कविता
कितनी उड़ानों के पर काटोगे
रत्ना भदौरिया
कितनी उड़ानों के पर काटोगे
कितनी आवाज़ों पर ताले जड़ोगे
कितनी ज़ुबानों को ख़ामोशी की
क़ब्र में ज़िंदा गाड़ोगे
तुम्हारे पास सत्ता है
हमारे पास सवाल हैं
तुम्हारे पास पहरे हैं
हमारे पास ख़याल हैं
याद रखना—
विचारों को बंद करने वाली हर सलाख़
इतिहास में एक दिन ख़ुद कटघरा बनती है
बंद कर दो ट्रेनें
रोक दो मेट्रो के पहिए
छीन लो इंटरनेट की पहुँच
बिछा दो रास्तों पर पहरे—
मगर उस बेचैनी का क्या करोगे
जो सदियों से सीने में पलती है
उस चेतना का क्या करोगे
जो अँधेरे की आँखों में आँखें डालकर
रोशनी का अर्थ लिखती है
तुम साधनों को ही शक्ति समझ बैठे
यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है
संचार के रास्ते बंद हो सकते हैं
मगर संवाद की ज़रूरत नहीं
आवाज़ को दबाया जा सकता है
उसके जन्म की वजह नहीं
तुम्हारी सत्ता के माथे पर
लोकतंत्र का तिलक है
और हाथों में प्रतिबंधों की कीलें
तुम विकास के नाम पर
किसके हिस्से की ज़मीन निगलते हो
किसके हिस्से का आसमान छीनते ही
यह लड़ाई केवल सड़कों की नहीं
रोटी, रोज़गार और सम्मान की है
यह लड़ाई किसी एक आवाज़ की नहीं
अपने समय से हिसाब माँगती
करोड़ों धड़कनों की है
तुम इसे विद्रोह कहो
अराजकता कहो
या अपने विरुद्ध कोई षड्यंत्र—
नाम बदलने से सच नहीं बदलता
और दमन से मिटता नहीं
अन्याय के विरुद्ध उठता स्वर
हम इतिहास के पन्नों पर
तुम्हारी इजाज़त से नहीं लिखेंगे
अपने समय की चुप्पियों पर
तुम्हारी मुहर नहीं लगने देंगे
हमारी उड़ान का रास्ता
तुम्हारे नक़्शों से तय नहीं होगा
हमारी ज़ुबान का भविष्य
तुम्हारे फ़रमानों में क़ैद नहीं होगा
सत्ता की उम्र कुर्सियाँ तय करती हैं
विचारों की उम्र नहीं
तुम रास्ते रोकते रहना
हम रास्तों का अर्थ बदल देंगे
तुम ख़ामोशी थोपते रहना
हम हर पीढ़ी में सवाल बनकर
फिर जन्म लेंगे
