… किसी को कभी भी किसी भी वजह से उजड़ना न पड़े

हरियाणा के ख्यातनाम लेखक हरभगवान चावला का उपन्यास देख फ़रीदा जो थिआ की आत्म स्वीकृति प्रस्तुत की जा रही है। इसे प्रतिबिम्ब मीडिया के पास प्रकाशन के लिए आया तो इसका शीर्षक बदल दिया है। इसके लिए लेखक से अग्रिम क्षमा याचना। इसके बाद उपन्यास का एक अंश और उस पर छोटी सी परिचयात्म टिप्पणी कल देंगे। संपादक

आत्म स्वीकृति : उपन्यास: देख फ़रीदा जो थिआ *

… किसी को कभी भी किसी भी वजह से उजड़ना न पड़े

हरभगवान चावला

 

हम बच्चे थे। हम बच्चों के माता-पिता, दादा-दादी अक्सर उन जगहों को याद करते थे, जहाँ से वे उजड़कर आए थे। अब ये जगहें पाकिस्तान में थीं और पाकिस्तान हमारा दुश्मन था। हमें उनकी बातें प्रलाप जैसी लगतीं। हम किशोर हो गए, फिर युवा भी। पाकिस्तान के प्रति घृणा और गहरा गई। कई बार ये लोग कोई सरायकी गीत गाते। मुझे गीत आकर्षित करता, लेकिन भीतर पैठा राष्ट्रवाद दुत्कारता -यह गीत पाकिस्तानी है, तुम इसे कैसे पसंद कर सकते हो ? मैं उस गीत का जवाब मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, मुकेश आदि के गीतों में ढूँढ़कर इन गीतों को उनके मुकाबले बेहतर सिद्ध करने की पुरजोर कोशिश करता। मुझे कोई सरायकी गीत भीतर तक छू जाता तो भी मैं उसे पाकिस्तानी गीत समझकर तरजीह नहीं देता।

विस्थापितों को स्थापित होने के लिए विकट संघर्ष करना पड़ रहा था। उनके पास इतनी पीड़ा थी कि वे इसे सुनाने के लिए छटपटाते, लेकिन विडंबना यह थी कि उनके अपने बच्चे भी उनकी कहानियों को सुनना नहीं चाहते थे। मैं बड़ा हुआ, पढ़ाई के लिए गाँव छोड़ना पड़ा। गाँव मुझे हर समय याद आता।

गाँव एक उदासी के स्तूप की तरह मेरी पीठ पर लदा रहता। स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हुए मैंने खूब साहित्य पढ़ा। ऐसे शिक्षक भी मिले जिनके संपर्क में रहते हुए समझ साफ़ हुई। मैं सोचता, मेरे गाँव में टिब्बे हैं, पानी की ज़बरदस्त कमी है, कोई नदी या जंगल नहीं है, कोई ऐतिहासिक महत्व का स्थान नहीं है, कोई दर्शनीय स्थल नहीं है, फिर भी मैं गाँव को एक पल के लिए नहीं भूलता तो फिर वे लोग जिन्होंने अपने जन्म से लेकर जीवन का एक बड़ा या छोटा हिस्सा जिस जगह पर गुजारा, उस जगह को कैसे भूल सकते हैं ? अब मैं उनकी कहानियों से चिढ़ता नहीं था, लेकिन नौकरी के कारण गाँव छूट गया था। बुजुर्ग भी अपनी कहानियाँ स्वयं को सुना-सुनाकर विरेचित हो चुके थे।

पहले हर किसी के सामने अपनी दास्तान बयाँ करने को व्यग्र ये लोग अब कुरेदने पर ही कुछ कहते थे और वह भी वही जो पूछा गया होता। मैं कहानियाँ लिखता था, पर कभी इनकी बताई बातों में मुझे कहानी नहीं दिखी। इनकी बातें सुनकर मेरे भीतर गम, गुस्सा, करुणा जैसे भाव उमड़ते, पर कभी कहानी नहीं उमड़ी, पता नहीं क्यों ? मुझे जब सरकार ने बूढ़ा घोषित किया यानी जब अट्‌ठावन की उम्र में मैं सेवानिवृत्त हुआ. तब दोस्तों ने नसीहत दी कि विभाजन की विभीषिका पर उपन्यास लिखो। फिर यह नसीहत आदेश में बदली।

मुझे कहा गया कि मुझ पर मेरे बुजुर्गों का कर्ज है और मुझे उसे चुकाना होगा। जब मुझे इस कर्ज का अहसास हुआ, तब तक मैं खुद बुढ़ापे की दहलीज पर क़दम रख चुका था और ज्यादातर वे लोग जिन्होंने विभाजन की विभीषिका को भोगा था इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह चुके थे। मरते दम तक उनका विस्थापन खत्म नहीं हुआ था। जिस परिवेश का वे हिस्सा थे, वह छूट गया, नये परिवेश ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

जीवन में जो अनुभव मैंने हासिल किए, उन अनुभवों ने मेरे भीतर कई सवालो को जन्म दिया। विस्थापन का जिम्मेदार कौन है ? विस्थापित होने के बाद विस्थापित कब तके विस्थापित बना रहता है? जन्म भूमि क्या कभी नहीं भूलती ? बुजुर्गों के द्वारा बताई कुछ घटनाएँ मेरे दिमाग में रह गई थीं। सिर्फ दो बुजुर्गों मेहता रामकिशन और मेहता शाम दास से मेरी कई बार लंबी-लंबी बातें हुई। इनके अलावा मेरी माँ से भी कई बार मेरी बात हुई।

विस्थापन के बाद के संघर्ष को तो मैंने अपने बचपन में खुद ही देखा था। यह उपन्यास कभी नहीं लिखा जाता, अगर दो मित्रों परमानंद शास्त्री और देश निर्मोही की लगातार प्रेरणा न होती। आदरणीय मित्र राममोहन राय ने विभाजन के समय के पानीपत से मेरा परिचय कराया, आभारी हूँ। मित्र वीरेंद्र भाटिया हमेशा कहते रहते थे कि सिर्फ कविताएँ, कहानियाँ तथा लघुकथाएँ नहीं, कुछ बड़ा लिखो। अब आकार में तो कुछ बड़ा लिख दिया है। सचमुच कुछ बड़ा लिखा गया है या नहीं, मैं कैसे जान सकता हूँ ? इसका निर्णय तो पाठक करेंगे।\

इस उपन्यास के कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं, लेकिन अधिकांश नाम असली हैं। इस उपन्यास के लिखे जाने के दौरान मेहता रामकिशन और मेहता शाम दास इस दुनिया से चले गए। काश, उनके जीते जी यह पुस्तक छपकर आ जाती। आज मैं अपने को उन सभी पूर्वजों का अपराधी महसूस करता हूँ, जिनकी व्यथा-कथाओं को मैंने अनसुना किया। इस उपन्यास के माध्यम से मैंने पुरखों के ऋण से उऋण होने की कोशिश की है, पर लगता है और अधिक ऋणी हो गया हूँ। संसार के हर हिस्से में अब घृणा तथा विस्थापन व्याप्त है। यह संसार इनसे कब मुक्त होगा, कब मानवता का परचम लहराएगा, मैं नहीं जानता। मेरी दिली तमन्ना है कि वह दिन जल्दी आए जब इन्सान की पहचान सिर्फ इन्सानियत से हो, किसी को कभी भी किसी भी वजह से उजड़ना न पड़े।

गाँधी जयन्ती, 2024
गांव: बीज्जुवाली (सिरसा)
हरियाणा।

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*भारत विभाजन की त्रासदी से उपजी नफ़रत और विस्थापन की पीड़ा का तथ्यपरक विश्लेषण और व्याख्या करता एक बहुत ऑथेंटिक उपन्यास: ‘देख फरीदा जो थिआ’ से उद्धृत लेखक का विश्वसनीय आत्मकथन।
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हिंदी उपन्यास: देख फ़रीदा जो थिआ
लेखक: हरभगवान चावला
मूल्य: ₹350
प्रथम पेपरबैक संस्करण: 2025
प्रकाशक: आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
एस.सी.एफ. 267 सेक्टर-16 पंचकूला-134 113 (हरियाणा)
ईमेल: aadharprakashan@yahoo.com

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