कम्युनिस्टों से कितनी खौफजदा थी अंग्रेज सरकार
मुनेश त्यागी
ओ कम्युनिस्टों हो तुम जिंदा हो
हर एक लहू के कतरे में
भीची तनी हुई हर मुट्ठी में
हर इंकलाब के नारे में
ओ कम्युनिस्टों हो तुम जिंदा हो।
ब्रिटिश शासक वर्ग और अंग्रेज सरकार कम्युनिस्ट विचारों, कम्युनिस्ट ग्रुपों और कम्युनिस्ट पार्टी से सबसे ज्यादा खौफजदा थे। हालांकि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन अभी युवावस्था में ही था, मगर ब्रिटिश शासक, भारत में एक शक्तिशाली कम्युनिस्ट पार्टी और आंदोलन बनने से पहले ही कम्युनिस्ट आंदोलन को तोड़ देना और खत्म कर देना चाहते थे, इसलिए 1922 से लेकर 1930 तक उन्होंने कम्युनिस्टों पर सात मुकदमें चलाए और जितने भी प्रमुख और सक्रिय कम्युनिस्टों पर उनकी नजर पड़ी, उन्होंने उन्हें कड़ी सजाएं दीं। इनमें से पांच मुकदमे पेशावर में चले, एक कानपुर में और एक क्रांति की धरती मेरठ में चला था।
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन जो फ्रांसीसी क्रांति के अमर नारों,,,, समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के नारों से प्रभावित था, वही उसे 1917 की रूसी क्रांति के क्रांतिकारी नारों,,, वैज्ञानिक समाजवाद, साम्यवाद और किसान मजदूरों के राजसत्ता और सरकार ने भी बहुत अधिक प्रभावित किया था। भारत के अधिकांश क्रांतिकारी रूसी क्रांति के इसी दर्शन और इसी विचार से प्रभावित थे और अंग्रेज इसी विचार की भ्रूण में हत्या कर देना चाहते थे, इसे पनपने देना नहीं चाहते थे। इसी कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव देखिए कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी लगी उसे दिन में महान क्रांतिकारी ललित की जीवनी पढ़ रहे थे और वे मार्क्स एंगेल्स और लेनिन के विचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। इसी से प्रभावित होकर कर उन्होंने कई लेख भी लिखे थे, जो भगत सिंह और साथियों के दस्तावेज में दर्ज हैं।
एक सोची-समझी नीति और षड्यंत्र के तहत अंग्रेज लुटेरे साम्राज्यवादियों ने, भारत के साम्यवादी आंदोलन का नामोनिशान मिटाने के मकसद से और उसका बाल्यकाल में ही गला घोंट देने के लिए, उनके सभी प्रमुख नेताओं और किसानों मजदूरों के अग्रणी क्रांतिकारी साम्यवादियों को जेल में डाल दिया। देशभर में धरपकड़ हुई। 20 मार्च 1929 को 31 लोग गिरफ्तार किए गए। उन पर ताजेरात-ए-हिंद की धारा 121ए के तहत देशद्रोह और ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने का मुकदमा मेरठ में चलाया गया, जिसे पूरी दुनिया और भारत में “मेरठ कम्युनिस्ट षड्यंत्र” केस के नाम से जाना गया।
हिंदुस्तान के इन महान सपूतों पर लगाए गए आरोपों में अंग्रेज सरकार ने कहा कि ये लोग कम्युनिस्ट विचार रखते हैं, कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार प्रसार करते हैं और क्रांति द्वारा भारत को साम्राज्यवादी लुटेरे ब्रिटेन के चंगुल से मुक्त कराना चाहते हैं और यह सब ब्रितानी सम्राट की हुकूमत को हिंदुस्तान से उखाड़ फेंकना चाहते हैं और देश को स्वाधीन कराना चाहते हैं।
मेरठ षड्यंत्र केस के तमाम अभियुक्त क्या चाहते थे? उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे हजारों वर्ष पुराने अन्याय, शोषण, गैर बराबरी, जुल्मों सितम और अंग्रेजों की लूट खसोट का राज खत्म करके, भारत में एक सच्ची गणतांत्रिक व्यवस्था और जनता का सच्चा जनवाद कायम करना चाहते थे। वे मनुष्य मात्र की समता, समानता, बराबरी और सबका विकास चाहते थे, देश के संसाधनों पर सारी जनता का आधिपत्य चाहते थे। समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन, वर्गहीन समाज, उत्पादक संसाधनों का समाजीकरण, आर्थिक समानता, किसानों मजदूरों का राज और जनता की सामुहिकता का राज कायम करना चाहते थे। यही कामना, विचार, आदर्श और मूल्य इनके अपराध थे और अंग्रेज इन्हीं क्रांतिकारी विचारों, सोच और संस्कृति का गला घोट देना चाहते थे, उसे नेशनाबूद कर देना चाहते थे।
मगर आजादी, क्रांति, वैज्ञानिक समाजवादी, समता और भ्रातृत्व व न्याय के दीवाने कब, किससे डरा करते हैं? दुनिया की कोई सूली, जेल, बंदूक या दमन इन्हें नहीं डरा या रोक पाए। मेरठ कम्युनिट षड्यंत्र केस के इन स्वतंत्रता व साम्यवाद प्रेमियों ने, अंग्रेजों के इस कम्युनिस्ट विरोधी खुले आक्रमण का जोरदार और डटकर मुकाबला किया। अंग्रेजी जेलों और अदालती कटघरे को, अपने विचारों के प्रचार प्रसार का एक खूबसूरत माध्यम और अड्डा बना लिया। अपनी साम्यवादी विचारधारा को देश और दुनिया के कोने कोने में फैला दिया और इन साम्यवादियों का कमाल देखिए कि जेल में बंद रहते रहते ही इन्होंने, लुटेरे एवं डाकू साम्राज्यवादी अंग्रेजों को कटघरे में खड़ा करके, उन्हें ही देशद्रोही बनाकर देश और दुनिया के सामने पूर्ण रूप से नंगा कर दिया।
मेरठ षड्यंत्र केस के इन 31 अभियुक्तों में, दो सपूत मेरठ की धरती का सीना चौड़ा कर रहे थे। ये थे पंडित गौरीशंकर और चौधरी धर्मवीर सिंह। ब्रिटेन के मजदूर वर्ग के कम्युनिस्ट बेटे,,, फिलिप स्प्राट, बेन ब्रेडले और हचिंसन थे। इनमें 18 लोग भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य थे तो 8 अभियुक्त कांग्रेस के गरम दली थे जो मजदूर वर्ग के नेता थे।
कमाल करने वाली भारत की जनता भी, इस सबसे कहां डरने वाली थी? उसने इन महान सपूतों की पैरवी करने के लिए, एक “ऑल इंडिया मेरठ डिफेंस कमेटी” बनाई, जिसके अध्यक्ष डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी और सचिव पंजाब के बाबू गिरधारी लाल थे। ब्रिटेन और सोवियत यूनियन के श्रमजीवी भी, मेरठ कम्युनिट षड्यंत्र केस के अभियुक्तों के समर्थन में आ गए। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन ने ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और मुकदमा हटा लेने की मांग की थी। यह मुकदमा भारत की आजादी में हिंदू मुस्लिम एकता का, एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है जिसमें 23 हिंदू, 5 मुसलमान और 3 अंग्रेजों के बेटे शामिल थे।
इनके वकील थे मुंबई के एम सी छागला, पटना के देवकी प्रसाद सिन्हा, लखनऊ के चंद्रभान गुप्त, कोलकाता के क्षितिज चंद्र चक्रवर्ती और बैरिस्टर फरीदुल हक अंसारी, श्याम कुमारी नेहरू, रणजीत सीतादास, पंडित बांके बिहारी और कैलाश नाथ काटजू। 16 जनवरी 1933 को दिए गए दुनिया को हैरत में डालने वाले फैसले में, कामरेड मुजफ्फर अहमद को आजीवन कालापानी, डांगे, स्प्राट, घाटे, जोगलेकर, निंबकर को 12-12 साल का कालापानी, ब्रेडले मिरजकर और उस्मानी को 10-10 साल का कालापानी, मजीद, जोश और गोस्वामी को सात*सात वर्ष का कालापानी और बाकियों को पांच व तीन-तीन वर्ष की कठोर सजा दी गई थी।
भारत के इन महान सपूतों ने अदालत में दिए गए अपने बयानों में कहा था कि ,,,हम मजदूरों और किसानों का असली और सच्चा गणतंत्र स्थापित करेंगे, ,,,हमारा लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना है, ,,,हम पूंजीवाद के समझौताविहीन शत्रु हैं, ,,,हम पूरे लुटेरे बिर्टिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकना चाहते हैं, ,,,हम संपूर्ण स्वतंत्रताता के लिए समझौताविहीन आंदोलन कर रहे हैं, ,,,हम मानव समाज को असमानता, गरीबी और दास्तां के महाविनाश से बचाना चाहते हैं। इस प्रकार गुलामी, अन्याय, गरीबी, भुखमरी, असमानता, अविकास और भ्रष्टाचारी निजाम से निजात दिलाने में, मेरठ कम्युनिस्ट षड्यंत्र केस की अहमियत और प्रासंगिकता पूरे भारत में आज भी बनी हुई है।
इस प्रकार हम देखते हैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कम्युनिस्टों की शानदार भूमिका रही है। उन्होंने भारत को आजाद कराने में, सर्वश्रेष्ठ भूमिका अदा की थी। सभी प्रकार के जुल्म-ओ-ज्यादती, जेल और बलिदानों का बेखौफ होकर सामना किया और करना सिखाया। इसे हमें सदैव याद रखना होगा और कम्युनिस्ट के उस अपूर्ण क्रांतिकारी अभियान को पूरा करना होगा। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कम्युनिस्टों की इस शानदार भूमिका को शत शत नमन, वंदन और अभिनंदन। हम यहां पर यही कहेंगे कि,,,,
ना मुंह छुपा के जिये, ना सर झुका के जिए
सितमगरों की नजर से नजर मिला के जिए,
एक रात कम ही जिए तो कम ही सही
यह बहुत है कि मशालें जला जला के दिए।
और
उसे माहौल की बात करें
जहां मेल-जल की राह बने,
जन्म मुक्ति के सपने देखें
हम क्रांति का नवगान बनें।
