मोहन मुक्त की कविता- निगाह…

कविता

निगाह…

मोहन मुक्त

 

“मडू लेसा पचु हर…”
बचपन के झगड़ों में
मेरे साथ के बच्चे किसी बहस में
अक़्सर मुझे ये कहते थे
फ़िर हँसते थे ज़ोर से…
उनकी निगाह कहती थी
कि वो जीत गये हैं…
मैं समझ नहीं पाता था कि मैं कैसे हार गया
और क्या मतलब है इसका
“मडू लेसा पचु हर ”
क्या बच्चे भी हिंसक अट्टहास कर सकते हैं?
मैंने देखे हैं क्रूर बच्चे और जर्जर बूढ़े नाज़ी
मैंने देखा है कि कुटिलता… क़त्ल के हुनर और दुनिया की सारी बदरंग बातें बच्चे अपने घरों में सीखते हैं…
वे प्रशिक्षण पाते हैं कि
“डूम साले चुप रह” सीधे मत कहो
और इसे उल्टा करो तो भी तुम्हें मज़ा आयेगा अच्छा लगेगा और सामने वाला शब्द समझे बिना भी समझ जायेगा कि वो क्या है और तुम क्या हो…
संस्कृति में गाली ज़ुबान से नहीं निगाह से आती है…
संस्कृति में क़ातिल बचपन से गढ़े जाते हैं
मैं …
द्रोह करता हूँ तुम्हारी दुनिया के खिलाफ…
मैं करता हूँ… युद्ध का ऐलान
तुम्हारी संस्कृति… भाषा
और साथ ही तुम्हारी निगाह के खिलाफ भी…
मैं एक शब्द नहीं लूंगा तुम्हारी भाषा से…
मैं किसी लैंगिक या जाति सूचक गाली को नहीं बनाऊंगा अपना हथियार…
मैं कोई वाक्य नहीं उलटूंगा
मैं सीधा वाक्य भी तुम्हारी भाषा का नहीं करुँगा इस्तेमाल
मैं तुम्हारी भाषा संस्कृति सभ्यता और धर्म को देखूंगा
अपनी तीख़ी स्पष्ट और बेखौफ़ निगाह से
और…
तुम बिलकुल चुप हो जाओगे…
एकदम चुप…

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