मुनेश त्यागी की कविता – नही होती अच्छी बातों की “बात”

कविता

नही होती अच्छी बातों की “बात”

 

मुनेश त्यागी

 

कोई करता है चमकते बालों की बात

कोई करता है चमकती अंखियों की बात

कोई करता है चमकते लिबासों की बात

क्यों नहीं की जाती, रोशन दिमागों की बात?

 

कोई करता है जाति की, भाषा की बात

कोई करता है मजहब की, क्षेत्र की बात

कोई करता है मंदिर और मस्जिद की बात

कब की जाएंगी, इंसानी बस्तियों की बात?

 

कोई करता है खालिस्तान,पाकिस्तान की बात

कोई करता है खालिस हिंदूराष्ट्र की बात

कोई करता है यूरोप की, अमेरिका की बात

क्यों नहीं होती, एक मुकम्मल दुनिया की बात?

 

कोई करता है सिर्फ लाभ और मुनाफों की बात

कोई करता है सिर्फ धंधों और धर्मों की बात

अब हो रही है फौज की बर्बादी की बात

कब की जाएगी, खेतों की, झोपड़ियों की बात?

 

कोई करता है तोप की, तलवार की बात

कोई करता है खंजर और त्रिशूल की बात

कोई करता है मिसाइलों की, बमों की बात

कब की जाएंगी अमन और मोहब्बत की बात?

 

कोई करता है केवल हिंदू बनने की बात

कोई करता है सिर्फ मुसलमान बनने की बात

कोई करता है ईसाई और सिख बनने की बात

क्यों नहीं होती, भारतवासी बनने की बात?

 

कोई करता है उजालों में, अंधेरों की बात

कोई करता है झूठ की, लुटेरों की बात

कब होंगी जुल्म से, अन्याय से लड़ने की बात

क्यों नहीं होती, भगतसिंह के विचारों की बात?

 

क्यों नहीं होती मिलजुलकर रहने की बात

क्यों नहीं होती किसानों और मजदूरों की बात

कब की जायेंगी शिक्षा और रोजगार की बात

क्यों नहीं होती सस्ते और सुलभ न्याय की बात?

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