जसवीर त्यागी की मां पर केंद्रित कविताएं

जसवीर त्यागी की मां पर केंद्रित कविताएं

 

माँ और आग

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माँ को अँधेरे से सख्त नफरत है
जहाँ कहीं भी उसे वह दिखता है
झट से रोशनी कर देती है

मैंने माँ को अनेक बार
आग के इर्द-गिर्द ही देखा है
सुबह-शाम और देर रात में

माँ भोर में उठ,फूँक मार-मारकर
आग से धुआं हटाती रहती है
उसके आँसू बहुत बार
आग पर झरते रहते हैं

फिर भी वह हार नहीं मानती
और आग जलाकर
सबकी आग शांत करती है

शाम को दिन भर की थकान
उतार फेंकती है आग में

माँ देर रात तक मशाल लिए
सिरहाने बैठी रहती है
हम चैन की नींद सोते रहते हैं

मैं नहीं जानता माँ
तेरा आग से रिश्ता कितना पुराना है?
पर हाँ! इतना ज़रूर जानता हूँ
कि तूने अपनी ज़िंदगी के दमकते दिन
इसी आग में झोंक दिए हैं

कभी- कभी लगता है
कि माँ बावरी हो गयी है
तूझे आग से बिल्कुल भी डर नहीं लगता?

पता नहीं कितनी बार
जला होगा तेरा हाथ इसी आग में

माँ, मैं यह भी जानता हूँ
तू इसी आग को जलाती-जलाती
खुद ही बुझ जायेगी एक दिन

फिर भी तू कभी माँ
यह आग जलाना क्यों नहीं भूलती?

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तस्वीर

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घर में सभी की तस्वीर है
एक माँ को छोड़कर
कई बार सोचा भी था
किसी रोज उतरवाएँगे
माँ की एक बढ़िया-सी तस्वीर

माँ है कि अपनी दुनिया में मस्त
बच्चों की भीड़ में
मन्दिर में या फिर
चिड़ियों को दाना खिलाने में व्यस्त

पता नहीं क्यों ?
माँ को तस्वीर खिंचवाना भाता न था
अक्सर पूछने पर वह डांट देती थी
‘तस्वीर….
कोई देखेगा तो क्या कहेगा?’
मानो कुछ अप्रत्याशित घटा हो

फिर एक रोज
माँ ने पकड़ ली चारपाई
हम सब दवा-दारू में जुट गए
किसी को भी
यह ख्याल नहीं आया
कि माँ की एक भी तस्वीर नहीं है घर में

माँ अपनी सबसे अच्छी तस्वीर भी
ले गयी अपने साथ
अब माँ नहीं है
और न ही माँ की कोई तस्वीर

लेकिन!जब कभी
बात चलती है तस्वीर खिंचवाने की

मुझे याद आता है
चिता की लपटों में जलता माँ का शरीर।

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माँ का भय

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मैंने बेटा जना
प्रसव पीड़ा भूल गयी

वह धीरे-धीरे हँसने-रोने लगा
मैंने स्त्री होना बिसरा दिया

उसने तुतली भाषा में माँ कहा
मैं हवा बनकर बहने लगी

वह जवान हुआ
मैं उसके पैरों तले की मिट्टी वारती फिरूँ

उसके सिर सेहरा बंधा
मुझे याद आया
मैं भी एक रोज ब्याहकर आयी थी
इसके पिता संग

कुछ दिनों बाद मैंने जाना
ईश्वर अरूप है
और सारे पौधे
बिन पानी सूख गए हैं

नहीं सोचती कि आसमान से
कोई देवदूत उतरेगा

नहीं आँकना चाहती
जीवन के आँकड़े

मुझे कुछ पतझड़ और देखने हैं
उसके बाद एक अंतहीन बसंत
होगा मेरे चारों ओर

नहीं सोचती
कि मेरे मरने के बाद
बेटा क्या करेगा…..?

वह जानता होगा
हर सुबह
शाम में ढल जायेगी

मैं उस दिन से डरती हूँ
जब मेरा पोता
अपने पिता को छोड़कर दूर जायेगा

और उसे पहली बार अहसास होगा
किसी को अकेला छोड़कर जाने का दुःख
कितना जानलेवा होता है

उस दिन वह रह-रहकर
माँ को ज़रूर याद करेगा ।

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स्मृति

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अब माँ नहीं है
माँ की स्मृति है

अब स्मृति ही
माँ है।

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एक शब्द की कविता

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एक शब्द की
कविता है
माँ

सबसे छोटे
शिल्प में रची गयी

सबसे बड़ी
कविता है
माँ।

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