाने का काम सौंपा गया. संस्था की कार्यकारिणी समिति के बारे में यह तय हुआ कि इसके सदस्यों को अलग-अलग प्रांतों या भाषाई क्षेत्रों की संस्थाएँ चुनेंगी. यह तय हुआ कि इसकी कोशिश की जाए कि भारत की हर बड़ी भाषा के इलाके में क्षेत्रीय संस्थाएँ हों और सभी प्रांतीय संस्थाओं के चुने हुए प्रतिनिधियों की एक अखिल भारतीय परिषद हो, जिसकी बैठक कम से कम साल में दो बार हो.

इनके अलावा सम्मेलन में कुछ और प्रस्ताव भी पास हुए जिनमें से दो इस नज़रिए से महत्वपूर्ण थे कि इनसे नए आंदोलन की कुछ खासियतों का पता चलता था.

एक प्रस्ताव में मुसोलिनी के इथियोपिया पर आक्रामक हमले और जापान के चीन पर हमले की निंदा की गई. इस प्रस्ताव में साम्राज्यवाद और साम्राज्यवादी युद्धों की निंदा की गई और हिंदुस्तानी लेखकों की आज़ादी चाहने वाली, लोकतांत्रिक और शांति-प्रिय भावनाओं को दिखाया गया. दूसरे विश्व युद्ध के बादल इस वक्त आसमान पर मंडरा रहे थे. प्रगतिशील लेखकों ने कहा कि उनका फर्ज़ है कि सभी अन्य अमन चाहने वालों के साथ मिल कर वो इस युद्ध को रोकने की कोशिश करेंगे. इससे यह साबित होता है कि प्रगतिशील लेखकों का आंदोलन अपनी शुरुआत से ही शांति, आज़ादी और लोकतंत्र का समर्थक था जो ग़ुलाम देशों की आज़ादी और विश्व-शांति को सभ्यता के बचने रहने और विकासशील होने के लिए ज़रूरी मानता था.

दूसरे प्रस्ताव में लोगों, संस्थाओं और संगठनों की विचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लोकतांत्रिक हक के समर्थन में आवाज़ उठाई गई. ब्रिटिश सरकार ने प्रेस के कानूनों, बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तारियों और दूसरी पाबंदियाँ लगाकर इन अधिकारों को छीन लिया था. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124 (सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने) का इस्तेमाल करके, अखबारों और पत्रिकाओं को बंद करके, और उनके छपने में रुकावट डाल कर, प्रगतिशील किताबों को ज़ब्त करके, संपादकों और लेखकों को गिरफ्तार करके इन इंसानी अधिकारों को बिल्कुल कुचल दिया था. प्रगतिशील लेखकों ने इसकी निंदा की और संस्था को यह निर्देश दिया कि देश के सभी दूसरे लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ मिलकर वो विचार और अभिव्यक्ति के बुनियादी इंसानी हक को वापस पाने की कोशिश करे.

इतिहास गवाह है कि रूढ़िवादी शासकों और अहंकारी सरकारों ने सच्चाई की आवाज़ को हमेशा ज़ुल्म और हिंसा के ज़रिये दबाने की कोशिश की है. आज़ाद दिमाग, सच बोलने वाली ज़बान और निडर कलम को अगर वो खरीद नहीं सके और डरा नहीं सके, तो उन्होंने लोहे की ज़ंजीर और सलाखों, ज़हर के प्याले और जल्लाद की तलवार का इस्तेमाल किया. लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि इंसान की आज़ाद आत्मा को कभी कैद नहीं किया जा सकता. कोई सच्चा प्रचारक, कवि, विद्वान या कलाकार, जिसकी रचना या विचारों में उसके समय की विकासशील सच्चाई की झलक और चमक हो, उसे दबाया नहीं जा सकता. अगर ज़बरदस्ती उसकी ज़बान बंद भी कर दी जाए और उसकी कलम तोड़ भी दी जाए तो वही सच्चाई जिसे आज़ादी से कहने की इजाज़त नहीं दी गई, हज़ारों-लाखों जनता के दिलों से साफ झरनों की तरह फूट पड़ती है. नैतिकता, ज्ञान और कर्म के नए रास्ते खुल जाते हैं और नए-पुराने के संघर्ष और टकराव से गति और तेज़ी के साथ ज़िंदगी की धारा इतिहास की तंग घाटियों से निकल कर हरे-भरे और रौशन मैदानों की तरफ बढ़ जाती है.

हमारे ये प्रस्ताव, जिन्हें सरकार और उसके चापलूसों ने राजनीतिक बता कर यह साबित करने की कोशिश की कि प्रगतिशील लेखकों का आंदोलन साहित्यिक कम और राजनीतिक ज़्यादा है और इसलिए शुद्ध और असली लेखकों को इससे अलग रहना चाहिए, असल में हमारे सांस्कृतिक जीवन में एक पुरानी और सराहनीय सांस्कृतिक परंपरा को ही दोहराते थे, और इसे एक व्यवस्थित रूप देते थे. फर्क सिर्फ यह था कि अब भारत भूमि के लेखक नियम से और संगठित होकर और अपने समय की ज़रूरतों और हालात के हिसाब से यह पक्का इरादा कर रहे थे कि वो आज़ादी और सच्चाई की सेवा करेंगे, और किसी की नहीं. फर्क यह था कि लोकतांत्रिक जीत के इस नए दौर में मीर, सौदा, गालिब और बहुत से दूसरे महान कलाकारों की तरह उन्हें अमीर शासकों के अंधेपन और असली हुनर की कद्र न करने पर खून के आँसू बहाने के बजाय आज़ादी चाहने वाली जनता के समर्थन से प्रेरणा और ताकत मिल सकती थी. अब उनका अकेलापन और बेचारगी का दुख देने वाला एहसास मिट सकता था और मिट रहा था. संस्था में उनके अनगिनत राज़दार पैदा हो गए थे.

‘’गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में
चमन में मेरे राज़दां और भी हैं’’
अल्लामा मोहम्मद इकबाल

सम्मेलन खत्म हुआ और हमें इसके खत्म होने पर अपनी कमियों का एहसास और नई ज़िम्मेदारियों से पैदा होने वाली चिंता और परेशानी, उस खुशी से बहुत ज़्यादा थी, जो किसी काम के अच्छे से पूरा होने के बाद होती है. सम्मेलन ने हमारे लक्ष्य को तय कर दिया था और उस नक़्शे को आखिरकार पूरा कर दिया था, जिसके हिसाब से देश के सभी प्रगतिशील लेखकों का संगठन होना चाहिए.

अभी बहुत से लेखक हमारे आंदोलन में शामिल नहीं हुए थे. उन्हें संगठित करना, संस्था की नई शाखाएँ खोलना और उन्हें चलाना, केंद्र को बनाना और नियम से चलाते रहना, इन कामों के लिए फंड इकट्ठा करना, केंद्र से सूचना-पत्र और पत्रिका छापना, जो पूरे आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ सके… यह सब काम ज़रूरी और मुश्किल थे. लेकिन एक साहित्यिक संस्था के लिए संगठन प्राथमिक नहीं है. असल काम तो नए उसूलों और उद्देश्यों के अनुसार, देश की अलग-अलग भाषाओं में साहित्यिक रचना और आलोचना है. कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, लेख लिखना और छापना है. यकीनन हमारे साथ देश के कुछ बड़े लेखक थे. वो तो लिखते ही थे और अब भी लिखते रहेंगे. सवाल असल में यह था कि प्रगतिशील लेखकों का नया आंदोलन, नए लिखने वाले पैदा करेगा या नहीं?… नौजवान लेखकों को अपने गुट में खींचने में कामयाब होगा या नहीं?… और ये नए लेखक ध्यान देने लायक और अच्छे साहित्य की रचना कर सकेंगे या नहीं…?

उस दिन शाम को जब सब कामों से फुर्सत पाकर, थके-हारे हम घर आए और खाना खाकर बातचीत करने के लिए बैठे तो मुंशी प्रेमचंद और रशीद जहाँ के अलावा हम तीन-चार लोग (महमूद ज़फ़र, फैज़, अलीम, मैं) शायद कुछ चुप-चुप थे. दूसरी बातों के अलावा एक तो यही तुरंत की परेशानी थी कि सम्मेलन के लिए किराये पर जो चीज़ें आई थीं, उनका किराया कहाँ से चुकाएँगे. फिर बाबू जैनेंद्र कुमार ने उर्दू-हिंदी की बेकार बहस छेड़ दी थी. इससे मुझे चिढ़ हो रही थी लेकिन प्रेमचंद खुश नज़र आ रहे थे. वो रशीदा की बातों पर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा रहे थे, जो अपने खास अंदाज़ में कभी मौलाना हसरत मोहानी और डॉक्टर अलीम की दाढ़ियों की तुलना कर रही थीं, कभी अहमद अली के लेख में गणित के फार्मूलों पर टिप्पणी, कभी साग़र निज़ामी की चुस्त शेरवानी और इससे भी चुस्त चूड़ीदार पजामे पर मज़ाक. जब प्रेमचंद की बारी आई तो उन्होंने हम नौजवान प्रगतिशील लोगों की हरकतों पर प्यार भरे अंदाज़ में आलोचना शुरू की:

“भई तुम लोगों का जल्दी से इंकलाब (क्रांति) करने के लिए तेज़-तेज़ चलना तो मुझे बहुत पसंद आता है. लेकिन मैं डरता हूँ कि अगर कहीं तुम अंधाधुंध दौड़ने लगे तो ठोकर खाकर मुँह के बल गिर न पड़ो… और मैं ठहरा बूढ़ा आदमी, तुम्हारे साथ अगर मैं भी दौड़ा और गिरा तो मुझे तो बहुत ही चोट आ जाएगी.”

यह कहकर उन्होंने बड़े ज़ोर का ठहाका लगाया और हम सब भी उनके साथ हँसने लगे.

“लेकिन कुछ भी हो, हम तो अब आपका हाथ नहीं छोड़ते!” रशीदा ने हँसते-हँसते जवाब दिया.

 

(समालोचना से साभार)

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तनवीर हसन

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से अंतराष्ट्रीय अध्ययन में एम.ए. और एम.फिल. भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति.
हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में स्वतंत्र लेखन एवं अनुवाद (गद्य और पद्य). देश भर में महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय मंचों से कविता पाठ और मुशायरों मे शिरकत. फिलहाल एक किताब पर काम>

मनोज मोहन
मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.

इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं.

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