जसवीर त्यागी की जाति धर्म प्रांत से परे और पांच अन्य कविताएं

जसवीर त्यागी की जाति धर्म प्रांत से परे और पांच अन्य कविताएं

जाति धर्म प्रांत से परे

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मेट्रो ट्रेन में
तीन-चार साल का सुंदर-सलोना बच्चा
स्वच्छंद घूम रहा है यहाँ-वहाँ

किसी को छेड़ता
किसी का सामान छूता
किसी को देखकर हँसता-मुस्कुराता बेवजह-बेबात

नहीं जानता सामने वाले इंसान की जाति,धर्म,प्रांत
वह तो बालपन की मस्ती का बेताज बादशाह है

जो बेरोकटोक करता है
अपनी हसरतों के हाथी की सवारी

मुसाफिरों की निगाह के मध्य है बच्चा
हर कोई उसे अपनी ओर बुलाता है

बच्चा स्नेह की रस्सी से
हर किसी को अपनी तरफ खींचता है

जब भी कोई इंसान
जाति,धर्म,प्रांत से परे होता है

वह किसी बच्चे की तरह
आकर्षित करता है अपनी ओर।

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शेर-बेटा

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बारह वर्षीय बच्चे की
सप्ताह में तीन दिन डायलेसिस होती है

बच्चा हर बार
आना-कानी,ना-नुकुर करता है

रोग की रस्सी पर चलते बच्चे को
माता-पिता बाहों में भरकर कहते हैं-
तू हमारा शेर बेटा है

बच्चा हौसले से हाथ मिलाता हुआ
माता-पिता को एकटक देखता है

माता-पिता नन्हें शेर को
डॉक्टर और नर्स के साथ जाता हुआ देखते हैं।

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हिम्मत

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पड़ोस में रहने वाले एक आदमी के
पाँच बेटे और एक बेटी थी

तीन विवाहित बेटे
अलग-अलग दुर्घटनाओं में चल बसे
बिटिया भी ससुराल में सुखी नहीं

बुजुर्ग पति-पत्नी
साँसों की रस्सी पर
एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलते हैं

मेरा उनके संग बैठने का मन होता है
उनसे बात करने की हिम्मत
मैं जुटा नहीं पाता।

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अनेक अर्थ

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सुबह-शाम
ज्यों ही दूध का समय होता है
भैंस का लवारा खूँटे पर पैर पटकने लगता है

गले में बंधी रस्सी को
खींचता है अपनी माँ की ओर

दूधिया हाथों में लिए बाल्टी
इत्मीनान से आता है
लवारे को देता है ढील

बैचेनी और भूख से भरा लवारा
लपकता है माँ के थनों की ओर
भैंस चाटती-चूमती है लाडले को

कुछ ही देर में थनों में भर जाता है दूध
दूधिया तुरंत खींचता है लवारे को खूँटे पर

बच्चे को दूर जाता देख
भरे गले से रंभाती है भैंस
माँ और बच्चा देखते हैं
एक-दूसरे को तरस भरी निगाहों से

दूधिया खाली बाल्टी
और महीने की पहली तारीख देखता है

वैसे तो देखना शब्द है एक
लेकिन उसके अर्थ हैं अनेक।

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कच्ची-पक्की पेंसिल

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कच्ची पेंसिल जल्दी चटक जाती है
दूर तक साथ नहीं देती

उसका इतना त्याग कम नहीं

कि कच्ची पेंसिल
अपने समस्त कच्चेपन के साथ

पक्की पेंसिल की अहमियत को
बचाये रखती है।
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आश्रय

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एक पुष्प पेड़ से टूटकर गिरा
मैंने उठा लिया

और घर के गमलों में लगे
पौधों के मध्य सजा दिया

फूल को एक आश्रय मिल गया
पौधों को मिल गया एक फूल

यह जीवन
परस्पर मिलने से सार्थक बनता है।

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