एक इस्तीफ़ा अंत नहीं, व्यवस्था से मुठभेड़ की शुरुआत है
रत्ना भदौरिया
लोकतंत्र में किसी मंत्री का इस्तीफ़ा केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं होता; वह जनता की चेतना, उसके प्रतिरोध और उसकी सामूहिक शक्ति का संकेत होता है। यदि शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े को जनता की जीत कहा जा रहा है, तो यह स्वीकार करना चाहिए कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, जनमत के सामने उसे कभी न कभी झुकना पड़ता है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा खतरा भी छिपा है। इतिहास बार-बार यह सिखाता है कि सत्ता छोटी-छोटी पराजयों को स्वीकार कर बड़ी-बड़ी विफलताओं पर पर्दा डालने की कला जानती है। इसलिए किसी एक इस्तीफ़े को अंतिम विजय मान लेना राजनीतिक अपरिपक्वता होगी।
प्रश्न यह नहीं है कि एक मंत्री गया या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या उस व्यवस्था में कोई मूलभूत परिवर्तन आया, जिसने वर्षों से भ्रष्टाचार, असमानता और शोषण को सामान्य बना दिया है? क्या वह तंत्र बदल गया है जिसमें ईमानदारी अपवाद बन जाती है और सत्ता का अहंकार नियम?
आज भी इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि समस्याएँ हैं; बल्कि यह है कि समस्याओं को सामान्य मान लिया गया है। भ्रष्टाचार अब किसी एक विभाग या व्यक्ति का अपराध नहीं रहा, वह व्यवस्था की कार्यशैली में घुला हुआ एक ऐसा ज़हर बन चुका है जिसे लोग मजबूरी समझकर पीने लगे हैं। रिश्वत, पक्षपात, सत्ता और पूँजी का गठजोड़—ये सब लोकतंत्र के शरीर पर ऐसे घाव हैं जिन्हें भाषणों से नहीं, कठोर जवाबदेही से भरा जा सकता है।
महँगाई केवल आँकड़ों का विषय नहीं है। वह उस माँ की चिंता है जो हर महीने राशन का हिसाब लगाते-लगाते अपने बच्चों की इच्छाओं को काट देती है। वह उस वृद्ध की विवशता है जिसकी दवाइयाँ महँगी होती जाती हैं और पेंशन छोटी पड़ती जाती है। वह उस मजदूर का मौन है जो दिन भर पसीना बहाने के बाद भी अपने परिवार का पेट भरने की चिंता से मुक्त नहीं हो पाता। जब रोटी महँगी हो जाए, तब राष्ट्र की समृद्धि के दावे खोखले प्रतीत होते हैं।
शिक्षा, जिसे संविधान की आत्मा और समाज की सबसे बड़ी पूँजी होना चाहिए था, धीरे-धीरे एक महँगा सौदा बनती जा रही है। ज्ञान पर पूँजी का पहरा बैठ गया है। विश्वविद्यालयों और संस्थानों की ऊँची फीस यह संदेश देती है कि शिक्षा अब अधिकार नहीं, विशेषाधिकार है। एक गरीब प्रतिभाशाली छात्र का सपना और एक सम्पन्न छात्र का अवसर—दोनों के बीच की दूरी हर वर्ष बढ़ती जा रही है। जिस समाज में शिक्षा बिकने लगे, वहाँ समान अवसर का विचार भी बिक जाता है।
युवा बेरोज़गार है। उसके हाथों में डिग्रियाँ हैं, लेकिन अवसर नहीं। उसके भीतर क्षमता है, लेकिन व्यवस्था में स्थान नहीं। बेरोज़गारी केवल आर्थिक संकट नहीं होती; वह मनुष्य के आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और भविष्य की हत्या भी करती है। जब लाखों शिक्षित युवा वर्षों तक रोजगार की प्रतीक्षा करते हैं, तब समस्या केवल नौकरी की नहीं रहती; वह राष्ट्र की विकास-परिकल्पना पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
किसान आज भी मौसम, बाज़ार और नीतियों के बीच पिस रहा है। मजदूर आज भी अपने श्रम की पूरी कीमत पाने के लिए संघर्षरत है। एथेनॉल जैसी नीतियों के प्रभाव, कृषि और ऊर्जा के संतुलन, तथा किसानों की आय पर उनके असर जैसे विषय गंभीर सार्वजनिक विमर्श की माँग करते हैं। विकास की कोई भी कहानी तब तक अधूरी है, जब तक खेत और कारखाने दोनों सम्मान और न्याय के साथ साँस न ले सकें।
स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट भी किसी युद्ध से कम नहीं। आज बीमारी से पहले अस्पताल का अनुमानित बिल डराता है। बड़े-बड़े निजी अस्पतालों की चमक के पीछे अनगिनत परिवारों की टूटी हुई बचत, बिके हुए गहने और कर्ज़ में डूबे जीवन छिपे हैं। यदि उपचार किसी परिवार को निर्धन बना दे, तो यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की विफलता है।
लोकतंत्र की पवित्रता पर भी प्रश्न उठते रहे हैं। चुनावी चंदे में पारदर्शिता को लेकर उठी चिंताएँ हों, सत्ता और धन के संबंधों पर सार्वजनिक बहस हो, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एप्सटीन फ़ाइल जैसे मामलों से जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों पर उठते प्रश्न—इन सबमें मूल मुद्दा एक ही है: क्या सत्ता और प्रभाव रखने वाले लोगों से भी समान स्तर की जवाबदेही सुनिश्चित होगी? लोकतंत्र का मूल्य इसी कसौटी पर परखा जाता है।
लेकिन इन सबके बीच सबसे भयावह दृश्य यह है कि जनता के वास्तविक प्रश्नों को अक्सर धर्म, जाति, भाषा और पहचान की राजनीति के शोर में दबा दिया जाता है। जब नागरिक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और महँगाई पर उत्तर माँगता है, तब उसके सामने भावनाओं की ऐसी दीवार खड़ी कर दी जाती है जिसके पीछे सत्ता अपने उत्तरदायित्व से बच निकलती है। भूख की कोई जाति नहीं होती। बेरोज़गारी किसी धर्म का नाम नहीं पूछती। अस्पताल का बिल किसी की आस्था देखकर कम नहीं होता। फिर भी जनता को इन्हीं आधारों पर बाँट देना राजनीति का सबसे आसान और सबसे खतरनाक हथियार बना हुआ है।
लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता; वह नागरिक की जागरूकता से जीवित रहता है। जिस दिन जनता प्रश्न पूछना छोड़ देती है, उसी दिन लोकतंत्र का क्षय आरम्भ हो जाता है। सत्ता का सबसे बड़ा भय विरोध नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होता है। इसलिए हर छोटी जीत के बाद यदि जनता सो जाती है, तो सत्ता और अधिक निडर होकर अन्याय करती है।
एक मंत्री का जाना व्यवस्था का प्रायश्चित नहीं है। यह केवल एक संकेत है कि जनता की आवाज़ अभी मरी नहीं है। लेकिन यदि उस आवाज़ को केवल उत्सव में बदल दिया गया और संघर्ष को विराम दे दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।
इसलिए जश्न मनाइए, पर स्मृति मत खोइए। एक इस्तीफ़ा लोकतंत्र की मंज़िल नहीं, उसकी यात्रा का एक पड़ाव है। अभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई बाकी है। महँगाई के विरुद्ध लड़ाई बाकी है। महँगी शिक्षा और महँगे इलाज के विरुद्ध लड़ाई बाकी है। बेरोज़गारी, श्रमिकों और किसानों के अधिकारों, पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक न्याय की लड़ाई बाकी है। और सबसे बढ़कर, उस राजनीति के विरुद्ध लड़ाई बाकी है जो नागरिकों को उनके अधिकारों से दूर कर उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देती है।
जब तक शासन का केंद्र नागरिक नहीं, बल्कि सत्ता स्वयं बनी रहेगी; जब तक शिक्षा बाज़ार, स्वास्थ्य व्यापार और लोकतंत्र प्रचार का माध्यम बना रहेगा; जब तक प्रश्न पूछने वालों को असुविधा और चुप रहने वालों को पुरस्कार मिलता रहेगा—तब तक किसी भी जीत का उत्सव अधूरा रहेगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा उत्सव किसी मंत्री के इस्तीफ़े का नहीं, बल्कि उस दिन का होगा जब इस देश का कोई नागरिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और अवसर के लिए संघर्ष करने को विवश नहीं रहेगा।
