राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

1.

प्रेम का मंत्र है बारिश

 

प्रेम का मंत्र है बारिश

पीड़ाऍं धधकतीं रहतीं हैं बारिश में

पुरानी पीड़ाऍं धधकतीं हैं कुछ ज़्यादा ही

उफनती रहतीं हैं अनंत उपासनाऍं

असीमित इच्छाऍं होती रहतीं हैं घर-बेघर

बुझी राख में छुपी कोई चिंगारी हो जैसे

आकाश में जब भी आता है इंद्रधनुष

पता पूछकर तो आता नहीं है वह कभी

आ ही जाता है बारिश की धूप-छाॅंव में

और दरअसल नाप ही लेता है वे सीमाऍं

जो फैली-पसरी हैं इस-उस क्षितिज तक

समस्त रिक्त के समस्त अतिरिक्त में

जैसे किसी ज्ञात-अज्ञात प्रेम का अंतराल

जिसे हर हाल स्वीकारता है मेरा मौन

मैं भटकता हूँ फिर-फिर किसी सूने में

अपने जैसे ही अपने एकांत के लिए

वह मिलता है मुझे क्षत-विक्षत सीलनभरा

वह मिलता है मुझे आतंकित करता हुआ

धूप के टुकड़ों से खेलता हुआ लुकाछुपी

फिर विचारों के ठेठ तक जाता हूँ मैं

और पाता हूँ मैं कि पॅंछी हूँ जहाज़ का

प्रेम का मंत्र है बारिश.
________

2.

है घर के भीतर भी,बाहर भी बारिश

 

है घर के भीतर भी,बाहर भी बारिश

फ़र्क़ है सिर्फ़ यही कि घर में छत है बाहर आकाश

आकाश से पृथ्वी तक भीग रहा है सब कुछ

घर में टपकती है छत कि गिनता हूँ दिन-रात

बारिश ही लाती है मुफ़लिसी में आटा गीला

बारिश ही लाती है शब्दों में सीलन का विचार

बारिश ही लाती है योद्धाओं को घर-परिवार तक

बारिश के अंधेरे ही घेरते हैं तमाम रास्ते

बारिश ही बिगाड़ती है मिलने-मिलाने के समीकरण

सुलगाती है देह,बुझाती है चूल्हे की चिंगारियाॅं

मुश्किल से भी बड़ी मुश्किल हो जाती है धूप

जब धड़-धड़ाते हैं बादल और गिड़-गिड़ाते हैं वृक्ष

कच्चे मकानों को भी डराती है,गिराती बारिश ही

मजबूत ऑंखें भी भीगने लगती हैं बाढ़ में

घनीभूत अंधकार पसर जाता है घनी दोपहर में ही

है घर के भीतर भी,बाहर भी बारिश.

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