स्वरा भास्कर जी, असहमति भी स्त्री की स्वतंत्र आवाज़ है

स्वरा भास्कर जी, असहमति भी स्त्री की स्वतंत्र आवाज़ है

रत्ना भदौरिया

 

आपसे मेरी अनेक सहमतियाँ हैं। आपकी बेबाकी, आपकी स्पष्टवादिता और सत्ता के सामने बिना झुके अपनी बात कहने का साहस मुझे प्रभावित करता है। फासीवादी ताकतों, सामंती मानसिकता, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और तानाशाही के विरुद्ध आपकी मुखरता उन आवाज़ों में शामिल है जो सुविधाजनक चुप्पी को स्वीकार नहीं करतीं। स्त्री-विमर्श के प्रश्नों पर भी आपने जिस निर्भीकता से अपनी बात रखी है, वह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।

लेकिन शायद इसी कारण आपकी कही हुई किसी बात से असहमति जताना भी जरूरी हो जाता है।

कल आपने महिलाओं को जिस संदर्भ में ‘कायर’ कहा, उससे मैं सहमत नहीं हूँ। बल्कि मुझे लगता है कि स्त्री के जीवन की जटिलताओं को समझने के लिए इस शब्द पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

किसी महिला का दब जाना हमेशा उसकी कमजोरी नहीं होता।

किसी स्त्री का चुप रह जाना हमेशा कायरता नहीं होता।

किसी अन्याय के सामने प्रतिरोध न कर पाना हमेशा साहस की कमी नहीं होता।

उस चुप्पी के पीछे जाने कितने अदृश्य भय खड़े हो सकते हैं—आर्थिक निर्भरता, परिवार का दबाव, बच्चों की जिम्मेदारी, सामाजिक बहिष्कार, हिंसा की आशंका, नौकरी खोने का डर, पति या परिवार पर निर्भरता, जातीय-सामाजिक संरचनाएँ, धार्मिक रूढ़ियाँ और बचपन से भीतर तक उतार दिया गया वह संस्कार कि ‘अच्छी स्त्री सवाल नहीं करती।’

जिस स्त्री को बचपन से अपनी इच्छा के विरुद्ध जीना सिखाया गया हो, उससे अचानक यह अपेक्षा करना कि वह हर परिस्थिति में आपके जैसा प्रतिरोध करेगी—क्या स्वयं उसके संघर्ष की वास्तविकता को नकार देना नहीं है?

हम अक्सर स्त्री से पूछते हैं—
“तुमने विरोध क्यों नहीं किया?”
लेकिन शायद असली सवाल होना चाहिए—
“तुम्हें विरोध करने से रोकने वाली परिस्थितियाँ क्या थीं?”

इन दोनों सवालों के बीच ही स्त्री-विमर्श की संवेदना और उसकी कठोरता का अंतर छिपा है।
आपने अपने जीवन में जो स्वतंत्रता अर्जित की है, वह आपकी उपलब्धि है। आपकी तरह खुले विचारों से जीना आपका अधिकार है। लेकिन हर महिला आपकी तरह सोचे, आपकी तरह कपड़े पहने, आपकी तरह अपनी बात रखे और आपकी तरह जोखिम उठाए—यह अपेक्षा भी तो स्वतंत्रता की एक नई सीमा रेखा खींचने जैसी होगी।

हर स्त्री को स्वरा भास्कर बनने की आवश्यकता नहीं है।

और सच कहूँ तो नारीवाद का उद्देश्य भी हर स्त्री को किसी एक साँचे में ढालना नहीं होना चाहिए।

यदि पितृसत्ता स्त्री से कहती है—
“तुम्हें ऐसे ही जीना होगा।”
तो नारीवाद को यह नहीं कहना चाहिए—
“तुम्हें मेरे तरीके से ही स्वतंत्र होना होगा।”

स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि स्त्री को अपना रास्ता चुनने का अधिकार मिले—भले ही उसका चुना हुआ रास्ता हमें पसंद न हो।
और फिर आता है कपड़ों का सवाल
कल आपको बार-बार अपने कपड़ों की ओर देखते हुए देखकर एक दूसरा प्रश्न भी मन में आया। शायद आप उस पोशाक में स्वयं को पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर रही थीं। यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है। आखिर कपड़े हमारे शरीर और व्यक्तित्व की सहजता के लिए होते हैं।

लेकिन तब प्रश्न उठता है—
क्या हम कपड़े अपनी सुविधा के लिए पहनते हैं या कभी-कभी दूसरों की निगाह अपने ऊपर टिकाने के लिए भी?
यह प्रश्न किसी महिला के कपड़ों पर नैतिक पहरा लगाने के लिए नहीं है। न ही किसी महिला के पहनावे को उसके चरित्र से जोड़ना उचित है। स्त्री को क्या पहनना है, क्या नहीं पहनना है—इसका निर्णय सबसे पहले और अंततः उसी का होना चाहिए।

लेकिन क्या विशेष प्रकार की पोशाक को नारीवाद का प्रमाण मान लेना भी उचित है?
क्या कट-स्लिप पहनना नारीवाद है?
क्या साड़ी पहनना गैर-नारीवादी होना है?
क्या शरीर को ढँक लेना पिछड़ापन है?
क्या शरीर को अधिक दिखाना आधुनिकता का प्रमाण है?

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

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