समय के सामने कवि और कविता-4

(न्याय हितैषी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की एक लोकप्रिय कविता है ‘जब इंसाफ कहीं ना होता हो'(अन्याय गाथा)। उक्त कविता के कुछ बंध प्रसंगवश कुछ लेखों में हमारे पाठकों तक पहुंचे तो कुछ ने पूरी कविता पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट की है। पाठकों की सुविधा के लिए शेष बंध भी यहां किस्तों में दिए जा रहे हैं ताकि पाठक देख सकें कि उस वक्त के हालात और आज के हालात में कितनी आश्चर्यजनक समानता है! फिर सरकारों के बदलने से आख़िर क्या बदला है? -संपादक)

समय के सामने कवि और कविता-4

ओमसिंह अशफ़ाक

कविता: जब इंसाफ कहीं ना होता हो !

1.
जब टी.वी. धन्नासेठ चलावैं !

फांसण खातिर जाल़ बिछावैं !

काले़ करतब सब सिखलावैं !

भोले़ नै नाश की राह पे लावैं !

मुफ़लिस का ना दर्द बतावैं !

बे(इ)तुकी बस हांकते जावैं !

न्यूं हरे ज़ख्म पै मिर्च लगावैं !

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

2.

जब अख़बार ना फ़र्ज निभाते हों !

बस, मशहूरी का वे खाते हों !

प्रसार की होड़ बढ़ाते हों !

जन-युद्ध में पीठ दिखाते हों !

सत्ता से लाभ उठाते हों !

पूंजी के कसीदे गाते हों !

और नाहक ही इतराते हों !

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

3.

फिर एक दिन ऐसी बात चलै !

चलती ही रहे दिन-रात चलै !

क्यूं घात और प्रतिघात चलै ?

क्यूं लूटमार उत्पात चलै ?

भई,आग्गै श्रमिक जमात चलै !

संग युवकों की बारात चलै !

सोची-समझी करामात चलै !

पूंजीवाद के पेट पे लात चलै !

सहमुक्ति की सौगात फलै़ !

फेर रोजी़-रोटी पाणी-पात चलै !

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

4.

फिर प्रजा आग्गै ना कोई अड़ै !

अगर अड़ै, तो चित्त पड़ै !

ना गोदाम के अंदर नाज सड़ै !

पकवान की घर-घर महक उड़े !

लड़के-लड़की बेखौफ पढ़ैं !

पढ़ते ही रहें और आग्गै बढ़ैं !

बढ़कै आग्गै वे शिखर चढ़ैं !..

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

(शेष शीघ्र अगली किस्त में)

(दिसंबर,2006)
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नोट: कविता में प्रयुक्त ज्यादातर शब्द “हरियाणवी स्थानीय बोली” के हैं। लेकिन हिंदी के पाठक भी उनको आसानी से समझ सकते हैं।