पाठक के खाली होते कमरे में साहित्य
रत्ना भदौरिया
साहित्य से पाठक का दूर होना केवल किताबों की बिक्री का संकट नहीं है। यह उस मानसिक भूगोल का बदलना है जिसमें कभी मनुष्य अपने एकांत में शब्दों के साथ बैठता था। किताब उसके लिए सूचना नहीं, आत्मसंवाद का माध्यम थी। अब वही एकांत मोबाइल की रोशनी से भरा रहता है। उंगली स्क्रीन पर चलती है और चेतना एक दृश्य से दूसरे दृश्य पर उछलती रहती है। पढ़ना जिस ठहराव की मांग करता है, जीवन से वह ठहराव धीरे-धीरे गायब हो रहा है। परिणाम सामने है—किताबें मौजूद हैं, पर उनके लिए मनुष्य के भीतर का समय सिकुड़ता जा रहा है।
इस परिवर्तन को केवल तकनीक के खाते में डाल देना सुविधाजनक होगा, सत्य नहीं। मोबाइल ने हमारी आदतों को बदला जरूर है, लेकिन उसने उस खालीपन को भी उजागर किया है जिसे भरने के लिए हमने स्वयं मनोरंजन और तात्कालिक सूचना को चुन लिया है। अब किसी बात पर देर तक विचार करना असुविधा पैदा करता है। एक विचार को पूरा होने देने से पहले दूसरा विचार सामने आ जाता है। साहित्य की धीमी आंच इस तेज उपभोग वाली संस्कृति में स्वाभाविक रूप से कठिन लगती है।
पर संकट का दूसरा चेहरा लेखक के संसार में दिखाई देता है।
पाठक कम हुआ तो साहित्यिक संसार ने पाठक को खोजने के बजाय दृश्यता का रास्ता पकड़ लिया। पुस्तक लिखना अब कई बार केवल रचना तक सीमित नहीं रहता; उसके साथ एक पूरा प्रचार-तंत्र खड़ा करना पड़ता है। लेखक अपने संसाधनों से पुस्तक छपवाता है, फिर विमोचन, परिचर्चा, प्रचार और वितरण की व्यवस्था करता है। यह स्थिति अपने आप में निंदनीय नहीं—प्रकाशन व्यवस्था की कठोर वास्तविकताओं ने अनेक लेखकों को यह रास्ता चुनने के लिए विवश किया है। आपत्ति उस क्षण पैदा होती है जब पुस्तक की साहित्यिक यात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी बाजार-यात्रा हो जाती है।
तब पुस्तक रचना से उत्पाद में बदलने लगती है।
विमोचन उसके जन्म का उत्सव नहीं रह जाता, उसकी बिक्री का प्रारंभिक अभियान बन जाता है। लेखक के सामने पाठक से पहले बाजार खड़ा दिखाई देता है। प्रतियां खरीदी जाती हैं, बांटी जाती हैं, परिचितों तक पहुंचाई जाती हैं और फिर बिक्री का आंकड़ा पुस्तक की सफलता के रूप में प्रस्तुत होता है। संख्या बढ़ जाती है, लेकिन उसके पीछे वास्तविक पाठकीय उपस्थिति कितनी है—इसका कोई हिसाब नहीं।
यहीं ‘बेस्टसेलर’ संस्कृति अपनी असली विडंबना के साथ सामने आती है। बिक्री साहित्यिक उपलब्धि का एक प्रमाण हो सकती है, साहित्यिक श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण नहीं। बाजार के पास गिनने के लिए प्रतियां हैं; उसके पास यह मापने का कोई पैमाना नहीं कि किसी पुस्तक ने कितने मनुष्यों के भीतर हलचल पैदा की। एक किताब हजार घरों में पहुंचकर अनपढ़ी रह सकती है और दूसरी किसी एक व्यक्ति के भीतर वर्षों तक जीवित रह सकती है। साहित्य का मूल्य दूसरी घटना में है, लेकिन बाजार पहली को अधिक आसानी से दर्ज करता है।
हमारी समस्या यहीं से शुरू होती है कि जो चीज आसानी से मापी जा सकती है, उसे हम अधिक महत्वपूर्ण मानने लगते हैं।
विमोचन संस्कृति भी इसी मनोविज्ञान का विस्तार है। पुस्तक के हाथ में आते ही लेखक का परिचय, मंच, अतिथि, पुष्प, कैमरा और सोशल मीडिया उसका नया परिवेश बन जाते हैं। समारोह समाप्त होने तक पुस्तक कई तस्वीरों में दिखाई देती है; उसके बाद उसका वास्तविक जीवन शुरू होना चाहिए—पाठक के साथ। लेकिन उस जीवन की कोई तस्वीर नहीं बनती। किसी कमरे में बैठा एक व्यक्ति पुस्तक के पन्नों पर झुका हुआ है; वह साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य हो सकता है, पर बाजार के लिए लगभग अदृश्य है।
इसलिए आज साहित्य के सामने विडंबना यह नहीं कि किताबें कम छप रही हैं। उलटे किताबें अधिक छप रही हैं। लेखक अधिक दिखाई दे रहे हैं। साहित्यिक आयोजन अधिक हो रहे हैं। फिर भी पाठक की उपस्थिति का प्रश्न बना हुआ है। शायद इसलिए कि हमने साहित्य के आसपास बहुत कुछ खड़ा कर दिया और साहित्य को स्वयं पीछे छोड़ दिया।
यहां लेखक को अपने भीतर भी देखना होगा। क्या वह लिखने के बाद अपनी रचना पर भरोसा करता है या उसकी स्वीकृति के लिए लगातार प्रमाण जुटाता है? क्या उसे पाठक चाहिए या दर्शक? क्या वह चाहता है कि उसकी किताब पढ़ी जाए या उसके बारे में बात होती रहे? प्रसिद्धि साहित्य की शत्रु नहीं, लेकिन जब प्रसिद्धि रचना का लक्ष्य बन जाती है तो कलम की स्वतंत्रता पर बाजार की छाया पड़ने लगती है। तब लेखक अनजाने में वही लिखने लगता है जिसे स्वीकार किए जाने की संभावना अधिक हो। साहित्य का सबसे जरूरी स्वभाव—असुविधा—यहीं कमजोर पड़ता है।
क्योंकि साहित्य का काम हमेशा मन बहलाना नहीं रहा। उसने समय के चेहरे पर हाथ रखकर पूछा है—यह चेहरा इतना कठोर क्यों है? उसने सत्ता से, समाज से, परंपरा से और स्वयं मनुष्य से सवाल किए हैं। ऐसी रचना हर बार बाजार के अनुकूल नहीं होती। जो शब्द बेचने में कठिन हों, क्या उन्हें लिखने का साहस बचा रहेगा? यदि लेखक पहले पाठक की पसंद और बाजार की मांग देखेगा, फिर अपना अनुभव शब्दों में ढालेगा, तो रचना कितनी अपनी रह जाएगी?
दूसरी ओर पाठक के सामने भी एक प्रश्न है। उसने किताब को छोड़ा तो उसके बदले क्या पाया? सूचना की प्रचुरता, मनोरंजन की अनंत उपलब्धता और संवाद के असंख्य मंच—लेकिन क्या उसके भीतर वह गहराई भी बची जिसमें कोई पुस्तक कई दिनों तक चुपचाप काम करती रहे? हम पहले किताब पढ़कर उसके बारे में सोचते थे; अब अक्सर किसी के कहे हुए के आधार पर किताब के बारे में राय बना लेते हैं। यह अंतर छोटा दिखाई देता है, पर यहीं पाठक और साहित्य के बीच का संबंध बदलता है।
किताब का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रद्दी में पहुंच जाना नहीं है। कागज का अंत दिखाई देता है। उससे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि किताब घर में सुरक्षित रहे, अलमारी में सम्मानपूर्वक खड़ी रहे, लेखक का नाम चलता रहे, संस्करण निकलते रहें और उसके पन्ने खोलने वाला कोई न हो।
तब सवाल किताब की मृत्यु का नहीं रहेगा।
सवाल यह होगा कि साहित्य के नाम पर जो कुछ बचा है, उसमें साहित्य कितना है।
और शायद उससे भी कठिन सवाल लेखक से पूछा जाएगा—जब तुम अपनी पुस्तक की हजारों प्रतियां बाजार में चलवा रहे थे, तब तुम किसे तलाश रहे थे?
पाठक को?
अपनी प्रसिद्धि को?
या उस भय से बचने का कोई रास्ता, कि कहीं इतने शब्द लिखने के बाद भी तुम्हें पढ़ने वाला कोई न मिले?
