विरासत के नेता से विचार के नेता बनते राहुल गांधी
- पुणे का कार्यक्रम सामाजिक न्याय की उनकी राजनीति में नया अध्याय जोड़ता है
ओमप्रकाश तिवारी
राहुल गांधी की राजनीति को पिछले दो वर्षों में करीब से देखने पर उसमें एक बदलाव साफ दिखाई देता है। नेहरू-गांधी परिवार की विरासत से मिले राजनीतिक परिचय के बजाय अब वह अपनी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं, जिसकी राजनीति का आधार कोई पारिवारिक नाम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और संविधान है। पुणे में युवतियों के साथ उनका हालिया संवाद इसी यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा सकता है।
पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मनुस्मृति की स्त्री संबंधी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला किसी पिता, पति या पुत्र की संपत्ति नहीं है, बल्कि वह स्वयं की है। उन्होंने महिलाओं से पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का आह्वान किया। कार्यक्रम में छात्राओं और युवतियों से शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और सामाजिक दबाव जैसे मुद्दों पर संवाद भी हुआ।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि राहुल गांधी का वर्तमान राजनीतिक विमर्श अब केवल सरकार की आलोचना या चुनावी मुद्दों तक ही सीमित दिखाई नहीं देता। पिछले दो वर्षों में वह जातिगत शोषण, जाति जनगणना, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय को लगातार अपनी राजनीति के केंद्र में रखते रहे हैं। जाति जनगणना की मांग को उन्होंने सामाजिक बराबरी और सत्ता में हिस्सेदारी से जोड़ा है। केंद्र द्वारा आगामी जनगणना में जाति की गणना शामिल करने की घोषणा को भी उन्होंने सामाजिक सुधार की दिशा में पहला कदम बताया था।
जाति से महिला तक
राहुल गांधी की इस राजनीति के अलग-अलग मुद्दों को एक साथ रखकर देखें तो उनमें एक साझा विचार दिखाई देता है। जाति के सवाल पर उनका तर्क है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और अवसर तय नहीं होने चाहिए। महिला के सवाल पर उनका कहना है कि लिंग के आधार पर महिला के जीवन और निर्णय का अधिकार पिता, पति या पुत्र के पास नहीं होना चाहिए। दोनों का मूल प्रश्न एक है—क्या व्यक्ति की नियति उसका जन्म तय करेगा? यही वह जगह है जहां पुणे का कार्यक्रम उनकी राजनीति में एक नया आयाम जोड़ता है। अब सामाजिक न्याय का उनका विमर्श केवल जाति और प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रह जाता। उसमें महिला की स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी शामिल होती दिखाई देती है।
युवतियों को संबोधित करने का अर्थ
पुणे के कार्यक्रम की एक खास बात यह भी थी कि राहुल गांधी ने अपेक्षाकृत युवा महिलाओं और छात्राओं के बीच यह बात रखी। यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। नई पीढ़ी की महिलाओं के सामने सवाल केवल परिवार में सम्मान का नहीं है। वे शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता, विवाह, जीवनसाथी के चुनाव और राजनीतिक भागीदारी में अपने अधिकार को लेकर अधिक मुखर हैं। इसलिए “महिला स्वयं की है” जैसी भाषा सीधे उस पीढ़ी से संवाद करती है जो पारंपरिक सामाजिक भूमिकाओं को स्वाभाविक मान लेने के बजाय उनसे सवाल कर रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि अधिक उम्र की महिलाएं इस विचार को नहीं समझ सकतीं। बल्कि उनके अनुभव इस सवाल को और गहरा बना सकते हैं। अंतर पीढ़ियों के सामाजिक अनुभव का है। पुरानी पीढ़ी ने अनेक बार परिवार और सामाजिक स्वीकृति को प्राथमिकता देकर जीवन जिया है, जबकि नई पीढ़ी पूछ रही है कि परिवार और समाज के भीतर रहते हुए भी व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता कहां है। युवा महिलाओं को संबोधित करने का राहुल गांधी का यह तरीका इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह उन्हें केवल “लाभार्थी” नहीं, बल्कि राजनीतिक नागरिक के रूप में संबोधित करता है।
मनुस्मृति बनाम संविधान?
राहुल गांधी के इस विमर्श को केवल “मनुस्मृति विरोध” के रूप में देखना शायद इसकी राजनीतिक गहराई को कम कर देगा। मनुस्मृति में महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले प्रावधानों की आलोचना करना एक बात है। लेकिन राहुल गांधी जिस वैकल्पिक विचार की तरफ इशारा कर रहे हैं, वह मूलतः संवैधानिक समानता का विचार है। यानी सवाल यह नहीं कि कौन-सा धार्मिक ग्रंथ सही है और कौन गलत। सवाल यह है कि आधुनिक भारत में नागरिक के अधिकार का आधार क्या होगा—जन्म या संविधान? यही प्रश्न जाति के संदर्भ में भी उनके सामने है। जाति जनगणना की मांग हो, आरक्षण और प्रतिनिधित्व का सवाल हो या महिलाओं की स्वतंत्रता—राहुल गांधी इन सबको धीरे-धीरे समान हिस्सेदारी और समान अधिकार के बड़े फ्रेम में रखने की कोशिश कर रहे हैं।
विरासत का विरोधाभास
यहीं राहुल गांधी की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि इस विमर्श को और दिलचस्प बना देती है। वह उस परिवार से आते हैं जिसने स्वतंत्र भारत की राजनीति पर दशकों तक निर्णायक प्रभाव डाला। उन्हें राजनीति में प्रवेश के लिए वह संघर्ष नहीं करना पड़ा जो किसी सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता को करना पड़ता है। उनकी पहचान का एक बड़ा हिस्सा जन्म से मिला। लेकिन उनकी वर्तमान राजनीति जिस बात पर जोर देती है, वह है—जन्म से मिली पहचान व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होनी चाहिए। यही एक दिलचस्प विरोधाभास है। राहुल गांधी की चुनौती अब यह है कि वह विरासत से मिली राजनीतिक पूंजी को अपने विचार की राजनीतिक वैधता में बदलें। यानी—नेहरू-गांधी परिवार का राहुल गांधी होना उनकी पहचान की शुरुआत हो सकता है, लेकिन उनकी राजनीति की मंजिल नहीं।
आलोचना स्वीकारना भी बदलाव का संकेत
राहुल गांधी की राजनीति में एक और बदलाव पिछले दो वर्षों में दिखाई दिया है। वह कई मौकों पर कांग्रेस की पिछली गलतियों को स्वीकार करने से पीछे नहीं हटे हैं। यह कांग्रेस की परंपरागत सत्ता-केंद्रित राजनीति से अलग शैली है। वह विपक्ष में हैं, लेकिन केवल सत्ता की आलोचना करने के बजाय समाज की संरचना पर भी सवाल उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जातिगत शोषण के खिलाफ उनका रुख, जाति जनगणना की मांग, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व पर जोर तथा पीड़ित समूहों के बीच जाकर संवाद करने की शैली इसी राजनीतिक पुनर्निर्माण का हिस्सा दिखाई देती है। पुणे में महिला स्वायत्तता का मुद्दा इस क्रम में स्वाभाविक विस्तार है।
क्या यह राहुल गांधी को “विचार का नेता” बना सकता है?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि राहुल गांधी इस परिवर्तन को पूरी तरह हासिल कर चुके हैं। लेकिन दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। किसी नेता की अपनी राजनीतिक पहचान तब बनती है जब उसके मुद्दे अलग-अलग घटनाओं की प्रतिक्रियाएं न रहकर एक विचारधारा में बदलने लगें। राहुल गांधी के मामले में वह विचार कुछ इस तरह आकार लेता दिखाई देता है—जाति जन्म से मिली सामाजिक स्थिति तय न करे। लिंग महिला की स्वतंत्रता तय न करे। गरीबी किसी बच्चे का भविष्य तय न करे। सत्ता कुछ परिवारों या समूहों तक सीमित न रहे। और इन सबके ऊपर—संविधान व्यक्ति को समान नागरिक बनाए।
यदि यही सूत्र अगले कुछ वर्षों में उनकी राजनीति का स्थायी आधार बनता है तो राहुल गांधी की राजनीतिक हैसियत बदल सकती है। वह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प या कांग्रेस के नेता के रूप में नहीं देखे जाएंगे। वह यह सवाल उठाने वाले नेता के रूप में स्थापित हो सकते हैं कि भारत को किस तरह का समाज बनना है।
पुणे का महत्व यही है
पुणे का कार्यक्रम इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि राहुल गांधी ने मनुस्मृति का नाम लिया। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने मनुस्मृति की आलोचना के बरक्स महिला की अपनी सत्ता का विचार रखा। यह विचार उनके पिछले दो वर्षों के सामाजिक न्याय के विमर्श से जुड़ जाता है। जाति के सवाल पर वह कहते हैं—जन्म से मिले सामाजिक दर्जे को चुनौती दो। महिला के सवाल पर—जन्म से मिले लैंगिक दर्जे को चुनौती दो। दोनों के बीच साझा सूत्र है—मनुष्य की पहचान उसकी जन्मगत श्रेणी से बड़ी है। अगर राहुल गांधी इस विचार को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि कांग्रेस की नीतियों, संगठन और राजनीतिक कार्यक्रम में भी उतार पाते हैं, तो पुणे का यह कार्यक्रम उनके राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। तब शायद राहुल गांधी के बारे में यह कहना अधिक उचित होगा कि वह विरासत में मिली राजनीति के उत्तराधिकारी से धीरे-धीरे अपनी विचारधारा के नेता बनने की ओर बढ़ रहे हैं। और भारतीय राजनीति में यह बदलाव छोटा नहीं होगा।

