पूँजीवाद और नस्लवाद परस्पर संबद्ध हैं

क्यूबा की वैचारिक बुनियाद और कवि राष्ट्रनायक खोसे मारती पर संगोष्ठी

पूँजीवाद और नस्लवाद परस्पर संबद्ध हैं

रचनाकारों एवं संस्कृतिकर्मियों के साझा संगठन ‘हम देखेंगे : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान’ के बैनर तले रविवार, दिनांक 17 मई 2026 को दिल्ली स्थित सुरजीत भवन में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए बजरंग बिहारी ने कहा कि क्यूबा इन दिनों गहरे संकट में है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और प्रथम नागरिक सिलिया फ्लोरेंस का अपहरण कर लिया। अब वे अमेरिका की जेल में हैं। इस साम्राज्यवादी हमले में वेनेजुएला की रक्षा में तैनात दर्ज़नों क्यूबाई सुरक्षा गार्ड मारे गए। महीना न बीतने पाया कि 29 जनवरी को ट्रम्प ने क्यूबा को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘असामान्य और असाधारण ख़तरा’ घोषित किया। क्यूबा की नाकेबंदी कर दी गई। दवा, खाद्य सामग्री, बिजली, कच्चे माल की आपूर्ति सब बंद है। इस संघर्षरत देश के साथ, उसके नागरिकों के साथ अपनी एकजुटता दिखाने का समय है।

साम्राज्य बीते दिनों की बात नहीं है। वह ऐन दुनिया के सिर पर चढ़कर ललकार रहा है। क्यूबा की जीवटता देखते बनती है। इस जीवटपन का एक स्रोत वहाँ के राष्ट्रनायक कवि खोसे मारती में तलाशा जा सकता है। यह जानना सुखद है कि पिछले वर्ष 2025 में केन्द्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली ने ‘खोसे मारती : एक युगपुरुष’ का प्रकाशन किया है। इस किताब का अनुवाद, लेखन और संपादन विभा मोर्य ने किया है। खोसे मारती का जन्म 28 जनवरी 1853 को हवाना में हुआ था और वे साम्राज्यवादी स्पेन से क्यूबा को आज़ाद कराने में रविवार 19 मई 1895 में मात्र बयालीस वर्ष की उम्र में मारे गए।

यह संगोष्ठी उनकी शहादत दिवस के दो दिन पूर्व उनके प्रति और उनके देश के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए आयोजित की गई है। कवि-पत्रकार-संपादक-अनुवादक-क्रोनिकल राइटर खोसे मारती का विपुल लेखन क़रीब तीस खंडों में प्रकाशित है। अपनी एक कविता में मारती कहते हैं कि ‘दोस पैत्रियास तेंगो यो : कूबा यि ला नोचे। ओ सोन उना लास दोस? नो बियेन रेतीरा’ –मेरे दो वतन हैं : क्यूबा और रात। या क्या वे एक ही हैं?… क्यूबा पर अँधेरा और गहरा हुआ है। यह हमारे मुखर होने, मशाल जलाने का वक़्त है।

चर्चा की शुरुआत करते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्पेनी भाषा और साहित्य की प्रोफ़ेसर मीनाक्षी सुन्द्रियाल ने खोसे मारती और ‘क्यूबा क्रांति’ के संदर्भ में यह प्रकाश डाला कि कैसे यह एक पूर्ण चक्र में लौट आया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किस तरह से साम्राज्यवाद पूंजीवाद का ही एक हिस्सा है और आज हमारे समक्ष फिर से वही शोषक परिस्थितियाँ हैं। वे बताती हैं कि क्यूबा की आज़ादी के संघर्ष को “क्युबनिया” और “क्युबानिदाद” भी कहा जाता है, जिसके लिए वहाँ के लोगों ने लड़ा है।

उन्होंने इस बात का गहन विश्लेषण किया कि किस तरह से मारती के लिए “राष्ट्र का विचार” (आइडिया ऑफ़ अ नेशन ) सिर्फ मिट्टी और ज़मीन नहीं तक सीमित नहीं था बल्कि वहाँ के लोग और उनकी भावनाएं थीं। मारती के संपूर्ण अस्तित्व की धारणा आज़ादी के विचारों को अमल करने में संलग्न होने की है। उनका पूरा जीवन संघर्ष का रहा है। वे ना केवल एक लेखक बल्कि एक संघर्षरत योद्धा और सैनिक भी थे। इसी प्रकार “अंतरराष्ट्रीय ब्रिगेड” में भी कितने बुद्धिजीवी शहीद हुए। मारती का साहस उनकी कविताओं में भी दिखता है जब वे कहते हैं कि उन्हें सूरज की तरफ देखते हुए मरना है ना कि अपनी मौत से छिप कर। वे पैग़ाम देते हैं साहस का, नैतिकता का, जो लोगों को समर्पित हो।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के आचार्य और प्रखर चिंतक गोपाल प्रधान ने कहा कि यह जानना रोमांचकारी है कि आबादी के मामले में दिल्ली से आधा क्यूबा अनथक संघर्ष कर रहा है। अभी मार्को रूबियो ने जिस उपनिवेशवाद की तारीफ़ की उसके विरोध में क्यूबा के संघर्ष से खोसे मारती के लेखन का जन्म हुआ। उस संघर्ष का अभिन्न अंग सामाजिक बदलाव भी था। इस संघर्ष ने ऐसी राजनीति को जन्म दिया जो संस्कृति को भी लड़ाई का मोर्चा बनाना चाहती थी।

गोपाल प्रधान ने कहा कि नस्लवाद की लड़ाई का आख़िरी मुक़ाम उपनिवेशवाद का विरोध है। पूँजीवाद ने अपने मुनाफ़े के लिए पारंपरिक ग़ैर बराबरी जैसे पितृसत्ता, जाति, नस्लवाद को नई शक्ल में ढाला है। साहित्य से राजनीति का रिश्ता अब क्षीण हो चला है। उपनिवेशवाद के विरुद्ध क्यूबा के संघर्ष में साहित्य की भूमिका है। उसकी अनुगूँज विभा मोर्य द्वारा संपादित किताब में है।

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली की पूर्व प्रोफ़ेसर, स्पेनिश और लैटिन अमेरिकी अध्ययन केन्द्र की संस्थापक निदेशक सोन्या सुरभि गुप्ता ने अपने व्याख्यान में कहा कि खोसे मारती के विचारों की समकालीन वैधता, उनकी अहमियत का कारण है, क्यूबा की जनता का मारती के आज़ादी और सामाजिक न्याय के विचारों से पूरा जुड़ाव, जिसने उन्हें देश का सबसे बड़ा आदर्श बनाया।  उनका इंसानियत से भरा नज़रिया, और उनके जीवन और उनके काम की नैतिकता, इन सबने क्यूबा में समाजवादी विचारों को पनपने में मदद की। मार्ती की विशाल कृतियों के अध्ययन ने विद्वानों और व्याख्याकारों के बीच अनेक विवादों को जन्म दिया है। ये विवाद साहित्य में उनका मॉडर्निज़्म (आधुनिकतावाद) से संबंध, उनकी धार्मिकता, उनकी दार्शनिक विचारधारा, और अपने समय के समाजवादी विचारों के प्रति उनकी सहमति या असहमति के स्तर जैसे विविध विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे हैं।

खोसे मारती को लैटिन अमरीकी आधुनिकतावाद का संस्थापक एवं अग्रदूत माना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में जन्मा लैटिन अमरीकी आधुनिकतावाद (Modernismo) स्पेनिश भाषा का पहला वास्तविक रूप से मौलिक साहित्यिक आंदोलन था, जिसने उत्तर उपनिवेशीय लाती अमरीकी साहित्य, विशेषकर कविता में,  छंद-विधान और भाषा दोनों का नवीनीकरण किया।

लैटिन अमरीकी आधुनिकतावादी कविता को दिशा देने वाली बौद्धिक और कलात्मक जागृति ने औपनिवेशिक सांस्कृतिक मॉडलों को खत्म करने की कोशिश की और अपनी पहचान पेश करने का एक अलग तरीका बनाने का प्रयास किया। भारतीय आधुनिकतावाद की शुरुआत भी अंग्रेज़ों द्वारा प्रचलित और विकसित  की जा रही अकादमिक कला से विमुख होने की इच्छा से हुई थी।

मारतो ने इस साहित्यिक शैली को गहरी सामाजिक और राजनीतिक चेतना प्रदान की। जहाँ आधुनिकतावाद के अन्य लेखक — जैसे रुबेन दारीओ  — अधिकतर पलायनवाद, विदेशीपन और अभिजात सौंदर्यवाद की ओर झुक गए, वहीं मार्ती का आधुनिकतावाद स्वतंत्रता, लैटिन अमरीकी पहचान और नैतिक प्रतिबद्धता की सेवा में समर्पित सौंदर्यबोध से सराबोर था। “हमारा अमरीका” (1891) जैसे महत्वपूर्ण निबंधों के माध्यम से उन्होंने साम्राज्यवादी खतरे के विरुद्ध लैटिन अमरीकी समाजों की मौलिकता और विशिष्टता का समर्थन किया।

खोसे मारती  का मार्क्सवाद से क्या ताल्लुक रहा? वे  मार्क्स की श्रमिक वर्ग के प्रति प्रतिबद्धता, मानवीय दुःख-दर्द का विश्लेषण करने की उनकी क्षमता, और पूँजीवादी शोषण की उनकी तीखी आलोचना की गहराई से सराहना करते थे । 1883 में मार्क्स की मृत्यु के बाद, मारतो ने उनके बारे में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने उनकी बौद्धिक प्रतिभा और नैतिक महानता को स्वीकार करते हुए कहा: “कार्ल मार्क्स का निधन हो गया है। क्योंकि वे कमजोरों के पक्ष में खड़े हुए, वे सम्मान के पात्र हैं।” मार्क्स के व्यक्तित्व का सम्मान करने के बावजूद, मार्ती मार्क्सवादी नहीं थे। उन्हें भय था कि यूरोपीय सिद्धांतों को यांत्रिक रूप से अपनाया जाएगा, और उनका अंधानुकरण “हमारे अमरीका” की वास्तविकता और विशेष संदर्भ के अनुरूप नहीं होगा।

अपने व्याख्यान का उपसंहार करते हुए प्रो. सोन्या सुरभि गुप्ता ने प्रश्नवाचक लहज़े में कहा कि बीसवीं सदी में, यूरोपीय मार्क्सवाद को देशज बनाना लैटिन अमरीकी मार्क्सवाद का विशिष्ट आयाम रहा है। क्या हम यही बात भारतीय मार्क्सवाद के लिए कह सकते हैं?

संगोष्ठी की अंतिम वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनी भाषा की प्रोफ़ेसर रहीं डॉ. विभा मोर्य ने विस्तार से खोसे मारती के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा की। खोसे मारती ने पहले एक स्कूल मास्टर के संरक्षण में शिक्षा पायी; बाद में स्पेन में कानून, दर्शन एवं साहित्य की शिक्षा ग्रहण की। प्रारंभिक कारावास: मात्र 16-17 वर्ष की आयु में क्यूबा की स्वतंत्रता के प्रयासों में भाग लेने पर कठोर कारावास, बेड़ियाँ, फिर निर्वासन।

क्यूबा का स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रोशनी डालते हुए उन्होंने बताया कि सबसे पहले गुलामों का विद्रोह हुआ। 1812 में अंतोनियो अपोंते ने ब्लैक रिपब्लिक बनाने का प्रयास किया। ला एसकलेरा अर्थात् इसे स्पेनी शासकों द्वारा अश्वेत नेतृत्व को क्रूरतापूर्वक कुचला गया। फिर दस साल का युद्ध (1868-1878) हुआ। यह पहला बड़ा संगठित युद्ध था। इसमें लगभग 2 लाख मौतें हुईं। नेतृत्व कार्लोस सेस्पेडेस ने किया, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण युद्ध असफल रहा।

खोसे मारती के योगदान एवं विचारों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि निर्वासन में रचनात्मकता का विकास हुआ है। वे उत्तरी अमेरिका में 15 वर्ष रहे।  27 खंडों में रचनाएँ उनकी संग्रहीत हैं। उन्होंने साम्राज्यवाद की पहचान की। अमेरिकी विस्तारवाद (पैन-अमेरिकन एकता) को ‘भेड़िए और भेड़ का मिलन’ कहकर आगाह किया। एकता का सिद्धांत देते हुए उन्होंने साइमन बोलिवार की तरह लैटिन अमेरिका को एकजुट रहने का संदेश दिया। मारती ने ग्लोबल साउथ की परिभाषा दी। ‘हमारा अमेरिका’ निबंध में उत्तर से अलग दक्षिणी पहचान की स्थापना की। उन्हें ‘तीसरी दुनिया का पहला नेता’ माना जाता है। आदर्श समाज का खाका पेश करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा समाज ही आदर्श हो सकता है जहाँ समानता, सामाजिक न्याय, अंतर-समुदाय मेल-मिलाप, और धन का समान वितरण हो। वे नस्ली भेदभाव के खिलाफ थे। अश्वेतों और देसी लोगों को उन्होंने उभरती ताकत माना था। मानवीय मूल्यों एवं इंसान की प्रमुखता पर उनका जोर रहता था। साहित्यिक सृजन में उनकी प्रमुख विधाएँ थीं कविता, निबंध, और बाल साहित्य। वे  आधुनिकतावाद के अग्रदूत थे किन्तु उनकी शैली यूरोपीय शैली से अलग थी। उनकी शैली छोटी, दमदार पंक्तियों, मुहावरेदार भाषा और शक्तिशाली कल्पना (इमेजरी) से पहचानी जाती है।

विभा मोर्य ने अनुवाद संबंधी कठिनाइयों पर भी बात की। अनुवाद में तकनीकी पक्ष (लय, छंद) बनाम भावार्थ (विचार) का संतुलन साध पाना मुश्किल हुआ करता है। इसी तरह ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भों (लैटिन अमेरिकी हस्तियों, घटनाओं) का अनुवाद करने में सावधानी बरतनी पड़ती है। ‘हमारा अमेरिका’ जैसे शीर्षकों में निहित राजनीतिक विद्रोह को बरकरार रखना एक चुनौती होती है। अनुवाद में सरल दिखने वाली रचनाओं की वास्तविक गहराई को न खोने देना चुनौतीपूर्ण होता है।

विभा मोर्य ने चर्चा का समाहार करते हुए कहा खोसे मारती मानवतावाद, राजनीतिक निपुणता और साहित्यिक प्रतिभा का अद्वितीय मिश्रण थे। उन्होंने उपनिवेशवाद और उभरते अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ एक नैतिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष की रूपरेखा दी, जो आज भी प्रासंगिक है।

सभी व्याख्यानों के बाद प्रश्नोत्तर का संक्षिप्त सत्र चला। इस संगोष्ठी में दिल्ली के जाने-माने रचनाकार, कार्यकर्ता और शोधार्थी-विद्यार्थी शामिल हुए। योगेन्द्र आहूजा, देवीप्रसाद मिश्र, राकेशरेणु, रेखा अवस्थी, संजीव कुमार, रश्मि रावत, गजेन्द्र रावत, चंद्रभूषण, टेकचंद, अभय कुमार, प्रेम तिवारी, मौसम कुमारी, अशोक तिवारी, तारा, अभिनंदन, वेद शर्मा, प्रिंसराज, इंद्रजीत, सौरभ, अमित, नवनीत, धीरज, शुभम आदि चार घंटे चली इस संगोष्ठी में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में अंशु कुमार चौधरी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

हम देखेंगे में शामिल संगठन हैं – जनवादी लेखक संघ, दलित लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन नाट्य मंच, इप्टा और प्रतिरोध का सिनेमा।

नई  दल्ली से बजरंग बिहारी तिवारी की रिपोर्ट

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