43 की हो गयी विभावरी

सहारनपुर की साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना के चार दशक से अधिक की यात्रा

43 की हो गयी विभावरी

राजेन्‍द्र शर्मा

 

किसी साहित्यिक संस्था का एक-दो दशक तक सक्रिय रहना उपलब्धि हो सकता है, लेकिन 43 वर्षों तक निरन्तर बने रहना अपने आप में एक सांस्कृतिक घटना है। खासकर तब, जब संस्था किसी सरकारी अनुदान, बड़े संस्थागत ढाँचे या व्यावसायिक उद्देश्य के सहारे नहीं, बल्कि कुछ साहित्यप्रेमी लोगों के समर्पण, श्रम और विश्वास से चलती रही हो।

​25 अगस्त 1983 को सहारनपुर में ऐसी ही एक संस्था का जन्म हुआ था—‘विभावरी’। आज जब वह अपने 44वें वर्ष में प्रवेश कर रही है, तब उसके अतीत को देखना केवल किसी संस्था का इतिहास पढ़ना नहीं, बल्कि सहारनपुर की लगभग साढ़े चार दशक पुरानी साहित्यिक-सामाजिक चेतना को पढ़ना है।

​विभावरी की कल्पना महाराज सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रसायन विज्ञान के वरिष्ठ प्रवक्ता और साहित्यकार डॉ. सीताराम त्यागी के मन में आकार लेती है। उनका विचार था कि साहित्यिक संस्था केवल कवि-गोष्ठियों तक सीमित न रहे, बल्कि साहित्य के साथ समाज, संस्कृति और सेवा के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका निभाए। इस विचार को रघुवीर सिंह ‘अरविन्द’ का समर्थन मिला और फिर डॉ. ओमप्रकाश वर्मा, धर्मपाल दत्त, डॉ. विजेन्द्र पाल शर्मा, राजेन्द्र कर्णवाल, सुखवीर सिंह सैनी, अनवर ताबाँ और प्रहलाद ‘आतिश’ जैसे साहित्यप्रेमियों ने इसे साकार करने में योगदान दिया।

25 अगस्त 1983 को गठन

​इस तरह ‘विभावरी’ किसी एक व्यक्ति की संस्था नहीं बनी; वह साझी साहित्यिक आकांक्षा का परिणाम बनी। संस्था का विधिवत गठन 25 अगस्त 1983 को हुआ और 16 सितम्बर 1989 को इसका पंजीकरण हुआ। इन तिथियों के बीच का अंतर भी बताता है कि संस्थाएँ कागज पर नहीं, अपने काम से अपना अस्तित्व अर्जित करती हैं।

​विभावरी की सबसे उल्लेखनीय विशेषता शायद यही रही कि उसने साहित्य को समाज से अलग करके नहीं देखा।आरंभिक वर्षों में काव्य-गोष्ठियाँ उसकी गतिविधियों का प्रमुख आधार थीं, लेकिन शीघ्र ही उसके कार्यक्रमों का दायरा विस्तृत हुआ। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन से लेकर विद्यार्थियों की वाद-विवाद, गीत-गायन, नृत्य, सुलेख और प्रेरक प्रसंग प्रतियोगिताओं तक—विभावरी ने साहित्य को मंच से विद्यालय और विद्यालय से समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया।

सद्भाव स्थापित करने में भूमिका

​सहारनपुर में सांप्रदायिक तनाव के दौर में सद्भाव स्थापित करने का प्रयास हो या शाकम्भरी देवी के दर्शनार्थ जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क भोजन-पानी की व्यवस्था; आटा चक्कियों के संकट में मजदूरों की सहायता हो या निराश्रित विधवा महिलाओं को सिलाई मशीनें उपलब्ध कराना—विभावरी ने कई बार साहित्य से बाहर निकलकर समाज के बीच अपनी उपयोगिता सिद्ध की।
​विभावरी ने राष्ट्रीय और सामाजिक अवसरों को भी साहित्यिक अभिव्यक्ति से जोड़ा। गांधी जयंती, नेहरू जयंती, शास्त्री जयंती, महावीर जयंती, रविदास जयंती, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, जन्माष्टमी, होली, दीपावली और ईद जैसे अवसरों पर विशेष काव्य-गोष्ठियाँ आयोजित की गईं। इन आयोजनों के शीर्षक भी अपने समय की संवेदना को व्यक्त करते हैं—‘भारत माता तुझे प्रणाम’, ‘उजाले की ओर’, ‘वासंती काव्य संध्या’ आदि। यहाँ विभावरी की भूमिका केवल कविता सुनाने-सुनने वाली संस्था की नहीं रह जाती। वह अपने समय के सामाजिक प्रश्नों से संवाद करने वाली संस्था बन जाती है।

अगली पीढ़ी को देन

​किसी साहित्यिक संस्था की दीर्घायु का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि उसने अगली पीढ़ी के लिए क्या किया? इस कसौटी पर भी विभावरी का काम उल्लेखनीय है। समय-समय पर वृहद वृक्षारोपण और निरन्तर देख रेख भविष्य को जीवनी शक्ति से आप्लावित रखेगी।
​हिन्दी दिवस पर विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिताएँ, वक्तृत्व और वैचारिक प्रखरता को बढ़ाने वाले कार्यक्रम, देशभक्ति गीतों और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन—इन प्रयासों के पीछे स्पष्ट उद्देश्य रहा कि साहित्य केवल पुस्तकालयों में बंद न रहे, वह बच्चों की भाषा और व्यक्तित्व का हिस्सा बने।

​‘बचपन के रंग’ जैसी प्रतियोगिता

​‘बचपन के रंग’ जैसी प्रतियोगिताएँ और विभिन्न स्मृति छात्रवृत्तियाँ इसी निरंतरता की कड़ियाँ हैं। श्री नत्थूलाल स्मृति विभावरी छात्रवृत्ति, पं. ओमप्रकाश शर्मा विभावरी छात्रवृत्ति,स्व किशना सिंह स्मारक विभावरी छात्रवृत्ति तथा अन्य छात्रवृत्ति इस बात के प्रमाण हैं कि संस्था ने प्रतिभा को प्रोत्साहित करने को भी अपनी जिम्मेदारी माना।

​विभावरी की यात्रा में प्रकाशन भी महत्वपूर्ण अध्याय है। रजत जयंती के अवसर पर प्रकाशित ‘रजत-उत्सव’ स्मारिका और कवि सदस्यों की रचनाओं का ‘विभावरी काव्य-कलश’ केवल प्रकाशन नहीं थे; वे संस्था के अपने समय को सुरक्षित रखने के प्रयास थे। 2023 में प्रकाशित काव्य-कलश ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

​विभावरी ने साहित्यकारों के साथ-साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित करने की परंपरा भी विकसित की। साहित्य, शिक्षा, चिकित्सा, समाजसेवा, पत्रकारिता, धर्म और संस्कृति से जुड़े अनेक व्यक्तित्व उसके आयोजनों में सम्मानित हुए। इससे एक महत्वपूर्ण संदेश गया—समाज में रचनात्मक योगदान केवल साहित्य लिखने से नहीं होता।

​43 वर्ष पूरे करना निश्चय ही उत्सव का अवसर है। लेकिन यह आत्ममंथन का समय भी है। नई पीढ़ी की साहित्य से दूरी, डिजिटल माध्यमों का बढ़ता प्रभाव, बदलती पाठकीय रुचियाँ और शहरों में साहित्यिक संस्थाओं के सामने संसाधनों की कमी—ये आज की वास्तविक चुनौतियाँ हैं। विभावरी के सामने भी अब शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उसकी अगली यात्रा कैसी होगी? क्या वह अपने पुराने गौरव को केवल स्मृति के रूप में सँभालेगी, या उसे नये समय की भाषा देगी? आज आवश्यकता है कि उसके चार दशक से अधिक के इतिहास को व्यवस्थित रूप से डिजिटल अभिलेख में बदला जाए। पुराने कवि-सम्मेलनों की तस्वीरें, स्मारिकाएँ, रचनाएँ, आमंत्रण-पत्र, सम्मान और संस्थागत दस्तावेज सुरक्षित किए जाएँ। नई पीढ़ी के लेखकों और पाठकों को संस्था से जोड़ा जाए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में साहित्यिक संवाद बढ़ाए जाएँ। क्योंकि संस्था की उम्र तभी सार्थक होती है, जब उसकी स्मृति के साथ उसका भविष्य भी जीवित हो।

​इन 43 वर्षों में अनेक चेहरे आए और चले गए। अनेक कवि, साहित्यकार, समाजसेवी और सहयोगी इस यात्रा के सहयात्री बने, कुछ आज नहीं हैं, लेकिन संस्था की स्मृति में उनकी आवाजें अब भी सुरक्षित हैं। यही किसी संस्था की सबसे बड़ी सफलता है,उसके लोग चले जाएँ, पर उनका विश्वास संस्था में जीवित रहे। 43 वर्ष बाद विभावरी के सामने इसलिए केवल जन्मदिन का केक नहीं, एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। उसे अपने अतीत पर गर्व करना चाहिए, लेकिन अतीत में ठहरना नहीं चाहिए। क्योंकि 43 वर्ष किसी यात्रा का पड़ाव हैं, पूर्णविराम नहीं। सहारनपुर की साहित्यिक स्मृति में विभावरी ने अपना एक पन्ना नहीं, एक पूरा अध्याय लिखा है।

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