मर्द के दर्द को कभी शब्द नहीं मिले

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

समय समाज

 

मर्द के दर्द को कभी शब्द नहीं मिले

  • हर हाल में मजबूत रहने की सीख, कभी नहीं पूछा भीतर का हाल

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“पापा, आपके जूते फिर पुराने हो गए।”

बेटे ने नए जूते पहनते हुए कहा।

पिता मुस्कुराए – “मेरे अभी अच्छे हैं।”

पत्नी बोली – “पिछले साल भी यही कहा था।”

पिता ने बात बदल दी – “तुम्हारी फीस भर गई न?”

“हाँ।”

“बस, फिर मेरे जूते भी नए ही समझो।”

शायद पुरुष की जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा इसी एक छोटे-से संवाद में छिपा है।

उसकी जरूरतें अक्सर खत्म नहीं होतीं, बस टलती रहती हैं।

हमने पुरुष को हमेशा उसकी ताकत से पहचाना।

उसकी कमजोरी से कभी परिचय ही नहीं किया।

बचपन में वह गिरा तो माँ ने प्यार से उठाया, लेकिन कुछ वर्ष बाद उसी बच्चे से कहा जाने लगा – “लड़के रोते नहीं हैं।”

वह डरता था, मगर उसे बहादुर दिखना था।

वह दुखी था, मगर उसे सामान्य दिखना था।

वह टूटता था, मगर उसे मजबूत दिखना था।

धीरे-धीरे उसने एक कला सीख ली – दर्द को चेहरे तक न आने देने की कला। मर्द के दर्द को शायद इसीलिए कभी शब्द नहीं मिले।

बेटा बड़ा होता है तो उसके रिपोर्ट कार्ड के साथ अपेक्षाएँ भी बड़ी होने लगती हैं। अच्छी पढ़ाई करो। अच्छी नौकरी करो। घर संभालो। माँ-बाप का सहारा बनो।

इन बातों में कुछ भी गलत नहीं है।

गलत शायद इतना है कि इस पूरी यात्रा में बहुत कम लोग उससे पूछते हैं – “तुम क्या चाहते हो?”

नौकरी लगते ही उसका वेतन सिर्फ उसका नहीं रहता। उसमें घर का किराया होता है, बहन की पढ़ाई होती है, माँ की दवा होती है, पिता की चिंता होती है और आने वाले कल की बचत होती है। उसकी तनख्वाह बैंक खाते में आती है, लेकिन बहुत बार उसके अपने सपनों तक पहुँचने से पहले ही खत्म हो जाती है।

फिर वह पति बनता है।

लोग पूछते हैं – “कितना कमाते हो?”

बहुत कम लोग पूछते हैं – “कितना सहते हो?”

घर में कोई परेशानी आए तो सबकी नजर अनायास उसकी ओर उठती है – “अब क्या करें?”

और वह जवाब खोजता है।

भले ही उस वक्त उसके पास कोई जवाब न हो।

उसके मन में भी डर होता है।

नौकरी जाने का डर।

कारोबार डूबने का डर।

EMI का डर।

बच्चों की फीस का डर।

बूढ़े होते माता-पिता का डर।

लेकिन घर के सामने वह अक्सर केवल इतना कहता है – “चिंता मत करो, सब कुछ हो जाएगा।”

कितना अजीब है। जिस आदमी को खुद नहीं मालूम कि सब कैसे ठीक होगा, वही पूरे घर को भरोसा दे रहा होता है कि सब ठीक हो जाएगा।

फिर वह पिता बनता है।

उस दिन से उसका भविष्य थोड़ा-सा छोटा और बच्चों का भविष्य बहुत बड़ा हो जाता है। वह नए मोबाइल को अगले साल तक टाल सकता है। अपने कपड़े दो साल और पहन सकता है। छुट्टी छोड़ सकता है। शौक भूल सकता है क्योंकि बच्चे की एक छोटी-सी इच्छा उसके अपने बड़े-से शौक से ज्यादा जरूरी लगने लगती है।

और शायद पिता की सबसे बड़ी विडंबना यही है – वह अपने बच्चों को वह सब देना चाहता है जो उसे नहीं मिला और इसी कोशिश में कई बार खुद को वह भी नहीं देता जिसकी उसे जरूरत थी।

रात में कभी किसी पुरुष को चुपचाप छत देखते पाया है?

हो सकता है वह सो नहीं रहा हो।

वह हिसाब कर रहा हो।

पैसों का। जिम्मेदारियों का। असफलताओं का। आने वाले दिनों का।

कभी वह फोन उठाता है कि किसी दोस्त से बात करे। फिर सोचता है – “वह भी परेशान होगा।”

फोन वापस रख देता है।

और यही वह क्षण है जहाँ मर्द का दर्द सबसे अधिक बोलता है – बिना एक शब्द कहे।

पुरुष को महान बनाने की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ इंसान रहने देने की जरूरत है।

उसे भी कभी कहना चाहिए –

“थक गए हो तो बैठ जाओ।”

“डर लग रहा है तो बता दो।”

“आज समाधान मत खोजो।”

“आज बस अपने मन की कहो।”

क्योंकि हर घर को मजबूत पुरुष की जरूरत जरूर है, लेकिन उस पुरुष को भी किसी ऐसे घर की जरूरत है जहाँ उसे हर समय मजबूत बने रहने की मजबूरी न हो।

शायद मर्द के दर्द को कभी शब्द नहीं मिले, क्योंकि दुनिया ने उसे बोलने से पहले जिम्मेदार होना सिखा दिया।

और अगली बार जब कोई पुरुष मुस्कुराकर कहे – “मैं ठीक हूँ”,

तो एक बार उसकी आँखों में देखकर फिर पूछिए – “सच बताओ… तुम ठीक हो?”

हो सकता है वर्षों से रुका कोई दर्द पहली बार शब्द पा जाए।

 

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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