लघु कथा
ठहराव
डॉ रीटा अरोड़ा
“दादाजी, आप रोज़ इस पुराने मिट्टी के बर्तन में पानी क्यों भरते हैं?” आरव ने पूछा।
दादाजी मुस्कुराए, “तुम्हें क्या लगता है?”
“शायद… पौधों के लिए?”
“नहीं,” उन्होंने धीरे से कहा, “ज़रा पाँच मिनट बाद देखना।”
दोनों बरामदे में चुपचाप बैठ गए। कुछ ही देर में एक गौरैया आई। उसने इधर-उधर देखा, फिर पानी पिया। उसके पीछे दो कबूतर आए, फिर एक गिलहरी। थोड़ी देर बाद एक आवारा कुत्ता भी आकर उसी बर्तन के पास बैठ गया।
आरव सब कुछ देखता रहा।
शाम को उसने बिना कुछ कहे रसोई से एक और मिट्टी का सकोरा उठाया, उसमें पानी भरा और घर के बाहर पेड़ की छाया में रख आया।
अगली सुबह दादाजी ने देखा।
अब घर के बाहर दो सकोरे रखे थे।
