ऋतुराज की कविताओं को गंभीरता से पढ़ने की ज़रूरत है

स्मृति सभा

ऋतुराज की कविताओं को गंभीरता से पढ़ने की ज़रूरत है

प्रगतिशील लेखक संघ, जनसंस्कृति मंच और जनवादी लेखक संघ के साझा बैनर के तले शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को दिल्ली स्थित सुरजीत भवन में कवि ऋतुराज के निधन पर स्मृति सभा का आयोजन किया गया। सभा का आरंभ कवि ऋतुराज की कुछ कविताओं के पाठ से हुआ। छात्र सौरभ ने “पानी गिरने की आवाज़”, अमित ने “कन्यादान”, अभिनंदन ने “मरूँगा नहीं” और डॉ. अभय कुमार ने “ग़रीब लोग” कविता का पाठ किया। अपने संक्षिप्त वक्तव्य में अभय कुमार जी ने ऋतुराज की काव्य संवेदना और लोक सम्पृक्ति को समझने के लिए उन्हें नागार्जुन की कविताओं के साथ पढ़ने की सिफ़ारिश की।

स्मृति सभा का संचालन कर रहे बजरंग बिहारी तिवारी ने कवि ऋतुराज से व्यक्तिगत मुलाक़ात की स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि वे अंतर्मुखी व्यक्ति थे। अपने को शोर–शराबों से दूर रखना पसंद करते थे पर उनकी कविताओं की गूंज व्यापक फलक की थी। कविता “कन्यादान” का जिक्र करते हुए उसे उन्होंने कविकुलगुरु कालिदास के नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम से जोड़कर देखा।

बजरंग बिहारी ने दलित और आदिवासी विमर्श के हवाले से ऋतुराज की कुछ कविताओं की चर्चा की। कालबेलिया समुदाय पर लिखी कविता आकार में भले छोटी हो लेकिन उसमें एक वृहद उपन्यास समाया हुआ है। वे उस दलित स्त्री के दुख को अपनी एक कविता का विषय बनाते हैं जो प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका है और जिसे स्कूल प्रशासन ने सुदूर देहात के एक उजाड़-से विद्यालय में रहने के लिए विवश किया हुआ है।

मुख्य वक्ता कवि-आलोचक डॉ. बली सिंह ने कवि ऋतुराज की पैनी दृष्टि की तारीफ़ करते हुए कहा कि जो दृश्य सामान्यत: छूट जाते हैं, ऋतुराज उन्हीं को अपनी कविता का आधार बनाते हैंl ‘कोयला बीनने वाली लड़की की प्रेम कविता’, ‘राजधानी में’ और ‘कवि लोक’ कविता का हवाला दे कर उन्होंने कहा कि वे यथार्थ को प्रचारात्मक नहीं, बल्कि जीवन स्थिति को गहराई से प्रभावित करने वाली युक्ति के रूप में देखते हैं।

 

स्मृतिसभा के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने ऋतुराज के साथ गुजारे पलों को याद करते हुए कहा कि आदिवासी जीवन का उनका अनुभव केवल पढ़ या सुन कर नहीं बल्कि उनके साथ रह कर अर्जित किया हुआ था। नए कवियों के लिए अपने समय की धारा में शामिल हो जाना बहुत आसान होता है परंतु ऋतुराज अपनी वैचारिक दृढ़ता के कारण प्रगतिशील कविता करते रहे और जीवन से जोड़ कर विचार को बचाए रखा l सत्ता के विरुद्ध सत्ता राजनीतिक क्रिया है पर सत्ता के विरूद्ध सहअस्तित्व की अवधारणा कवि मानस की उपज है। इसकी गहरी समझ उनके पास थी और उनकी यही वैचारिकी उन्हें ताउम्र हाशिए के समाज से जुड़े रहने की प्रेरणा देती रही और उन्हें प्रलोभन मुक्त बनाए रखा। अपनी बात का अंत करते हुए मदन जी कहते हैं कि कवि ऋतुराज को याद करने का अच्छा तरीका तो यही है उनकी कविताओं को पढ़ा और आलोचकीय दृष्टि से पुनर्मूल्यांकित किया जाए।

 दिल्ली से प्रिंसराज की रिपोर्ट

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