जयपाल की छह लघु कविताएं

जयपाल की छह लघु कविताएं

 

आस्था और विश्वास

 

मानवीय जीवन की तमाम

आस्थाओं और विश्वासों के ऊपर

बैठ गया है

धार्मिक आस्था और विश्वास का

एक विशाल हाथी

हाथी चिंघाड़ रहा है

उसकी चिंघाड से दुबके पड़े हैं

सारे पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और मनुष्य

हाथी है कि उठने का नाम ही नहीं ले रहा

 

 राजा और संपेरा

 

एक समय था

जब राजा भेष बदलकर निकलता था

प्रजा के दुख-दर्द पता करता था

लेकिन अब राजा सपेरा बन कर आता है

बीन बजाता है

शहर में सांप छोड़कर चला जाता है

 

लोकतंत्र

 

लोकतंत्र को पेड़ पर उल्टा लटका दिया गया है

उसे देखते रहो

जब तक मृत घोषित नहीं कर दिया जाता !

 

 

 दीवाने

 

तलवार-त्रिशूल, बम-बंदूक

दीन और धर्म की ध्वजा लेकर

ईश्वर और खुदा के दीवाने

निकल पड़े हैं-

सारे ज़माने को यह बताने

कि खुदा कितना रहम दिल है

और भगवान कितना दयालु

 

 खुदा-खुदा

 

ख़ुदा-ख़ुदा करते

उम्र तमाम हो गई

इंसान तो बन न सके

ख़ुदा ही बन बैठे

 कब्जा

 

ईश्वर पर कब्जे का अर्थ है

पूरी दुनिया पर कब्जा

इसका मतलब

या तो धर्मगुरु जानता है

या पूंजीपति

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