चंदे से काले धन को सफेद करने का तिकड़म

चंदे से काले धन को सफेद करने का तिकड़म

ओमप्रकाश तिवारी

 

BBC News Hindi की पत्रकार शुभांगी मिश्रा की खोजी रिपोर्ट ने राजनीतिक चंदे की उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसमें चुनावी राजनीति से लगभग गायब दिखने वाली छह छोटी और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 1,700 करोड़ रुपये का चंदा मिला।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन पार्टियों के जमीनी अस्तित्व को लेकर भी सवाल सामने आए। पड़ताल में कुछ पार्टी कार्यालय बंद मिले। ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इन पार्टियों को इतना बड़ा चंदा किसने दिया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम राजनीतिक दलों को देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
यहीं से राजनीतिक चंदे की पूरी व्यवस्था और उसके संभावित दुरुपयोग का सवाल सामने आता है।
क्या राजनीतिक चंदा काले धन को सफेद करने का जरिया बन सकता है?
सिर्फ किसी राजनीतिक दल को चंदा दिया जाना अपने आप में काले धन को सफेद करने का प्रमाण नहीं है। लेकिन जांच एजेंसियों और विशेषज्ञों की ओर से समय-समय पर ऐसे मामलों की ओर ध्यान दिलाया गया है, जहां राजनीतिक दलों की विशेष कर व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता की कमजोरियों के कथित दुरुपयोग की आशंका जताई गई है।
यानी सवाल यह नहीं कि हर राजनीतिक चंदा काला धन है।
सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की व्यवस्था का इस्तेमाल कुछ मामलों में अघोषित आय, कर चोरी या संदिग्ध वित्तीय लेनदेन को छिपाने के लिए किया जा सकता है?
अगर ऐसा होता है तो राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा होने के बजाय वित्तीय लेनदेन की एक ऐसी कड़ी बन सकते हैं, जिसका इस्तेमाल चुनाव लड़ने से ज्यादा किसी और उद्देश्य के लिए किया जाए।
चंदा देने वाले को क्या फायदा मिलता है?
राजनीतिक दलों को चंदा देने पर आयकर कानून में विशेष प्रावधान हैं।
आयकर विभाग के अनुसार, धारा 80GGB के तहत कंपनियों और धारा 80GGC के तहत व्यक्तियों द्वारा राजनीतिक दल या Electoral Trust को किए गए पात्र योगदान पर कटौती का प्रावधान है। इसके लिए योगदान नकद में नहीं होना चाहिए।
यहां एक बात समझना जरूरी है।
इसे सामान्य भाषा में अक्सर “100 प्रतिशत टैक्स छूट” कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी ने एक करोड़ रुपये चंदा दिया तो सरकार उसे एक करोड़ रुपये वापस कर देती है।
इसका अर्थ है कि पात्र परिस्थितियों में योगदान की पूरी राशि कर योग्य आय की गणना में कटौती के लिए पात्र हो सकती है। इसलिए चंदा देने वाले की वास्तविक कर बचत उसकी आय और लागू कर व्यवस्था पर निर्भर करती है।
यही वह जगह है जहां राजनीतिक चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
फिर सवाल है—चंदा देता कौन है और क्यों देता है?
अगर कोई राजनीतिक पार्टी वास्तव में चुनावी गतिविधियों में सक्रिय है, उसके कार्यकर्ता हैं, उसका संगठन है और उसका राजनीतिक आधार है, तो उसे मिलने वाले चंदे का एक स्वाभाविक कारण समझ में आता है।
लेकिन जब किसी छोटे और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को असाधारण रूप से बड़ी रकम मिलती है, जबकि उसका जमीनी राजनीतिक अस्तित्व बेहद सीमित दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या यह वास्तव में राजनीतिक समर्थन का पैसा है?
या इसके पीछे कोई दूसरा आर्थिक हित है?
यही वह सवाल है जिसका जवाब सिर्फ पार्टी के खाते में पैसा आने से नहीं मिलता। यह जानना भी जरूरी है कि पैसा किसने दिया, किस उद्देश्य से दिया गया, उसका इस्तेमाल कहां हुआ और पार्टी ने उस रकम के बदले वास्तव में क्या राजनीतिक गतिविधि की।
कथित खेल कैसे हो सकता है?
जांच में सामने आए कुछ मामलों में जिस तरह के कथित तौर-तरीकों का उल्लेख हुआ है, उनमें बैंकिंग माध्यम से राजनीतिक दल को चंदा देना, उसके बाद उस रकम को विभिन्न खर्चों के नाम पर निकालना और कथित तौर पर उसका एक हिस्सा वापस करना शामिल है।
ऐसे मामलों में आरोप यह होता है कि कागज पर लेनदेन वैध दिखाई देता है—चंदा बैंक खाते में आया, उसकी रसीद बनी और खर्च भी खातों में दर्ज हुआ।
लेकिन अगर वास्तविकता में उस रकम का बड़ा हिस्सा फर्जी खर्चों के जरिए निकालकर वापस उसी व्यक्ति या नेटवर्क तक पहुंचता है जिसने चंदा दिया था, तो पूरा लेनदेन केवल राजनीतिक चंदा नहीं रह जाता।
वह कर लाभ, बैंकिंग लेनदेन और नकद वापसी के संभावित गठजोड़ का मामला बन जाता है।
यहीं पर कथित कमीशन का सवाल भी आता है।
यदि किसी ऐसे नेटवर्क में पार्टी या उसके संचालक रकम का एक हिस्सा अपने पास रखकर बाकी रकम वापस करते हैं, तो वह व्यवस्था राजनीतिक चंदे से आगे बढ़कर एक वित्तीय तंत्र का रूप ले सकती है।
लेकिन यह स्पष्ट रहना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था का आरोप किसी भी पार्टी के मामले में जांच और प्रमाण के आधार पर ही स्थापित किया जा सकता है।
फिर ऐसी व्यवस्था पर रोक मुश्किल क्यों है?
राजनीतिक दलों के लिए कानून में विशेष प्रावधान हैं।
चुनाव आयोग के अनुसार, राजनीतिक दलों को मिलने वाले ₹20,000 से अधिक के योगदान की रिपोर्ट तैयार करनी होती है।
लेकिन सवाल यह है कि अगर बड़ी रकम को छोटे-छोटे योगदानों में बांटकर दर्ज किया जाए, तो वास्तविक दानदाता की पहचान और रकम के स्रोत का पता लगाना कितना आसान रह जाता है?
यही वह क्षेत्र है जहां पारदर्शिता और निगरानी की व्यवस्था की परीक्षा होती है।
एक तरफ कानून बड़े योगदान की रिपोर्टिंग की व्यवस्था करता है, दूसरी तरफ छोटे योगदानों की रिपोर्टिंग का ढांचा अलग है। इसलिए केवल कागज पर बने रिकॉर्ड को देखना पर्याप्त नहीं हो सकता। जरूरत इस बात की है कि पार्टी की वास्तविक गतिविधि और उसके वित्तीय रिकॉर्ड का मिलान भी किया जाए।
राजनीतिक दलों को मिलने वाली कर छूट का सवाल
राजनीतिक दलों को कानून के तहत विशेष कर लाभ प्राप्त हैं। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है क्योंकि राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लेकिन हर विशेष सुविधा के साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
अगर कोई पार्टी राजनीतिक गतिविधि के नाम पर बड़ी रकम हासिल करती है, तो यह देखना भी जरूरी है कि वह पैसा वास्तव में राजनीतिक गतिविधियों पर खर्च हुआ या नहीं।
अगर पार्टी के खाते में करोड़ों रुपये आते हैं, लेकिन जमीन पर पार्टी का कोई उल्लेखनीय संगठन, कार्यालय, चुनावी गतिविधि या जनसंपर्क दिखाई नहीं देता, तो पैसे के स्रोत और इस्तेमाल की जांच का सवाल और गंभीर हो जाता है।
असली सवाल राजनीतिक चंदे से बड़ा है
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि छह पार्टियों को 1,700 करोड़ रुपये क्यों मिले।
सवाल यह है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली विशेष कर और वित्तीय व्यवस्था का दुरुपयोग रोकने के लिए निगरानी कितनी प्रभावी है?
किसी राजनीतिक दल को चंदा देना लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन अगर राजनीतिक दल का इस्तेमाल किसी व्यक्ति या कारोबारी की अघोषित आय को घुमाने, कर देनदारी कम करने या नकदी वापस हासिल करने के लिए किया जाता है, तो यह सिर्फ टैक्स चोरी का मामला नहीं रहेगा।
यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल होगा।
क्योंकि राजनीतिक दल जनता से वोट मांगते हैं और लोकतंत्र जनता के पैसे तथा विश्वास से चलता है।
इसलिए राजनीतिक चंदे का हिसाब सिर्फ पार्टी की बैलेंस शीट का विषय नहीं होना चाहिए।
यह जनता को भी पता होना चाहिए कि राजनीतिक दल को पैसा किसने दिया, क्यों दिया और वह पैसा आखिर गया कहां।
BBC News Hindi की पत्रकार शुभांगी मिश्रा की खोजी रिपोर्ट ने इसी सवाल को सामने रखा है।
अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित संस्थाएं यह जांचें कि इन छह पार्टियों को मिले करीब 1,700 करोड़ रुपये के पीछे वास्तविक राजनीतिक गतिविधि थी या किसी बड़े वित्तीय तंत्र की परछाई।
क्योंकि अगर राजनीति के नाम पर पैसा आया और राजनीति पर खर्च हुए बिना कहीं और लौट गया, तो सवाल सिर्फ चंदे का नहीं है।
सवाल यह है कि लोकतंत्र की आड़ में कहीं पैसे का कोई ऐसा रास्ता तो नहीं बनाया जा रहा, जिसमें कागज पर सब कुछ सफेद दिखे और असल में खेल कुछ और हो।

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