कविता
सत्ता, तुम्हारी पेशानी पर
रत्ना भदौरिया
तुम हर गिरफ़्तारी पर
समझते हो—
एक आवाज़ का गला घोंट दिया
मूर्ख सत्ता
आवाज़ें गले में नहीं
वक़्त की कोख में पलती हैं
पुरानी फ़ाइलों में
जब हमारा अपराध नहीं मिलता
तुम क़ानून की मेज़ पर
झूठ की नई जिल्द चढ़ा देते हो
तुम्हें आदमी नहीं
उसका उठता हुआ सिर ख़तरनाक लगता है—
क्योंकि झुकी हुई गर्दनों से ही
तुम्हारी कुर्सी का साम्राज्य है
मगर याद रखना—
फाँसी के तख़्ते
विचारों की कब्र नहीं होते
कभी-कभी वहीं से
साम्राज्यों की उलटी गिनती शुरू होती है
हम भगत सिंह के वारिस हैं
मौत से समझौता नहीं करेंगे
तुम्हारी हर नई धारा पर
अपने माथे का सूरज रख देंगे
और तुम—
तुमने कभी सोचा है
जब जनता अपनी उँगली से
तुम्हारे नाम का निशान मिटाएगी
तब किस धारा के नीचे
अपनी सत्ता की ज़मानत माँगोगे
हमारे पास खोने को
सिर्फ़ बेड़ियाँ हैं—
तुम्हारे पास खोने को
पूरा सिंहासन
