बदलता समाज
परीक्षाओं में सेंटीग्रेड का दौर और फारेनहाइट वाली पीढ़ी
डॉ. सत्यवान सौरभ
एक दौर वह भी था, जब परीक्षा परिणाम केवल अंक नहीं होते थे, पूरे समाज की धड़कन हुआ करते थे। आज की तरह मोबाइल स्क्रीन पर उँगली फेरते ही परिणाम नहीं खुलते थे, न ही “सर्वर डाउन” पर मीम बनते थे। तब रिजल्ट आने का अर्थ था—रातभर जागना, अखबार का इंतज़ार करना और दिल की धड़कनों का किसी अनजाने भय से तेज हो जाना। परिणाम केवल विद्यार्थी का नहीं होता था, पूरे परिवार, पूरे मोहल्ले और कई बार पूरे गाँव की प्रतिष्ठा उससे जुड़ी होती थी। जिस घर में बोर्ड परीक्षा देने वाला बच्चा होता, वहाँ महीनों पहले से वातावरण बदल जाता। माता-पिता की आवाज़ों में गंभीरता आ जाती, रिश्तेदार सलाहकार बन जाते और पड़ोसी भी समय-समय पर यह याद दिलाते रहते कि “अबकी बोर्ड है बेटा, खेल-कूद कम करो।”
आज बच्चों के अंक देखिए—99.5, 98.7, 98.2… लगता है जैसे तापमान फारेनहाइट में मापा जा रहा हो। और एक हमारा समय था, जब नंबर भी सेंटीग्रेड में आते थे—36.4, 37.8, 39.2। यदि किसी ने 50 प्रतिशत की सीमा पार कर ली, तो उसे पूरे इलाके का विद्वान मान लिया जाता था। लोग गर्व से कहते—“फलाने का लड़का बड़ा होशियार है, पचपन प्रतिशत लाया है!” उस समय अंक केवल प्रतिशत नहीं थे, संघर्ष की कहानी हुआ करते थे। आज की तरह कोचिंग, टेस्ट सीरीज़, ऑनलाइन क्लास और डिजिटल नोट्स का संसार नहीं था। एक किताब कई बार तीन-तीन दोस्तों के बीच घूमती थी और गाइड बुक किसी खजाने से कम नहीं मानी जाती थी।
आज शत-प्रतिशत परिणाम देने वाले विद्यालय विज्ञापनों में मुस्कराते दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया पर बधाइयों का अंबार लग जाता है। मगर एक समय ऐसा भी था, जब पूरे बोर्ड का परिणाम 20 या 22 प्रतिशत आता था और उसमें यदि घर का एक बच्चा भी पास हो जाए, तो परिवार का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। उस समय “डिवीजन” से अधिक महत्व “पास” शब्द का होता था। यदि कोई तीसरी श्रेणी में भी पास हो जाए, तो घर में मिठाई बँट जाती थी। रिश्तेदार कहते—“चलो, लड़का मेहनती निकला।” और यदि किसी ने प्रथम श्रेणी प्राप्त कर ली, तो वह पूरे क्षेत्र की चर्चा बन जाता। कई परिवार तो ऐसे बच्चों को दूसरों के सामने उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते—“देखो, कैसे पढ़ता था दिन-रात।”
दसवीं बोर्ड का नाम ही बच्चों के मन में ऐसा भय भर देता था कि कई विद्यार्थी नवीं तक पहुँचते-पहुँचते ही पढ़ाई से वैराग्य लेने लगते थे। बचपन से कानों में यही डाला जाता—“बेटा, असली परीक्षा तो हाईस्कूल है, वहीं पता चलेगा कितने काबिल हो।” गुरुजन और परिजन उत्साह कम, भय अधिक देते थे—“नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं!” उस समय बोर्ड परीक्षा किसी युद्ध से कम नहीं लगती थी। परीक्षा केंद्र दूसरे स्कूलों में पड़ते थे और वहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता था जैसे किसी अनजान प्रदेश में भेज दिया गया हो। विद्यार्थी एडमिट कार्ड को किसी पहचान पत्र की तरह बार-बार टटोलते रहते थे।
और यदि कोई छात्र पहले से ही कमजोर हो, तो उसके मित्र भी उसे हतोत्साहित करने में कोई कमी नहीं छोड़ते—“भाई, केवल पढ़ने से कुछ नहीं होता, हाईस्कूल पास करना हर किसी के भाग्य में नहीं लिखा होता… हमें ही देख लो!” उस समय हास्य भी डर के साथ चलता था। जो छात्र लगातार एक ही कक्षा में वर्षों से डटे रहते, उन्हें बड़े सम्मान से “अनुभवी” माना जाता था। वे परीक्षा प्रणाली के चलते-फिरते विश्वकोश होते थे। कौन-सा परीक्षक किस विषय में कम नंबर देता है, किस प्रश्न को छोड़ना नहीं चाहिए और सप्लीमेंट्री से बचने का क्या उपाय है—इन सबका ज्ञान उन्हें कंठस्थ रहता था।
वह समय “पंचवर्षीय योजना” वाले विद्यार्थियों का भी था। ये वे महान आत्माएँ थीं, जो वर्षों से हाईस्कूल में तपस्या कर रही होती थीं। विडंबना यह थी कि रिजल्ट वाले दिन वही सबसे बड़े नायक बन जाते। ऑनलाइन सुविधा का नामोनिशान नहीं था। रिजल्ट आने के एक दिन पहले ही मोहल्ले के दो-तीन स्वयंभू हीरो मोटरसाइकिल लेकर शहर निकल जाते। अक्सर ये वही पंचवर्षीय योजना वाले साथी होते। आधी रात को जब उनकी हीरो होंडा या यामाहा की आवाज़ गली में सुनाई देती, तो पूरा मोहल्ला चौकन्ना हो उठता। लोग घरों से बाहर निकल आते। बच्चों की धड़कनें बढ़ जातीं और माता-पिता की आँखों में बेचैनी उतर आती।
फिर किसी की ऊँची आवाज़ गूंजती—“रिजल्ट आ गया…!” और देखते ही देखते पूरा मोहल्ला जमा हो जाता। अखबार कमर में खोंसकर उनमें से एक किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता—कभी चबूतरे पर, कभी दुकान की छत पर। फिर शुरू होती सार्वजनिक घोषणाएँ—
“दो हजार पाँच सौ बत्तीस…”
“फेल!”
“तैंतीस…”
“फेल!”
“चौंतीस…”
“फेल!”
“पैंतीस…”
“सप्लीमेंट्री!”
न कोई गोपनीयता, न कोई निजी सम्मान। पूरे मोहल्ले के सामने भाग्य का फैसला सुनाया जाता था। आज की तरह “डेटा प्राइवेसी” जैसी कोई अवधारणा तब समाज में नहीं थी। जिस बच्चे का परिणाम खराब आता, उसके चेहरे से अधिक लोगों की टिप्पणियाँ सक्रिय हो जातीं—“दिनभर क्रिकेट खेलेगा तो यही होगा!” कोई कहता—“टीवी बहुत देखता था।” तो कोई निष्कर्ष देता—“शुरू से ही पढ़ाई में मन नहीं था।”
रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन के अनुसार तय होती थी। थर्ड डिवीजन के अलग भाव, सेकंड डिवीजन के अलग, और फर्स्ट डिवीजन वालों से तो मानो बोनस लिया जाता। किंतु जो फेल हो जाए, उसके लिए यह सेवा पूर्णतः निःशुल्क रहती थी—आख़िर दुख में व्यापार कैसा! जो विद्यार्थी पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर स्वयं अखबार देखने का अवसर मिलता। टॉर्च की रोशनी में प्रवेश-पत्र से रोल नंबर मिलाया जाता। और जब यह सुनिश्चित हो जाता कि वही नंबर है, तो पिता-पुत्र के चेहरे पर वैसा गर्व झलकता जैसा किसी पर्वतारोही के चेहरे पर एवरेस्ट फतह करने के बाद दिखाई देता होगा।
जिनका नंबर अखबार में नहीं मिलता, उनके घरों में सांत्वना का अलग ही दर्शन चलता—“अरे, कुम्भ का मेला थोड़े ही है जो बारह साल बाद आएगा, अगले साल फिर दे देना परीक्षा!” यह वाक्य केवल दिलासा नहीं था, जीवन-दर्शन था। उस समय असफलता को अंत नहीं माना जाता था। बच्चे टूटते कम थे, दोबारा उठ खड़े होने का साहस अधिक रखते थे। आज की तरह अवसाद, तुलना और मानसिक दबाव इतने व्यापक नहीं थे। शायद इसलिए क्योंकि तब जीवन केवल अंकों के इर्द-गिर्द सीमित नहीं था।
उस दौर में परीक्षा परिणाम सामाजिक आयोजन हुआ करता था। पूरी रात चाय बनती रहती, लोग एक-दूसरे के घर जाकर पूछते—“फलाने का लड़का पास हुआ क्या?” यदि किसी ने पहली बार में हाईस्कूल निकाल लिया हो, तो वह पूरे मोहल्ले की चर्चा बन जाता। और इन सबके बीच एक सत्य हर वर्ष चुपचाप अपनी उपस्थिति दर्ज कराता—लड़कियाँ। संख्या भले कम होती, पर बाजी प्रायः वही मार ले जातीं। सीमित अवसर, सीमित संसाधन और सामाजिक बंधनों के बावजूद वे सिद्ध कर देतीं कि प्रतिभा किसी विशेषाधिकार की मोहताज नहीं होती।
आज शिक्षा का स्वरूप बदल गया है। प्रतियोगिता तीव्र हो चुकी है। 95 प्रतिशत अंक भी सामान्य माने जाने लगे हैं। पहले बच्चे फेल होने से डरते थे, अब 99 प्रतिशत लाकर भी संतुष्ट नहीं होते क्योंकि किसी और के 99.4 आ गए। कोचिंग संस्थानों ने शिक्षा को प्रतियोगिता का उद्योग बना दिया है। बच्चों का बचपन प्रतिशतों और रैंकिंग के बीच कहीं खोता जा रहा है।
यह परिवर्तन केवल शिक्षा व्यवस्था का नहीं, समाज की मानसिकता का भी है। हमने अंकों को योग्यता का अंतिम प्रमाणपत्र बना दिया है। जबकि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षाएँ मार्कशीट से बाहर होती हैं। पुराने समय में कम अंक पाने वाला भी सम्मानपूर्वक जीता था, क्योंकि तब इंसान की कीमत केवल प्रतिशत से तय नहीं होती थी। आज सुविधाएँ अधिक हैं, लेकिन मन का संतोष कम दिखाई देता है।
समय बदलना स्वाभाविक है। तकनीक का विकास भी आवश्यक है। पर कभी-कभी सेंटीग्रेड वाले उन अंकों की आत्मीयता, फारेनहाइट वाली इस चमक से कहीं अधिक मानवीय प्रतीत होती है। क्योंकि तब 36 प्रतिशत लाने वाला भी यह महसूस करता था कि उसने जीवन की एक कठिन वैतरणी पार कर ली है। और शायद यही उस दौर की सबसे बड़ी खूबसूरती थी—कम अंकों में भी आत्मसम्मान बचा रहता था, और असफलता में भी जीवन आगे बढ़ता रहता था।
