गोवा डायरी 2026
दूसरा दिन : हिप्पियों का स्वर्ग, समुद्र तटों की रानी कैलंगुट… नशा, म्यूजिक और लहरें
संजय श्रीवास्तव
सुबह नारियल के पेड़ मस्ती में झूमते हुए मुस्कुरा रहे थे. मानो हवा की किसी बीट पर थिरक रहे हों. आसमान बादलों से भरा था, जैसे फुसफुसाकर कह रहा हो – मुझसे बचकर कहां जाओगे. गोवा के मानसून का यही अंदाज है. बारिश कभी भी आ सकती है. कहते हैं समुद्र किनारे बादल भी हिप्पियों की तरह आते हैं – थोड़ी मस्ती करते हैं, फिर चिल मारते हैं. वैसे गोवा को दुनिया के नक्शे पर मशहूर भी तो हिप्पियों ने ही किया.
हम फटाफट तैयार हुए. गोवा में हर दूसरा आदमी निकर या शॉर्ट्स में नजर आता है, तो अपन भी उसी रंग में रंग गए. पैदल ही कैंडोलिम बीच की ओर निकल पड़े. उत्तर गोवा रात में देर तक जागता है, इसलिए उसकी सुबह थोड़ी देर से होती है. सड़कें शांत थीं. होटल, रेस्टोरेंट, बार और दुकानें अभी उनींदी-सी लग रही थीं. पैदल चलने का फायदा यही है कि रास्ते का हर रंग, हर मकान और हर चेहरा धीरे-धीरे खुलता है.
थोड़ा आगे बढ़े तो दशकों पुराना डॉ. गुस्तावो मोंटेइरो फुटबॉल ग्राउंड मिला. गोवा में फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, जुनून है. यह विरासत पुर्तगाली छोड़ गए थे. आज भी यहां के गांव-गांव में फुटबॉल सांस लेती है.
कुछ ही दूर आगे कैंडोलिम बीच का रास्ता मुड़ता है. सड़क पर हम दोनों, इक्का-दुक्का मॉर्निंग वॉकर, दो-एक कुत्ते और कभी-कभार सर्र से गुजरती कोई स्कूटी. रात की रौनक अभी पूरी तरह जागी नहीं थी.
गोवा की एक बात मुझे हमेशा अच्छी लगती है. यहां गांव पंचायतों के पास उत्तर भारत की ग्राम पंचायतों की तुलना में कहीं ज्यादा अधिकार और संसाधन हैं. समुद्र तटों के आसपास की साफ-सफाई, पार्किंग और कई दूसरी व्यवस्थाएं स्थानीय पंचायतें ही संभालती हैं.

कैंडोलिम बीच की सुबह अपने आप में एक अलग दुनिया होती है. मॉर्निंग वॉकर अपने कदमों में खोए रहते हैं. कुछ पर्यटक समुद्र को अपलक निहारते रहते हैं. उधर मछुआरे सूरज निकलने से पहले ही अपने लंबे-लंबे जाल समुद्र में डाल चुके होते हैं. जब दस-पंद्रह लोग मिलकर 30-40 मीटर लंबा जाल खींचते हैं तो उसके साथ छोटी-बड़ी अनगिनत मछलियां भी चली आती हैं. गोवा में मछली सिर्फ भोजन नहीं, बड़ी अर्थव्यवस्था भी है.
हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई. सोचा, चलो इस बारिश में भीग ही लिया जाए. समुद्र अपनी लहरों के साथ ताक-धिना-धिन करता हुआ राग गर्जना सुनाता ही रहता है. उसे क्या फर्क पड़ता है कि बारिश हो रही है या धूप खिली है. हालांकि मानसून में समुद्र का मिजाज बदल जाता है. हाई टाइड के दौरान लहरें बहुत दूर तक चली आती हैं. कई बार इतनी ताकत से कि पैरों के नीचे की रेत खिसकने लगती है. एक लहर ही बता देती है कि समुद्र के सामने इंसान कितना हल्का है. झाग बनाती लहरें आती हैं, कुछ पल रेत पर ठहरती हैं और फिर जैसे कभी थीं ही नहीं. बची हुई झाग थोड़ी देर फड़फड़ाते हुए लुप्त हो जाती है.

करीब 45 मिनट समुद्र के साथ बिताने के बाद लौट पड़े. रास्ते में ‘सागर’ नाम का छोटा-सा रेस्टोरेंट पड़ा. 5 साल पहले भी यहां आया था. इस बार भी पहुंच गए. करीब 20 साल पहले केरल से आए एक परिवार ने इसे शुरू किया. आज भी यहां सस्ते और स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय नाश्ते के लिए सुबह से भीड़ लगी रहती है.
करीब 10.30 बजे होटल लौट आए. थोड़ा आराम. नीचे रेस्टोरेंट में खाना खाया. तब तक बारिश कई बार आकर हाय-हैलो कर चुकी थी.
गोवा में अगर टैक्सी जेब ढीली कर देती है तो सिटी बसें राहत देती हैं. 10-20 रुपये में आराम से आसपास पहुंच जाइए. शाम को हम भी बस पकड़कर कैलंगुट के लिए निकल पड़े. दो लोगों का किराया सिर्फ 30 रुपये.
कैलंगुट… जिसे गोवा के “समुद्र तटों की रानी” कहा जाता है. शाम ढलते-ढलते इसकी रंगत बदलने लगती है. भीड़ बढ़ती है. दुकानें रोशनी में नहा जाती हैं. हर दूसरी तीसरी दुकान काजू, शराब और टैटू बनवाने की. फुटपाथ पर छोटी-छोटी दुकानें. बीच-बीच में पुराने रेस्तरां.
एक बात मैंने यहां गौर की. गोवा की अर्थव्यवस्था सिर्फ गोवा के लोगों के भरोसे नहीं चलती. काजू की कई दुकानें गुजराती परिवारों की हैं, रेस्टोरेंट और होटल में काम करने वाले बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और ओडिशा से आए लोग हैं. गोवा का पर्यटन पूरे देश के लोगों को रोज़गार देता है.
अब शाम पूरी तरह उतर चुकी थी. कैलंगुट बीच पर जैसे मेला लग गया था. कोई सेल्फी ले रहा था, कोई समुद्र को पीठ देकर तस्वीरें खिंचवा रहा था. प्रोफेशनल फोटोग्राफर कैमरा लेकर ग्राहकों की तलाश में घूम रहे थे. समुद्र किनारे बने शेक रोशनी से जगमगाने लगे थे. रेत पर कुर्सियां और मेजें सज चुकी थीं. कहीं लाइव म्यूजिक शुरू हो गया था, कहीं पुराने अंग्रेजी गीत बज रहे थे. शेक के कर्मचारी मुस्कुराकर बुलाते—”आइए सर, बैठिए… कुछ खाइए, कुछ पीजिए.”
आज कैलंगुट जितना लोकप्रिय है, उसकी नींव हिप्पियों ने रखी थी. 1961 में गोवा के पुर्तगाली शासन से मुक्त होने के बाद दुनियाभर से हिप्पी यहां आने लगे. 70 के दशक तक कैलंगुट उनका सबसे पसंदीदा ठिकाना बन चुका था. वे महीनों यहीं रहते, समुद्र किनारे खुलेपन के साथ जिंदगी जीते, फुल मून पार्टियां करते, संगीत बजाते और सूरज डूबने पर तालियां बजाकर उसका स्वागत करते.
उन्हें यहां लाने वालों में सबसे चर्चित नाम था “एट फिंगर एडी”. असली नाम था यर्टवार्ड मजामानियान. दो उंगलियां कटी होने के कारण दुनिया उन्हें इसी नाम से जानती थी. उसी दौर में यहां सिमला म्यूजिक कॉम्पिटिशन एंड कॉन्सर्ट खासा लोकप्रिय था. रात भर संगीत गूंजता था और हजारों लोग समुद्र किनारे जमा रहते थे. गोवा के प्रसिद्ध गायक रेमो फर्नांडिस भी यहां अपने बैंड के साथ होते थे.
समुद्र के ठीक सामने स्थित सूजा लोबो रेस्तरां भी कैलंगुट की पहचान है. 96 साल पुराना यह रेस्तरां हर शाम संगीत के साथ जीवंत हो उठता है. समुद्र की लहरों के बीच यहां बैठकर सी-फूड का स्वाद लेना और दूर तक फैले अंधेरे समुद्र को निहारना अपने आप में अलग अनुभव है.
कैलंगुट की शाम एक गीत के बिना पूरी नहीं मानी जाती. गोवा की “नाइटिंगेल” कही जाने वाली लोर्ना कोर्डेइरो का गाया कोंकणी गीत “कैलंगुट” यहां अक्सर सुनाई देता है. क्रिस पेरी के संगीत से सजा यह गीत अब इस बीच का अनौपचारिक एंथम बन चुका है.
आज जहां रोशनी, संगीत और भीड़ दिखाई देती है, कभी वहां स्थानीय मछुआरों की बस्तियां थीं. धान के खेत थे, नारियल के बाग थे और समुद्र ही उनकी रोजी-रोटी था. फिर पणजी के संपन्न परिवार आए. फिर हिप्पियों का दौर शुरू हुआ. धीरे-धीरे कैलंगुट दुनिया के सबसे हैपनिंग समुद्र तटों में शामिल हो गया. इसी इलाके में शांतिदुर्गा का एक प्राचीन मंदिर भी है, जो इस चमक-दमक के बीच गोवा की दूसरी सांस्कृतिक धारा की याद दिलाता है.
कैलंगुट की रातें सचमुच अलग होती हैं. लहरें लगातार गूंजती रहती हैं. रोशनी जगमगाती रहती है. संगीत थमता नहीं. चहल-पहल आधी रात के बाद भी बनी रहती है. मुझे लगा, कैलंगुट सिर्फ एक समुद्र तट नहीं है, बल्कि गोवा का सबसे बड़ा खुला रंगमंच है, जहां हर शाम समुद्र, संगीत और दुनिया भर से आए लोग मिलकर एक नया दृश्य रचते हैं.
…गोवा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. कहानी जारी रहेगी…
