घर में धर्म की हवा थी, पर बच्ची पूछती थी सवाल

व्यक्तित्व

घर में धर्म की हवा थी, पर बच्ची पूछती थी सवाल

अमृता प्रीतम के जीवन की दास्तां, गुजरांवालां से लेकर दिल्ली तक

 

राहुल मिश्रा

 

एक ट्रक ड्राइवर ने रात के ढाबे पर सुनी बातें एक कागज पर उतारीं, और उन्हें लिफाफे में बंद कर दिया।

पते की जगह लिखा के-25, हौज खास, नई दिल्ली।

वो उस औरत से कभी मिला नहीं था।

हफ्ते भर में जवाब आ गया। एक पोस्टकार्ड।

और उस ड्राइवर का नाम हमेशा के लिए बदल गया।

साल था 1979। वो कोलकाता में रहता था और सड़क पर ही उसकी जिंदगी कटती थी। किसी साहित्यिक हलके में उसे कोई नहीं जानता था, और उसने कोई अदबी दावा भी नहीं किया था। उसने बस वो लिखा जो ड्राइवर आपस में बोलते हैं। नींद। उधार। घर से दूरी। अगली फेरी।

पोस्टकार्ड पर लिखा था कि यह लिखत अनोखी है और अगले अंक में छपेगी।

वो पत्रिका थी नागमणि।

और उसे एक औरत अपने घर के भीतर से निकालती थी। रचना चुनने से लेकर सजावट, छपाई, डाक और लिफाफों पर पते लिखने तक। तैंतीस बरस।

उसके पास तब तक देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान आ चुके थे।

और वो फिर भी लिफाफों पर पते अपने हाथ से लिख रही थी।

क्यों?

इसका जवाब उस पोस्टकार्ड में नहीं है।

वो जवाब एक टेलीफोन बूथ में खड़ा है। जहां बरसों पहले उसने एक नंबर मिलाना शुरू किया था, और बीच में ही चोंगा रख दिया था।

अब शुरू से शुरू करते हैं।

गुजरांवाला। 1919 की अगस्त की आखिरी तारीख। एक अकेली बच्ची पैदा हुई। मां स्कूल में पढ़ाती थीं। पिता कविता लिखते थे, ब्रजभाषा के जानकार थे, एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे, और सिख धर्म के प्रचारक भी थे।

घर में धर्म की हवा थी। पर बच्ची सवाल पूछती थी।

घर में मेहमान आते तो कुछ के लिए अलग बर्तन निकाले जाते थे। जो अपने नहीं थे, उनके लिए अलग। बच्ची ने पूछा कि ऐसा क्यों। यह उसकी पहली बगावत थी, और इसका जिक्र उसने बाद में खुद किया।

फिर वो हुआ जिसने सब बदल दिया।

मां बीमार पड़ीं। बच्ची ने बड़ों से सुन रखा था कि बच्चों की बात ईश्वर नहीं टालता। वो मां की खाट के पास खड़ी होकर दुआ मांगती रही। पूरे यकीन के साथ, कि अब कुछ नहीं होगा।

मां चली गईं। बच्ची ग्यारह की थी।

उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसी दिन उसका ईश्वर पर से भरोसा उठ गया।

और वो भरोसा जिंदगी भर लौटकर नहीं आया।

पिता ने उसे छंद सिखाया था, बहर सिखाई थी। आठ बरस की उम्र में वो पिता के साथ बैठकर तुक मिलाने लगी थी। मां के जाने के बाद वही तुकें उसका इकलौता साथ बन गईं।

पिता चाहते थे कि वो भक्ति की कविता लिखे।

उसने वो लिखा जो उसे लिखना था।

घर लाहौर आ गया। बचपन में ही उसकी मंगनी तय हो चुकी थी लड़का अनारकली बाजार के एक होजरी व्यापारी का बेटा था, जो आगे चलकर संपादक बना।

सोलह की उम्र में शादी हुई। और शादी के साथ उसका नाम बदल गया। अमृत कौर से अमृता प्रीतम।

जो नाम उसने खुद नहीं चुना था, वही आगे चलकर पंजाबी अदब की सबसे बड़ी पहचान बन गया।

उसी बरस उसका पहला कविता संग्रह छपा। नाम था अमृत लहरां।

अब एक छोटा-सा दृश्य, जिस पर आगे चलकर बहुत कुछ टिकने वाला है।

उसने संगीत और नृत्य की तालीम ली थी, और लाहौर रेडियो पर लोकगीत गाने लगी थी। बाद में वो अपनी कविताएं भी रेडियो पर पढ़ने लगी।

पति को यह पसंद नहीं था।

उन्होंने एक पेशकश की कि रेडियो से जितने पैसे मिलते हैं, उतने वो खुद दे देंगे।

उसने मना कर दिया।

क्योंकि बात पैसे की थी ही नहीं। बात उन लोगों की थी जो दूसरी तरफ बैठकर सुन रहे थे।

यह उस औरत का पहला फैसला था जो उसने अपने घर के भीतर लिया, और जिसका कोई गवाह नहीं था।

फिर उसका सुर बदलने लगा।

1943 में बंगाल में अकाल पड़ा। लाखों लोग भूख से मरे। अगले बरस उसका जो संग्रह आया, उसमें प्रेम कविताएं नहीं थीं। उसमें लोगों की पीड़ा थी। नाम भी वही रखा लोक पीड़।

और फिर 1947 आया।

लाहौर छूटा। वो शहर, जहां उसकी जवानी थी, जहां उसका घर था, जहां उसकी किताबें छपी थीं। वो देहरादून पहुंची, फिर काम की तलाश में दिल्ली आई।

और उसी रास्ते पर चलती एक रेल में, अट्ठाईस बरस की उम्र में, उसने कागज के एक टुकड़े पर वो नज्म लिखी जो आज भी सरहद के दोनों तरफ पढ़ी जाती है।

उसने खुद लिखा है कि उस रात आंखों में नींद नहीं थी। बाहर घुप अंधेरा था। हवा ऐसे कराह रही थी जैसे इतिहास की गोद में बैठकर रो रही हो। कहीं ऊंचे पेड़ खड़े थे, और कहीं पेड़ भी नहीं थे सिर्फ उजाड़ था, और उस उजाड़ के टीले कब्रों जैसे लग रहे थे।

और उसके भीतर वारिस शाह की एक पंक्ति घूम रही थी। कि मरे हुओं और बिछड़े हुओं को कौन मिलाता है।

नज्म: “अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कितों कबरां विचों बोल!

ते अज्ज किताब-ए-इश्क दा, कोई अगला वरका फोल!

इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण,

अज्ज लखां धियां रोंदियां, तेनूं वारिस शाह नूं कहण!

उठ दर्दमंदां देया दरदिया, उठ तक अपना पंजाब,

अज्ज बेले लाशां बिछियां, ते लहू दी भरी चनाब!…”

नज्म वारिस शाह के नाम लिखी गई। उसी वारिस शाह के, जिसकी और उसकी जन्मभूमि एक थी।

दिल्ली में उसे आकाशवाणी की पंजाबी सेवा में नौकरी मिली। और उन्हीं बरसों में लाहौर से उजड़कर आए लेखकों और कलाकारों को पुनर्वास आयुक्त एम.एस. रंधावा ने दिल्ली में प्लॉट दिलवाए।

पड़ोस में भी वही लोग थे, जिनके घर पीछे छूट गए थे।

उसका प्लॉट था के-25, हौज खास।

यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है, क्योंकि इस पर अक्सर बहस होती है। यह जमीन ज्ञानपीठ के पैसों से नहीं खरीदी गई थी। ज्ञानपीठ उन्हें इसके दो दशक से भी ज्यादा बाद मिला, जबकि नागमणि 1966 से इसी पते से निकल रही थी। जमीन पुनर्वास में मिली थी। घर उस जमीन पर उन्होंने खुद खड़ा किया।

पहले पिता का घर। फिर पति का घर। और अब पहली बार, अपना घर।

जिस औरत का पता उससे छिन गया था, उसे एक नया पता मिला। और आगे चलकर वो यही पता हजारों लिफाफों पर अपने हाथ से लिखने वाली थी।

1956 में उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला। पंजाबी में किसी रचना के लिए यह सम्मान पाने वाली वो पहली औरत थी।

जिस लंबी कविता पर यह सम्मान मिला, उसका नाम था सुनेहड़े। यानी संदेश।

पर संदेश किसके नाम थे?

इसके लिए बारह बरस पीछे चलना होगा।

1944। लाहौर और अमृतसर के बीच एक गांव है, प्रीत नगर। वहां एक मुशायरा हुआ, जिसमें पंजाबी और उर्दू दोनों तरफ के शायर जुटे थे।

वो तब पच्चीस के आसपास थी, और शादीशुदा थी।

उसी मंच पर उसने पहली बार एक शायर को सुना।

उसने बाद में लिखा कि उसे आज तक नहीं पता कि उसे उन लफ्जों के जादू ने बांधा था, या उस खामोश निगाह ने।

मुशायरा आधी रात के बाद खत्म हुआ। लौटती बस तक चलते हुए उसे सिर्फ इतना होश था कि वो उस आदमी की परछाईं में चल रही है।

नाम साहिर लुधियानवी।

वो उर्दू में लिखता था, वो पंजाबी में। और आगे के बरसों में उन दोनों के बीच जो सबसे ज्यादा चला, वो न शायरी थी, न बातचीत।

चुप्पी थी।

उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब साहिर लाहौर में उससे मिलने आता, तो लगता जैसे उसकी अपनी खामोशी का ही एक हिस्सा बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया हो, और फिर चुपचाप उठकर चला गया हो।

वो बैठकर सिगरेट पीता था। आधी पीकर बुझा देता, फिर नई सुलगा लेता।

वो चला जाता, तो कमरे में अधजली सिगरेटें बची रह जातीं।

और वो उन्हें उठाकर संभालकर रख लेती थी।

बाद में उन्हीं को सुलगाती थी।

उसने खुद लिखा है कि जब वो उनमें से कोई सिगरेट उंगलियों में पकड़ती, तो उसे लगता जैसे उसने उस आदमी का हाथ छू लिया हो। और इसी तरह उसे सिगरेट की आदत लगी।

यह किसी उपन्यास का दृश्य नहीं है। यह उसने अपनी किताब में खुद दर्ज किया है, अपने नाम के साथ यह जानते हुए कि उस जमाने में एक औरत का इतना साफ लिखना कितना बड़ा हंगामा खड़ा करेगा।

एक हिंदी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उसने अपने और साहिर के रिश्ते को एक ही वाक्य में बांध दिया था। कि साहिर उसका सार्त्र था, और वो उसकी सीमोन।

पर सार्त्र कभी दिल्ली नहीं आया।

बंटवारे ने दोनों को अलग-अलग शहर दे दिए। वो फिल्मों की दुनिया में चला गया, वो दिल्ली में रह गई। बीच में रह गईं सिर्फ चिट्ठियां।

उन चिट्ठियों में उसने उसे अपना शायर लिखा। अपना महबूब लिखा। अपना खुदा लिखा।

और उसने?

उसने उम्र भर शादी नहीं की। पर उसे अपने साथ भी नहीं रखा। एक बार उसने अपनी मां को बताया जरूर था कि यह औरत उनकी बहू हो सकती थी।

बता देना और साथ ले जाना, दो अलग बातें हैं।

सुनेहड़े इसी खाली जगह में लिखी गई। संदेशों की एक लंबी कविता, उस आदमी के नाम, जो जवाब नहीं देता था।

उसने खुद कहा है कि इस रिश्ते में ज्यादा दीवानी वो थी, और सुनेहड़े उसी के नाम संदेशों से भरी हुई थी। पर उन संदेशों ने उसे पिघलाया नहीं।

और फिर उसने जो जोड़ा, वो इस पूरी कहानी का सबसे साहसी वाक्य है।

उसने कहा कि उसकी मुहब्बत फिर भी बेकार नहीं गई क्योंकि उसी किताब पर उसे साहित्य अकादेमी मिल गया।

अब वो टेलीफोन बूथ।

सम्मान की खबर मिलने पर उसने सोचा कि यह बात सबसे पहले उसी आदमी को बतानी चाहिए। वो बूथ पर गई और नंबर घुमाना शुरू किया।

घुमाते-घुमाते उसकी नजर वहीं बिकने वाली एक पत्रिका पर पड़ी।

उस पर छपी खबर का शीर्षक था कि साहिर को उसका नया प्यार मिल गया है।

उसने चोंगा रख दिया।

और घर लौट आई।

देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान जिस कविता पर मिला था, उसकी खबर उस आदमी तक पहुंची ही नहीं जिसके लिए वो कविता लिखी गई थी।

उन दोनों के बीच जो चुप्पी इसके बाद पसरी, उस पर उसने आगे चलकर एक पूरी रचना लिखी। नाम रखा सात बरस।

1960 में उसने वो शादी छोड़ दी जो बचपन में तय हुई थी।

और यहां उस आदमी का जिक्र जरूरी है, जिसका नाम इस कहानी में सबसे कम लिया जाता है।

प्रीतम सिंह।

उन्हें आसानी से खलनायक बनाया जा सकता था। पर तथ्य दूसरी तरफ जाते हैं।

अमृता ने खुद एक इंटरव्यू में कहा है कि उसे बहुत कम उम्र में ब्याह दिया गया था, और शादी के बाद उसे वो माहौल नहीं मिला जो एक लेखक को चाहिए होता है इसलिए उसने तय किया कि वो अपना माहौल खुद बनाएगी।

और यह भी दर्ज है कि वो घर से दुश्मनी लेकर नहीं निकली। दोनों बच्चे उसके साथ आए। और उस आदमी ने खुद उसे जाने के लिए कहा, ताकि वो लेखक की जिंदगी जी सके।

जिस आदमी ने कभी उसका रेडियो पर पढ़ना पसंद नहीं किया था, उसी ने आखिर में उसे लिखने के लिए जाने दिया। पर उस प्रीतम सिंह को वह अपने नाम में साथ ले आई और कभी नहीं हटाया।

अगले ही बरस रेडियो की नौकरी भी छूट गई।

अब उसके पास न पति था, न नौकरी, न वो शहर जिसमें वो पैदा हुई थी।

और न वो शायर।

पर एक आदमी था।

वो पेशे से चित्रकार था। बंबई में उसने फिल्मों के पोस्टर बनाए थे, गुरुदत्त जैसे लोगों के साथ काम किया था। किसी किताब का कवर बनाने के सिलसिले में उससे मुलाकात हुई थी। फिर वो उसे रोज दफ्तर छोड़ने और लेने लगा पहले साइकिल पर, फिर स्कूटर पर। बच्चों को स्कूल भी वही छोड़ता था।

उसका असली नाम इंदरजीत था। उसने अपना नाम बदलकर इमरोज रख लिया।

इमरोज फारसी और उर्दू का शब्द है। इसका मतलब है आज।

एक किस्सा और चलता है कि यह नाम अंग्रेजी के ‘आई एम रोज’ से बना। जिन लोगों ने यह लिखा है, उन्होंने खुद लिखा है कि उन्होंने यह कहीं सुना था। दर्ज कहीं नहीं है। जो दर्ज है वो यही है कि इमरोज का मतलब आज होता है।

और नाम बेवजह नहीं था।

एक औरत जिसका सारा बीता हुआ कल सरहद के उस पार छूट गया था, उसके साथ अब एक आदमी था जिसका नाम ही आज था।

अब वो बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे अजीब और सबसे सच्ची बात है।

इमरोज ने खुद बताया है कि जब वो उन्हें स्कूटर पर बिठाकर ले जाते थे, तो वो पीछे बैठी-बैठी अपनी उंगली से उनकी पीठ पर एक नाम लिखा करती थीं।

साहिर।

किसी ने इमरोज से पूछा कि यह उन्हें चुभता नहीं था।

उन्होंने कहा कि वो नाम उसकी पीठ पर भी था और मेरी पीठ पर भी। फिर एतराज किस बात का।

लेखिका उमा त्रिलोक ने यही सवाल दूसरे ढंग से पूछा। इमरोज ने कहा कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया था और जहाँ मुहब्बत में अहंकार न हो, बहस न हो, बनावटी इंतजाम न हों और हिसाब न हो, वहाँ मुश्किल पैदा ही नहीं होती।

पर सबसे बड़ी बात यह नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह है कि आगे चलकर साहिर और इमरोज अच्छे दोस्त बन गए।

और साहिर की एक किताब का कवर इमरोज ने ही बनाया।

जिस आदमी का नाम उसकी पीठ पर लिखा जाता था, उसी की किताब उसने अपने हाथों से सजाई।

1980 में साहिर चला गया।

जिस दिन यह खबर आई, उसने अपनी डायरी में लिखा कि आज उसका खुदा मर गया।

जिस आदमी ने उसे कभी अपने साथ नहीं रखा, उसके जाने पर उसने अपना एक हिस्सा भी विदा कर दिया।

पर 1980 अभी दूर था। उससे चौदह बरस पहले, इसी घर में एक और काम शुरू हो चुका था।

1966। इमरोज और अमृता ने एक पत्रिका शुरू की। सुझाव उनके दोस्त और कवि सती कुमार का था। सजावट इमरोज ने संभाली। नाम रखा गया नागमणि।

नागमणि, यानी वो मणि जो लोककथाओं में साँप के सिर में होती है, और अंधेरे में चमकती है।

नाम भी बेवजह नहीं था।

पत्रिका का कागज हल्का भूरा रखा गया। एक कवि ने बताया कि इसकी वजह पूछने पर उसने कहा था कि रंगों के पास भी अपने भाव होते हैं।

किसी नामी लेखक ने ताना मारा कि इस कागज की वजह से रद्दी वाले तक नागमणि लेने से कतराते हैं।

उसका जवाब तुरंत आया नागमणि ही इकलौती पंजाबी पत्रिका है जो रद्दी में नहीं जाती।

पर असली बात कागज नहीं थी। असली बात डाक थी।

उस दौर की बाकी पत्रिकाओं में रचना भेजकर लेखक महीनों चुप्पी झेलते थे। नागमणि में तीन दिन के भीतर पोस्टकार्ड चला जाता था कि रचना मिल गई। और हफ्ते भर के भीतर हाँ या ना, वजह के साथ।

नौजवान लेखक उन चिट्ठियों को तमगे की तरह दिखाते थे। जिनकी रचनाएं लौट आतीं, वो चिढ़कर इन लेखकों को दरबारी कहते थे।

पर उन चिट्ठियों ने जो बनाया, वो अब पंजाबी साहित्य का इतिहास है।

जालंधर में एक दिहाड़ी मजदूर था। उसने सड़क किनारे छोड़ दिया गया एक नवजात देखा, और उस बच्चे के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनकर 1970 में नागमणि को भेज दी। छपने तक वो ज्ञानी कर रहा था, और उसका मास्टर पत्रिका में उसका नाम देखकर दंग रह गया।

आगे चलकर वो प्रेम गोरखी कहलाया, और दबे-कुचले लोगों का दर्द लिखने वाला बड़ा कहानीकार माना गया। उसने खुद कहा है कि वो ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं था, उस औरत ने उसे लेखक बना दिया।

सिक्किम में तैनात एक फौजी कप्तान ने 1971 में एक सिपाही की कहानी लिखी, जो अपनी गर्भवती पत्नी को घर छोड़कर गया और जंग की वजह से लौट नहीं सका। कप्तान का नाम था जसबीर भुल्लर। वो कहानी पंजाबी की सबसे अच्छी फौजी कहानियों में गिनी जाती है।

जवाब में उसे लिखा गया कि फौज की जिंदगी पर गहराई से लिखा ही नहीं गया है, इसलिए ऐसी और कहानियां आनी चाहिए।

एक राजमिस्त्री था, किरपाल कजाक। उसने घुमंतू कबीलों पर जो काम किया, उसे दुनिया ने सराहा।

और एक बागी कवि था, पाश। जब वो जेल में था, उसकी कविताएं नागमणि के मुखपृष्ठ पर छपीं।

एक बार उसने अपनी प्रेमिका की छोटी-सी तस्वीर भिजवाई, अपनी विदा वाली कविता के साथ, और झिझकते हुए गुजारिश की कि चेहरा ऐसे बनाया जाए कि कोई पहचान न सके।

अगले अंक में कविता के साथ एक पेड़ छपा। और उस पेड़ के तने में एक चेहरा छिपा था, जिसे शायद सिर्फ दो लोग पहचान सकते थे।

और वो कोलकाता वाला ट्रक ड्राइवर?

उसका नाम था बलदेव सिंह।

दूसरी रचना भेजने पर उसे पूरा स्तंभ मिल गया। नाम रखा गया सड़कनामा सड़क पर बीतती जिंदगी का ब्योरा। वो स्तंभ पत्रिका के आखिरी अंक तक चला।

और ड्राइवर ने वो नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया। बलदेव सिंह सड़कनामा।

आगे चलकर उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला।

उसने बाद में कहा कि अगर नागमणि न होती, तो उसके वो सब अनुभव शायद वक्त में कहीं खो जाते।

यह कहानी किसी बड़ी लेखिका की नहीं है। यह उस लौटती डाक की कहानी है, जो किसी को पहली बार यह बताती थी कि वो लिख सकता है।

सम्मान उसे मिलते रहे। पद्मश्री। ज्ञानपीठ। बुल्गारिया और फ्रांस के सम्मान। छह बरस राज्यसभा में। और आखिरी बरसों में पद्मविभूषण।

सब उससे सहमत नहीं थे। लंदन में बसे कवि अमरजीत चंदन और चंडीगढ़ के गुरबचन जैसे लेखकों ने खुलकर कहा कि नागमणि का केंद्र हमेशा वो खुद रहीं, और उसकी नकल करने वाले नौजवान लेखकों की एक पूरी कतार खड़ी हो गई।

यह असहमति भी दर्ज होनी चाहिए। क्योंकि जिस पत्रिका ने असहमति को जगह दी, उसकी कहानी में असहमति छिपाना बेईमानी होगी।

नब्बे के दशक के आखिर में खबर आई कि सेहत और खर्च की वजह से पत्रिका बंद हो रही है।

पाठकों ने विरोध किया। पत्रिका चलती रही।

पर 2001 में एक अंक के पन्नों पर एक छोटा-सा नोट छपा। यह आखिरी अंक है।

एक पुराने लेखक ने कहा कि वो रिटायर हो रहा है, पत्रिका वो चला लेगा। कुछ पाठकों ने कहा कि वो ट्रस्ट बना देंगे।

अगले महीने पाठकों के घर डाक आई।

लिफाफे में पत्रिका नहीं थी।

उसमें इमरोज के दस्तखत वाला एक मनीऑर्डर था, और साथ में गुजारिश कि बची हुई सदस्यता की रकम वापस ले ली जाए।

तैंतीस बरस जिस डाक ने लोगों को लेखक बनाया था, वो डाक आखिरी बार पैसे लौटाने आई थी।

और अब वो बात, जिसका जवाब आज तक किसी ने ठीक से नहीं दिया।

अमृता ने वो घर छोड़ दिया था। उस रिश्ते से बाहर निकल आई थी। चालीस बरस किसी और के साथ रहीं।

पर उन्होंने अपने नाम के साथ से प्रीतम कभी नहीं हटाया।

आखिरी दिन तक नहीं।

वजह उन्होंने कहीं नहीं बताई। इसलिए मैं भी नहीं बताऊंगा अंदाजा लगाना इस पन्ने का काम नहीं है।

जो दर्ज है, वो सिर्फ इतना है। बरसों ने उस कड़वाहट को घिस दिया था। और जब प्रीतम सिंह आखिरी दिनों में बीमार पड़े, तो अमृता दिन में दो बार उनके पास जाती थीं। हर बार कुछ घंटे बैठती थीं।

आखिरी दिन तक।

फिर उसकी अपनी बारी आई।

आखिरी बरसों में वो बिस्तर पर थीं। पत्रकार निरुपमा दत्त उनसे मिलने गईं। उन्होंने लिखा है कि उस हालत में भी वो शरारत कर रही थीं, और पूछ रही थीं कि जिंदगी में कोई नया प्रेम आया या नहीं।

उन्होंने अपनी आखिरी नज्मों में से एक उन्हें सुनाई। वो नज्म इमरोज के लिए थी, और उसका मतलब इतना भर था कि वो लौटकर फिर मिलेंगी। कहां, कैसे, यह उन्हें भी नहीं पता था।

“मैं तैनू फिर मिलांगी,

कित्थे? किस तरह? पता नहीं…

शायद तेरे तख़्तयल दी चिंगारी बण के

तेरे कैनवास ते उतरांगी

जा खोरे तेरे कैनवास दे उत्ते

इक रहस्यमयी लकीर बण के

खामोश तैनू तक्दी रवांगी!”

निरुपमा ने उसका अनुवाद किया, और उन्होंने वो अनुवाद नींद में जाने से पहले पढ़ लिया।

और एक छोटी-सी बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप बात है।

इमरोज अगर पानी का गिलास लेने भी कमरे से बाहर जाते, तो वो पीछे से लोकगीत की एक पंक्ति पुकार देतीं कि मरती हुई को छोड़कर मत जाना, मेरे साथी।

31 अक्टूबर 2005। वो नींद में चली गईं।

अंतिम संस्कार उनकी अपनी इच्छा के मुताबिक हुआ। कोई भाषण नहीं। कोई भीड़ नहीं। सिर्फ उनके बच्चे और इमरोज उनका शरीर लेकर गए।

जिस औरत की जिंदगी पर देश बहस करता रहा, उसने अपनी विदाई के लिए सिर्फ खामोशी मांगी थी।

और अब आखिरी बात।

उन्होंने वसीयत में लिखा था कि हौज खास वाला घर उनकी याद में वैसा ही रहे, और इमरोज वहीं रहें। उस घर के आँगन में दोनों ने मिलकर एक हरसिंगार लगाया था। खिड़कियों में बोगनवेलिया लटकता था। दीवारों पर इमरोज ने उनका चेहरा बार-बार उतारा था, और उनकी पंक्तियां लैंपशेड, कलमदान और घड़ियों तक पर लिख रखी थीं।

उनके जाने के पांच बरस बाद वो घर बिक गया।

और गिरा दिया गया।

इमरोज उसे गिरते हुए देखने गए थे। अस्सी पार कर चुके थे। रोक कुछ नहीं सकते थे।

मलबे से उन्होंने सिर्फ एक चीज उठाई। दरवाजे की वो नामपट्टी, जिस पर दो नाम साथ लिखे थे।

जिस पते को तैंतीस बरस तक हजारों लिफाफों पर हाथ से लिखा गया, वो पता अब एक ऐसी जगह है जहां जाकर खड़ा नहीं हुआ जा सकता।

अब मेरी बात।

मैं अठारह साल से इसी शहर के समाचार पत्र के दफ्तर में बैठकर तय करता हूं कि किसकी लिखी बात छपेगी और किसकी नहीं। और जिस ट्रक ड्राइवर की चिट्ठी ने यह पूरी कहानी शुरू की, वो चिट्ठी इसी शहर से चली थी।

मुझे यह सोचकर बेचैनी होती है कि आज कोई बलदेव चिट्ठी नहीं लिखता, क्योंकि उसे पता है जवाब नहीं आएगा। अब उनके लिखे के लिए कोई जगह नहीं है।

घर गिर गया। बाग उजड़ गया। हरसिंगार का कोई निशान नहीं बचा।

पर जालंधर का वो दिहाड़ी मजदूर आज एक नाम है। सिक्किम का वो कप्तान आज एक नाम है। कोलकाता का वो ट्रक ड्राइवर आज एक नाम है, और उस नाम का दूसरा हिस्सा उसी पत्रिका ने दिया था।

ये नाम इसलिए हैं क्योंकि किसी ने हफ्ते भर के भीतर जवाब दे दिया था।

उन्होंने अपने पाठकों के नाम एक चिट्ठी में लिखा था कि उनका असली साहित्यिक वारिस अगली पीढ़ी का कोई लेखक होगा।

वो वारिस किसी बड़े घर से नहीं आया। वो ढाबे से आया, मजदूरी से आया, बर्फ में तैनात एक चौकी से आया।

एक आदमी ने उसे कभी जवाब नहीं दिया। और उसने बदले में सैकड़ों लोगों को जवाब देना शुरू कर दिया।

मकान गिर सकता है। जवाब नहीं गिरता।

तीन बातें, जो उन्होंने कहीं नहीं और की थीं।

1. जो रचना आई, उसकी पावती तीन दिन में गई। किसी को महीनों टँगा नहीं छोड़ा गया।

2. ना भी कही, तो वजह के साथ कही। बिना वजह की ना सबसे बड़ी बेइज्जती है।

3. नाम नहीं देखा, लिखत देखी। जिस दिन ड्राइवर की डायरी छपी, उस दिन आलोचक पूछ रहे थे कि क्या यह भी साहित्य है।

यह कहानी उस आदमी तक पहुंचनी चाहिए जो सात समंदर पार बैठा है, जिसका पुराना पता अब किसी और के नाम पर है, और जो अब भी सोचता है कि वहां से जो छूट गया वो लौटेगा नहीं। कुछ चीजें मकान में नहीं रहतीं। वो डाक में रहती हैं।

राहुल मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

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