अजय शुक्ल जी अच्छे साहित्यानुगामी हैं, लेखक हैं। लेखन को तर्क की कसौटी पर परखते हैं फिर उस पर चर्चा करते हैं। पेशे से पत्रकार रहे हैं इसलिए सरल और सहज भाषा में अपनी बात रखते हैं। उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी है। उसे प्रतिबिम्ब मीडिया के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। आप भी पढ़ें और आनंद उठाएं। इसे अजय शुक्ल के आभार के साथ यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। संपादक
पंडित सोइ जो गाल बजावा
अजय शुक्ल
धर्म में डूब चुके राष्ट्र के लिए मैंने रामचरित मानस के कुछ पद्यांश निकाले हैं। काकभुशुण्डि जी कलियुग के बारे में बता रहे हैं। मैं चाहता हूं कि इन चौपाइयों को पढ़कर आप तय करें कि हम सब किस युग में जी रहे हैं। मानस मर्मज्ञ धर्मप्राण भारतीयों को इन लाइनों का अर्थ बताना सूरज को दिया दिखाना है। तो भी यह हिमाकत कर दी है।

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मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
जिसको जो मार्ग अच्छा लगे, वही उसका सही रास्ता है। जो ज़ोर-ज़ोर से डींग मारता है, गाल बजाता है (बड़ी-बड़ी बातें करता है), वही पंडित माना जाता है।
भाव: कलियुग में कोई शास्त्र-विधि नहीं, मनमानी चलती है। बोलने वाला, प्रचार करने वाला ही विद्वान समझा जाता है।
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मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
जो झूठे आडंबर (मिथ्या आरंभ) करता है और दंभ (अहंकार, दिखावा) में लगा रहता है, उसी को सब लोग संत कहते हैं।
भाव: सच्चे संतों की जगह दिखावटी, अहंकारी लोग संत बनकर पूजे जाते हैं।
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सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो दूसरे का धन हड़प ले (चुराए या हड़प जाए), वही बुद्धिमान (सयाना) है। जो दंभ (दिखावा) करता है, वही बड़ा आचार्य (आचारी) माना जाता है।
भाव: चालाकी और लूट को बुद्धिमत्ता कहा जाता है।
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जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
जो झूठ बोलता है और मसखरी (मज़ाक, हास्य-व्यंग्य) करता है, कलियुग में उसी को गुणवान (गुणी) कहा जाता है।
भाव: सच्चाई की जगह चालाकी, मजाक और झूठ को गुण माना जाता है।
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निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
जो आचार-विचारहीन (निराचार) है, वेद-शास्त्र के मार्ग को त्याग चुका है, वही कलियुग में ज्ञानी और वैरागी कहलाता है।
भाव: नियम-कानून तोड़ने वाले को ही ज्ञानी समझा जाता है।
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जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥
जिसके नाखून बड़े और जटाएँ विशाल हों, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी (तापस) माना जाता है।
भाव: बाहरी दिखावे (लंबी जटा-दाढ़ी) को ही तपस्या समझ लिया जाता है, आंतरिक साधना नहीं।
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जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥
जो अपकार (हानि) करने वाले हैं, उनका ही गौरव (सम्मान) किया जाता है। जो मन, कर्म और वचन से लबार (बकवास करने वाले, व्यर्थ बोलने वाले) हैं, वही कलियुग में अच्छे वक्ता कहलाते हैं।
भाव: हानि पहुँचाने वाले सम्मानित और बकवास करने वाले वक्ता माने जाते हैं।
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नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥
हे गोसाईं! स्त्रियों के वश में (नारि-वश) सभी पुरुष नट (नाचने वाले) और बंदर की तरह नाचते हैं।
भाव: पुरुष स्त्रियों के इशारे पर नाचते हैं, जैसे बाजीगर का बंदर।
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गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥
गुरु और शिष्य दोनों बधिर (बहरे) और अंधे की तरह हैं — गुरु कुछ नहीं सुनता और शिष्य कुछ नहीं देखता (या उल्टा)।
भाव: गुरु-शिष्य परंपरा टूट चुकी है। दोनों अंधे-बहरे हो गए हैं, कोई सही ज्ञान नहीं लेता-देता।
