पश्चिम बंगाल की हिंसा क्या कहती है?

पश्चिम बंगाल की हिंसा क्या कहती है?

ओमप्रकाश तिवारी

 

पश्चिम बंगाल में शनिवार को ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी पर बदमाशों ने जानलेवा हमला किया। वह अस्पताल में भर्ती हैं। एक दिन बाद रविवार को एक और टीएमसी के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी पर बदमाशों ने हमला किया। उनकी भी हालत ठीक नहीं बताई जा रही है। टीएमसी ने इन हमलों के लिए भाजपा सरकार को जिम्मेदार बताया है। यह स्वाभाविक भी है।

टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा ने कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करके बताया है कि अभिषेक बनर्जी पर हमला करने वाले भाजपा से जुड़े हैं। वैसे भी इसमें कोई शक की गुंजाइश भी नहीं है। सवाल यह है कि क्या यही लोकतंत्र है? यदि भाजपा सरकार यह हमले नहीं करवा रही है तो काैन करवा रहा है?

यदि भाजपा सरकार हमले नहीं करवा रही है तो जो आरोपी हैं जिन्होंने हमले किए वे पकड़े क्यों नहीं जा रहे हैं? जाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं होना है। यह सब जानबूझकर और एक रणनीति के तहत किया जा रहा है। इन हमलों को वाजिब ठहराने के लिए जब यह कहा जाता है कि ममता बनर्जी के शासन काल में भाजपा नेताओं पर हमले किए गए। कार्यकर्ताओं को मारा गया तो जवाब मिल जाता है कि अब भाजपा वही करेगी।

चुनाव प्रचार के दाैरान अमित शाह ने कहा था कि टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर मारेंगे। इसका मतलब यही था कि जब भाजपा सत्ता में आएगी तो टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को उसी तरह मारा जाएगा जैसा कि अब टीएमसी के सांसदों और कार्यकर्ताओं पर हमला किया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि चुनाव के समय अभिषेक बनर्जी की भाषा अमित शाह के लिए सही नहीं थी? पर क्या अमित शाह की भाषा सही थी?टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर मारेंगे यह काैन सी भाषा है? यदि आप ऐसा बोलेंगे तो जवाब में किस शालीन भाषा की उम्मीद कर सकते हैं क्या?

यह भी कहा जा रहा है कि यह जनता का आक्रोश है? टीएमसी नेताओं पर जनता हमला कर रही है? इस विधानसभा के चुनाव में तमाम तिकड़मों के बावजूद भाजपा को करीब 42 फीसदी वोट मिले हैं। टीएमसी को सवा 38 फीसदी वोट मिले हैं। कुल चार फीसदी वोट का अंतर है। ऐसे में टीएमसी के खिलाफ इतने नफरत करने वाले कहां से आ गए? फिर भाजपा नेताओं के खिलाफ तो पूरे देश में आक्रोश है? उन पर तो जनता नहीं हमले कर रही है? इन्होंने काैन सा ऐसा काम कर दिया है कि अंधभक्तों के अलावा इन्हें कोई पसंद करे। यदि इनकी सुरक्षा हटा दी जाए तो क्या हाल होगा सब जानते हैं?

नोएडा में श्रमिकों का अंदोलन पुलिस के दम पर कुचला गया। नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री प्रधान को कैसे बचाया जा रहा है? कोई भी परीक्षा हो भाजपा की सरकार में सफलता से सम्पन्न नहीं हो पा रही है। महंगाई, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।

शिक्षा और इलाज इतना महंगा हो गया है कि लोग न पढ़ पा रहे हैं न ही इलाज करा पा रहे हैं। ऐसी कोई भी वजह नहीं है कि जनता भाजपा नेताओं को पसंद करे।

यदि उसके दिमाग में गोबर नहीं भरा है तो? फिर किस बिना पर पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई? जाहिर है हिंदू-मुस्लिम का एजेंडा चलाकर।

टीएमसी के मतदाताओं को वोट देने से रोककर और फर्जी मतदान कराकर। सरकार मशीनरी का दुरुपयोग करके सरकार बनी है। जो यह अब कर रहे हैं । सरकार बनने पर यही करेंगे इसका एलान पहले ही कर चुके हैं। टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर मारेंगे। एक यही नेता हैं बाकी पूरा विपक्ष गुंडा और बेवकूफ है।

चुनाव से पहले ही यह नैरेटिव बनाया गया कि ममता सरकार से लोग नाराज हैं? तमाम फर्जी खबरें फैलाकर ममता की सरकार और टीएमसी को बदनाम किया गया। टीएमसी के नेता और कार्यकर्ता हिंसक हैं। गुंडे हैं। भ्रष्टाचारी हैं? आराजक हैं। घुसपैठिए हैं। मुसलमान हैं। यही सब फैलाया गया।

यह काम हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों ने ज्यादा किया। नाैकरी के लिए यूपी और बिहार से कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के अन्य जिलों में जाकर बसे हिंदी भाषी लोगों में से अधिकतर ने अपने दिमाग के गोबर की खाद से खूब नफरत को फैलाया। ऐसे लोगों को ममता बनर्जी की बंगाली अस्मिता से बहुत दिक्कत होती थी। होनी भी चाहिए। प्रवासी हैं और उनकी अलग क्षेत्रीय पहचान है। यह और बात है कि उस क्षेत्र में उनके लिए काम नहीं है।

हर किसी को दूसरी क्षेत्रीय अस्मिता इसी तरह चुभती है। यही वजह है कि एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश से नफरत करते हैं। हालांकि वह एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाते हैं। फिर कई वहीं पर बस जाते हैं। ऐसे लोगों की जिस थाली में खाओ उसमें छेद करने की आदत बनी रहती है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय ऐसे लोग बहुत सक्रिय रहे। हिंदी पट्टी के तमाम लोगों से पश्चिम बंगाल को भर दिया गया था। विभिन्न प्रदेशों से गए ये लोग केवल और केवल टीएमसी व ममता बनर्जी के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे। पूरे देश में नाकाम साबित हो चुकी पार्टी को अच्छी बता रहे थे।

अब टीएमसी नेताओं के खिलाफ हिंसा करके उन्हें डराकर चुप कराकर घर में बैठने के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्योंकि जब तक यह लोग डरकर घर में नहीं बैठ जाएंगे तब तक भाजपा को सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा। अपने नफरती एजेंडे को लागू करने के लिए यह लोग इस तरह की हिंसा करते रहेंगे।

देखना होगा कि टीएमसी के नेता इनका कैसे मुकाबला करते हैं। अभी इनका निशाना भले ही टीएमसी नेता व कार्यकर्ता हैं लेकिन आने वाले दिनों में यह भाकपा, माकपा और कांग्रेस के नेताओं पर हमले करेंगे। इस बात को स्थानीय कांग्रेस के नेता भले ही न समझ पा रहे हों लेकिन राहुल गांधी समझ रहे हैं। यही वजह है कि वह ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।

भाकपा और माकपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी समझना होगा कि वैचारिक रूप से उनका मुकाबला भाजपा से ही है। टीएमसी को ठिकाने लगाने के बाद उनका निशाना वही होंगे। भाजपा ने जो हिंसा और नफरत की राजनीति पश्चिम बंगाल में शुरु की है उसके परिणाम दूरगामी होने वाले हैं। यदि विपक्ष ने इसका मुकाबला मिलजुलकर नहीं किया तो एक एक करके सभी को हाशिए पर डाल दिया जाएगा। एक देश एक पार्टी की विचारधारा लोकतंत्र के लिए खतरनाक होती है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्षी दल का होना बेहद जरूरी होता है। यदि ऐसा न हो तो एक पार्टी की सत्ता तानाशाही पर उतर आती है।

यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।

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