जेएनयूः लिबरल विश्वविद्यालय का अंत 

जेएनयूः लिबरल विश्वविद्यालय का अंत

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मोदी सरकार आने के बाद की सबसे बुरी घटना हैलिबरल विश्वविद्यालय के आदर्श प्रतीक जेएनयू का अंत । यह एक तरह से लिबरल विश्वविद्यालय के अंत की सूचना भी है। यह सच है वहां के लिबरल चरित्र को बचाने के लिए वामपंथी-लोकतांत्रिक ताकतें संघर्ष कर रही हैं, मोदी सरकार और आरएसएस का प्रचार है कि जेएनयू वामपंथी,राष्ट्रविरोधी है,अलोकतांत्रिक है,जबकि वास्तविकता यह है जेएनयू इनमें से कुछ भी नहीं है,वह लिबरल विश्वविद्यालय का आदर्श है। इसके विपरीत देश के बाकी विश्वविद्यालयों का चरित्र पूरी तरह लिबरल नहीं बन पाया है। वहां अनुदार विचारधाराओं का वर्चस्व है,प्रशासन में नौकरशाही हावी है,लेकिन जेएनयू में प्रशासन से लेकर छात्र जीवन तक लिबरल विचारधारा का वर्चस्व बना हुआ था,इसने लिबरल छात्र-शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया। इस लिबरल माहौल को नष्ट करने में जहां आरएसएस-मोदी सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है वहीं दूसरी ओर जेएनयू के छात्र आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के शक्तिशाली संगठन के उदय की भूमिका है।

सवाल यह है जेएनयू में अ.भा.वि.परिषद का उदय किन कारणों और परिस्थितियों में हुआ ॽ इस संगठन के उदय और विकास में एसएफआई के पराभव की बड़ी भूमिका रही है। एसएफआई का छात्रों में जिस गति से अलगाव बढ़ा है,उसी गति से इस संगठन की राजनीतिक शक्ति में इजाफा हुआ है।यह एक सच है एसएफआई के पराभव में अनेक कारणों की भूमिका रही है, मसलन्, सांगठनिक तौर पर छात्रों के बीच में जीवंत और पहलकदमी से भरी उपस्थिति के अभाव ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की, इसके अलावा सांगठनिक कमजोरियां भी रही हैं,साथ ही समानांतर वाम छात्र संगठन के तौर पर आइसा के उदय और विकास ने एसएफआई को बहुत कमजोर बना दिया,इस समूची प्रक्रिया में आइसा ने एसएफआई के ही जनाधार को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया। राजनीतिक तौर पर नंदीग्राम की घटना ने एसएफआई को भारी क्षति पहुँचायी,रही-सही कसर प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के चुनाव लड़ने के प्रश्न ने संगठन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। माकपा ने मुखर्जी को समर्थन दिया वहीं पर जेएनयू इकाई इसके खिलाफ थी,फलतः एसएफआई की जेएनयू इकाई को भंग कर दिया गया। इन सबसे भिन्न जो कारण था वह यहकि विगत 15-20 सालों में जिस तरह का युवावर्ग जेएनयू में आया उस पर नव्य-उदारीकरण और आरएसएस का गहरा असर था।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसने कैम्पस में संघ की राजनीति का आधार तैयार किया।

इसके समानांतर जेएनयू का बड़े पैमाने विस्तार हुआ,विशालकाय कैम्पस ,विभाग और तकरीबन 6हजार से अधिक विद्यार्थी। यह सच है आइसा ने रेडीकल राजनीति दी, अनेक बार चुनाव जीते। लेकिन आइसा की मुश्किल यह है कि उसमें आरएसएस को रोकने की राजनीतिक क्षमता का अभाव है। दिलचस्प है जिन इलाकों में रेडीकल आइसा जैसे संगठन हैं वे मूलतः वाम संगठनों के ही जनाधार को खाते हैं वे स्वतंत्र तौर पर अपना विकास तो करते हैं लेकिन प्रतिक्रियावादी संगठनों को समानान्तर तौर पर विकसित होने से रोक नहीं पाते। उल्लेखनीय है जेएनयू के विस्तार, नव्य-उदारीकरण के व्यापक प्रसार के दौर में आइसा जैसे रेडीकल संगठनों की राजनीतिक शक्ति का विकास हुआ है। परंपरागत वाम-लोकतांत्रिक संगठन अपने को ग्लोबलाइजेशन विरोधी जंग का मजबूत सिपाही सिद्ध करने में असमर्थ रहे,इसकी तुलना में आइसा अधिक रेडीकल नजर आता है। इसने छात्रों में आइसा के विस्तार की संभावनाओं को जन्म दिया। देश में जहां एक ओर नव्य-उदारीकरण का विकास हुआ है वहीं विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों के बीच आइसा का विकास हुआ है। संयोग की बात है आइसा और भूमंडलीकरण समानांतर चलते हैं,माओवादी-नक्सल राजनीति इसके समानांतर आदिवासियों-खेत मजदूरों आदि में अपना जनाधार बनाती है। वहीं दूसरी ओर कैम्पस से लेकर लोकसभा तक आरएसएस –भाजपा और उनसे जुड़े संगठनों का विकास होता है। कहने का आशय यह कि नव्य उदारीकरण के विकास और प्रतिवाद के द्वंद्व के गर्भ से वाम रेडीकल और हिंदुत्ववादी विचारधारा का समानांतर विकास हुआ, दोनों ने भूमंडलीकरण का ऊपर से विरोध किया लेकिन सार रूप में वे इसके बाई-प्रोडक्ट हैं। आइसा ने ’ क्रांति’ और अ.भा.वि.परिषद ने ‘ हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ को मूल थीम बनाकर छात्रों में काम किया.इसका परिणाम यह निकला कि विभिन्न वि.वि. परिसरों में इन दोनों के प्रति आकर्षण पैदा हुआ, परंपरागत वाम छात्र हतोत्साहित हुए,सांगठनिक तौर पर कमजोर हुए। इन दोनों किस्म के वैचारिक ध्रुवीकरण ने छात्रों के लोकतांत्रिक अकादमिक अधिकारों और शिक्षा में मूलगामी परिवर्तन के मुद्दों को हाशिए पर डाल दिया, अकादमिक जगत में भूमंडलीकरण,नव्य-आर्थिक उदारतावाद,क्रांति,हिंदुत्व और राष्ट्रवाद ये पांच विषय छाए रहे।इन सबके कारण शिक्षा की समस्याएं केन्द्र से खिसक गयीं।

इसके अलावा शिक्षा का निजीकरण बड़े पैमाने पर कई स्तरों पर हुआ. केन्द्र और राज्य सरकारों ने सचेत रूप से सरकारी स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों की उपेक्षा की नीति, संसाधन और पेशेवर शिक्षकों के मामले में गलत फैसले लिए इसके कारण प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक समूचा शिक्षा का ढांचा क्रमशः खोखला होता चला गया,इसके समान्तर ट्यूशन,कोचिंग सेंटर, प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज,निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालय आदि का व्यापक नैटवर्क उभरकर सामने आया, इंजीनियरिंग से लेकर बिजनेस मैनेजमेंट आदि के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और लाभ के अवसर खुले,इसने शिक्षित बेकारों की फौज खड़ी कर दी। आज स्थिति यह है कि सरकारी और निजी शिक्षा के सवालों पर कोई आंदोलन नहीं है। पहले यह धारणा थी कि इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले अभिजन होते हैं लेकिन आज माहौल बदला हुआ है। मध्यवर्ग,निम्न-मध्यवर्ग,मंझोले किसानों के बच्चे बड़ी संख्या में निजी कॉलेजों में पढ़ने जा रहे हैं,देश में अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की बाढ़ आ गई है।बच्चों के ऊपर पढाई का इस कदर दवाब है कि वे कुछ भी नया करने के लिए समय नहीं निकाल पाते,स्कूलों में किताबों का बोझ,होमवर्क का बोझ, ट्यूशन आदि के चलते बच्चे तकरीबन 12-14 घंटे रोज व्यस्त रहते हैं। यही बच्चा आगे जब कॉलेजों में पढ़ने जाता है तो वहां समय कक्षाएं नहीं होतीं,पुराने किस्म के पाठ्यक्रम हैं, गैर-पेशेवर,अकुशल शिक्षक हैं,जिनसे वह दो चार होता है,इस सबका दुष्परिणाम यह निकला है कि कॉलेज- विश्वविद्यालयों से डिग्रीधारी,नम्बरधारी छात्रों का जन्म हो रहा है,ये वे छात्र हैं जो डिग्रीधारी हैं,लेकिन देश-राज्य-विदेश,अपने सामयिक परिदृश्य आदि से जुड़े बुनियादी सवालों के बारे में कोई समझ नहीं रखते। इस सबके कारण शिक्षा जगत में व्यापक भ्रष्टाचार का जन्म हुआ है।एक ऐसे शिक्षा विरोधी माहौल का निर्माण हुआ है जिसमें शिक्षा के अलावा सब कुछ है।फलतःऔसत शिक्षक,औसत छात्र और औसत से भी नीचले स्तर का अकादमिक परिवेश पैदा हुआ है,इसके समानान्तर अकादमिक चौर्य कर्म में हर स्तर पर इजाफा हुआ है।इससे हरेक विश्वविद्यालय प्रभावित है।

सामान्यतौर पर यह मानते हैं कि जिस तरह की अर्थव्यवस्था होती है उसकी संगति में वैसी ही शिक्षा व्यवस्था भी होती,लेकिन भारत में यह स्थिति नजर नहीं आती, यहां पर शिक्षा पर गैर-पूंजीवादी,सामंती दवाब कुछ अधिक हैं।हमारे यहां उत्पादन संबंधों से शिक्षा का जितना संबंध है उससे ज्यादा अनुत्पादक संबंधों से उसका रिश्ता है, फलतःशिक्षा में जीवन में डिग्री अर्थहीनता, व्यर्थताबोध ,लंपटगिरी आदि का व्यापक विकास हुआ है।शिक्षा लक्ष्यहीन होकर रह गयी है। शिक्षा प्राफ्त युवाओं में बहुत कम संख्या में युवकों को डिग्री के अनुरूप नौकरी मिल पाती है,बाकी को तो अनिच्छित नौकरी करनी पड़ती है अथवा बेकारी का सामना करना पड़ता है।इसने शिक्षा में नए किस्म की समस्याओं और सांस्कृतिक संकट को जन्म दिया है।यही वो बृहत्तर परिवेश है जिसमें जेएनयू जैसे राष्ट्रीय महत्व के विश्वविद्यालय के उदार चरित्र पर खुलकर हमले हो रहे हैं और उसके बुनियादी लिबरल चरित्र को नष्ट किया जा रहा है। सवाल यह है क्या लिबरल जेएनयू को पुनः प्राप्त कर सकते हैं ॽ जी नहीं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार

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