लघु कथा
आपकी ज़िंदगी आपकी अपनी है
डॉ. रीटा अरोड़ा
“क्या हुआ श्वेता? आज तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि तुम ठीक नहीं हो।”
श्वेता कुछ देर चुप रही, फिर बोली-“रीतू… मैं थक गई हूँ।”
“किससे?”
“हर बात समझाते-समझाते… हर फैसला सही साबित करते-करते… हर किसी को खुश करते-करते।”
“तुम्हें सबसे ज्यादा दुख किस बात का है?”
श्वेता की आँखें भर आईं- “दुख इस बात का है कि सबकी जिंदगी में मेरी जरूरत है… लेकिन मेरी जिंदगी में मेरी जरूरत किसी को दिखाई ही नहीं देती।”
रीतू ने उसका हाथ थाम लिया।
श्वेता की आवाज भर्रा गई- “मैंने कब क्या चाहा, कब क्या सहा… किसी ने नहीं पूछा। बस इतना पूछा गया- ‘तुमने ऐसा किया क्यों?’”
“तुमने कभी अपने मन की बात कही नहीं?”
“कही थी… कई बार। फिर समझ आया कि मेरी बात सुनने से ज्यादा लोगों को अपनी बात मनवाने की जल्दी है।”
कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।
श्वेता बोली- “कभी-कभी लगता है, जैसे मैं अपने ही जीवन में मेहमान बन गई हूँ। सबके लिए फैसले लिए… लेकिन अपने लिए फैसला लेने की हिम्मत ही नहीं बची।”
रीतू ने धीरे से पूछा- “तो अब क्या चाहती हो?”
श्वेता की आँखों से आँसू बह निकले- “बस इतना… कि कोई मुझे गलत समझे बिना एक बार पूछे- ‘श्वेता, तू सच में क्या चाहती है?’”
रीतू ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया- “तो आज मैं पूछती हूँ… श्वेता, तू क्या चाहती है?”
श्वेता बहुत देर तक रोती रही।
फिर आँसू पोंछकर बोली- “अब मैं अपनी जिंदगी दूसरों को समझाने के लिए नहीं… खुद को समझने के लिए जीना चाहती हूँ।”
रीतू मुस्कुराई- “फिर शुरू करो।”
“लोग बोलेंगे।”
“बोलने दो।”
“लोग सवाल करेंगे।”
“करने दो।”
“और अगर मुझे गलत समझा?”
रीतू ने कहा- “हर बार सही साबित होना जरूरी नहीं होता, श्वेता। कभी-कभी अपने मन में सही होना ही काफी होता है।”
श्वेता ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर लंबे समय बाद हल्की-सी मुस्कान थी।
“शायद… अब मुझे अपनी जिंदगी वापस अपने पास बुलानी चाहिए।”
रीतू ने कहा- “हाँ श्वेता… क्योंकि *आपकी ज़िंदगी आपकी अपनी है।*”
श्वेता ने धीमे से कहा-
“अब किसी से नाराज़ नहीं होना… बस खुद से दूर नहीं होना।
Love You Zindagi…”
~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल।
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