यह केवल मंदिर विवाद नहीं, बराबरी की आत्मा पर हमला है

यह केवल मंदिर विवाद नहीं, बराबरी की आत्मा पर हमला है

त्रिभुवन

नीचे एक पत्र है, जो भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील के बराना गांव के बलाई जाति के नागरिक श्री विष्णु बलाई ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत साहब को अपनी पीड़ा लिखी है। गांव के ऐसे लोग जो संघ से जुड़े हैं, वे बलाई समाज के मंदिर के आयोजन को नहीं होने दे रहे और उन्हें विवश कर रहे हैं कि वे यह सब काम बाहर करें। राजस्थान की बलाई वह जाति है, जिसने एक हज़ार साल से अधिक समय से अमानुषिक ज़ुल्मों को तो सहा ही है, रियासती काल में भी इन पर अगणित अत्याचार हुए हैं। कुछ अत्याचार तो हर रोज़ ही होते रहे थे। लेकिन इस पत्र को देखें तो यह भयावह है।

इस पत्र को पढ़कर सबसे पहले जो बात चुभती है, वह यह है कि पीड़ा केवल एक पुजारी की नहीं है; यह उस मनुष्य की पीड़ा है जिसके पुरखों ने जिस देवस्थान को अपने श्रम, आस्था और निजी संपत्ति से खड़ा किया, आज उसी देवस्थान के द्वार पर उसकी जाति को खड़ा करके उससे कहा जा रहा है : तुम्हारा यहाँ क्या काम?

अगर पत्र में दर्ज आरोप सही हैं तो यह कोई साधारण प्रबंधन-विवाद नहीं है। यह मंदिर की चाबी, दान-पात्र या मेले के आयोजन का झगड़ा भर नहीं है। यह उस पुराने सामंती मानस का पुनरुत्थान है, जो दलित को भक्त तो मान सकता है, दानदाता तो मान सकता है, भीड़ तो मान सकता है, लेकिन पुजारी, व्यवस्थापक और स्वाभिमानी अधिकारधारी मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस परिवार ने पीढ़ियों तक खाकुल देवजी मंदिर की पूजा-अर्चना की, जिसने अपनी वंश-परंपरा, श्रम और आस्था से उसे जीवित रखा, उसी परिवार को आज मंदिर से दूर रखने की कोशिश बताई जा रही है। यह धर्म नहीं, धर्म के नाम पर सत्ता-कब्ज़ा है। यह भक्ति नहीं, भक्ति की आड़ में सामाजिक अपमान है। यह मंदिर-रक्षा नहीं, मंदिर को जाति-अहंकार की चौकी में बदल देने की कोशिश है।

पत्र में एक वाक्य सबसे भयावह है—स्थानीय स्तर पर कुछ लोग दलितों को “हिंदू नहीं मानते” और जातिगत भेदभाव करते हैं। अगर ऐसा है, तो यह केवल अपमानजनक नहीं, वैचारिक रूप से भी विध्वंसक है। जो लोग “सकल हिंदू समाज” की बात करते हैं, उनके लिए पहली परीक्षा यही है कि वे दलित पुजारी को मंदिर के भीतर सम्मान से खड़ा कर सकते हैं या नहीं। यदि दलित केवल संख्या बढ़ाने के लिए हिंदू है, लेकिन मंदिर की व्यवस्था, पूजा और सम्मान में बराबर नहीं है, तो यह “समरसता” नहीं, छल है।

कानून की दृष्टि से भी यह गंभीर मामला है। संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उससे उपजी किसी भी सामाजिक अक्षमता को दंडनीय बनाता है। Protection of Civil Rights Act, 1955 में “place of public worship” की परिभाषा बहुत व्यापक है; निजी स्वामित्व वाला पूजा-स्थल भी, यदि जनता के पूजा-उपयोग के लिए खुला है, इस परिभाषा में आ सकता है। इसी कानून के तहत अस्पृश्यता के आधार पर किसी को सार्वजनिक पूजा-स्थल में प्रवेश या पूजा से रोकना अपराध है।

और यदि आरोपों के अनुसार दलित पुजारी को जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश, पूजा, प्रबंधन, दान-पात्र या धार्मिक गतिविधियों से रोका गया, सार्वजनिक रूप से जातिसूचक अपमान हुआ, धमकी दी गई, मारपीट हुई या सामाजिक बहिष्कार जैसा दबाव बनाया गया, तो SC/ST Prevention of Atrocities Act की धाराएँ भी विचारणीय हैं। इस कानून में सार्वजनिक पूजा-स्थल में प्रवेश या धार्मिक/सामाजिक जुलूस में भागीदारी से रोकने, जाति-नाम से अपमानित करने, डराने, झूठे मुकदमे में फँसाने और सामाजिक/आर्थिक बहिष्कार की धमकी जैसी स्थितियों को गंभीर अपराध माना गया है।

इस व्यक्ति के साथ अन्याय इसलिए हो रहा है क्योंकि उसके अधिकार को “व्यक्तिगत विवाद” बनाकर छोटा किया जा रहा है, जबकि पत्र के आरोप बताते हैं कि मामला जातिगत अपमान, धार्मिक बहिष्करण और संस्थागत संरक्षण का है। अन्याय इसलिए हो रहा है क्योंकि शिकायतकर्ता कह रहा है कि उसने शिकायत दी, पर कार्रवाई नहीं हुई। अन्याय इसलिए हो रहा है क्योंकि वह अपने ही पुरखों के देवस्थान में प्रवेश और पूजा का अधिकार मांग रहा है, कोई राजनीतिक उपकार नहीं। अन्याय इसलिए हो रहा है क्योंकि जो लोग सामाजिक समरसता का नारा देते हैं, वे कथित रूप से स्थानीय दबंगई के सामने चुप हैं या पक्षपाती दिखाई दे रहे हैं।

सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि पीड़ित को ही “समस्या” बना दिया गया है। भारत में दलित उत्पीड़न का यह पुराना तरीका है। पहले उसके अधिकार छीनो, फिर जब वह आवाज़ उठाए तो उसे विवादकारी, झगड़ालू, राजनीति करने वाला या संगठन-विरोधी बता दो। यह पत्र इसी उलटबाँसी की गवाही देता है। एक दलित पुजारी कह रहा है, मेरे परिवार का मंदिर है, मेरे पुरखों की परंपरा है, मुझे पूजा करने दीजिए। और कथित तौर पर जवाब मिल रहा है, तुम्हें हटाया जाएगा, दान-पात्र काटा जाएगा, मेले पर नियंत्रण हमारा होगा, शिकायत करोगे तो देख लेंगे। यही अन्याय का मूल है: अधिकार मांगने वाले को अपराधी बना देना।

इस मामले में प्रशासन की निष्क्रियता सबसे गंभीर सवाल है। पुलिस और प्रशासन का काम यह देखना नहीं कि कौन-सा संगठन किसके साथ है; उनका काम यह देखना है कि क्या किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश, पूजा या सम्मान से रोका गया? क्या मारपीट हुई? क्या जातिगत गालियाँ दी गईं? क्या धमकी दी गई? क्या दान-पात्र या मंदिर-व्यवस्था पर कब्ज़े की कोशिश हुई? क्या शिकायत दर्ज करने से बचा गया? इन प्रश्नों का जवाब निष्पक्ष जांच से निकलना चाहिए, न कि स्थानीय दबाव से।

यहाँ न्याय का न्यूनतम रास्ता साफ है: स्वतंत्र जांच हो, CCTV और गवाहियों को सुरक्षित किया जाए, पीड़ित परिवार को सुरक्षा दी जाए, मंदिर में पूजा और प्रवेश के अधिकार की तत्काल रक्षा हो, और जिन पर जातिगत अपमान, मारपीट या धमकी के आरोप हैं, उनके खिलाफ कानून के अनुसार FIR दर्ज कर निष्पक्ष कार्रवाई हो। अगर मामला संपत्ति या प्रबंधन का है तो उसका फैसला सक्षम अदालत करे; लेकिन जब तक फैसला न हो, किसी दलित पुजारी परिवार को धमकी देकर मंदिर से बेदखल करना न धर्म है, न कानून, न हिंदू समाज का सम्मान।

सबसे कड़वी बात यही है: जिस समाज में देवता की मूर्ति सुरक्षित है, लेकिन उसी देवता की पीढ़ियों से सेवा करने वाला दलित पुजारी असुरक्षित है, वहाँ मंदिर नहीं, मनुष्यता संकट में है। और यदि “हिंदू समाज” सचमुच एक है, तो उसकी पहली घोषणा भाषण से नहीं, इस पुजारी के सम्मानपूर्वक मंदिर-प्रवेश से होनी चाहिए। वरना समरसता शब्द रहेगा, भीतर से जाति की दीवार वैसे ही खड़ी रहेगी—ठंडी, क्रूर और देवता के नाम पर मनुष्य को अपमानित करती हुई।

और अगर कोई मुझसे सच पूछे और मैं अपने परिवार में लंबी परंपराओं और मौखिक इतिहास के आधार पर कहूं तो कटु सत्य ये है कि मंदिरों का निर्माण और मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा करने का सिलसिला शुरू ही भारत की अछूत जातियों से हुआ है। उच्च वर्ण के लोग या ब्राह्णण तो वेदपाठी थे। उन्होंने उन्हें अछूतों को छूने तक नहीं दिया और साफ़ कहा कि स्त्री शूद्रो नाधीयताम। मनुस्मृति में सब तरह के पापों और अपराधों का जिक्र है, लेकिन यह कहीं नहीं लिखा कि मंदिर को अपवित्र कर दे तो क्या दंड हो। यानी मनु के काल में मंदिर और मूर्ति थे ही नहीं। तो आदिकाल से जो मंदिर और मूर्ति पर नैसर्गिक अधिकार भारत में है, वह तो दलितों का ही है। उच्च जातियाँ उनके लिए कुछ छाेड़ेंगी कि नही। वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन के फेसबुक वॉल से साभार 

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