जसवीर त्यागी की कविता- अनमोल सुबह

कविता

अनमोल सुबह

जसवीर त्यागी

पार्क में एक बैंच पर
अकेला बैठा हूँ
हालाँकि अकेला नहीं हूँ
पैरों तले जमीन
और सिर पर आसमान है

इर्द-गिर्द घने छायादार हरे-भरे पेड़
एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं
सुबह की नहाई खिली-खिली धूप
बार-बार दिखा रही है अपना दिव्य-रूप

पवन का कोई पावन झोंका
गुदगुदा देता है मुझे बेरोकटोक
बीच-बीच में दरख्तों में छुपे बैठे
पंछियों का मधुर गान
बुलाता है अपनी ओर

कुछ कौएं,गुरसल,कबूतर
और चिड़िया कर रही हैं
आपस में सोच-विचार
कई चंचल गिलहरियाँ
आइसपाईस खेल रही हैं

सुबह का यह मोहक दृश्य
स्मृतियों के कैमरे में
संजोकर रखना चाहता हूँ
किसी अनमोल जेवर की तरह।

कवि जसवीर त्यागी दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं।

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