आज का समय और कविता की ताकत-4 

कुछ निजी प्रसंग-4

आज का समय और कविता की ताकत-4

ओमसिंह अशफ़ाक

इस चौथी घटना में हरियाणा पुलिस के एक सिपाही की प्रतिक्रिया शामिल है।

हुआ यूं कि आर.के.एस.डी. कालेज, कैथल (हरियाणा) में बी.ए. या एम.ए (?) की परीक्षा चल रही थी।

डॉ० राजबीर पराशर उसी कालेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। लिहाज़ा उनकी भी परीक्षा के संबंध में कोई ड्यूटी लगी हुई थी।

संयोगवश उस समय उनके हाथ में पुस्तक ‘अन्याय गाथा’ की कुछ प्रतियां थीं।

उन पुस्तकों को देखकर ड्यूटी पर आए एक सिपाही ने “टाइम-पास” के इरादे से एक पुस्तक उनसे मांग ली।

बाद में वह सिपाही पुस्तक पढ़ता रहा होगा।

जब परीक्षा सम्पन्न हुई और ड्यूटी समाप्त हुई तो वह पुस्तक लेकर प्रो.राजबीर पराशर के पास आया। प्रो. राजबीर पराशर ने उससे पूछा किताब कैसी लगी?

पुलिस वाले ने कुछ ऐसी प्रतिक्रिया दी- “यो तो जी-भोत खतरनाक किताब है।

“इसमें तो इसी-इसी बातां लिख राखी सैं, जिसी नेताजी सुभाष चन्दर बोस कह्या करदा..!”

प्रो. राजबीर पराशर ने उसकी इच्छा जानकर वह पुस्तक उसी को दे दी।

मुझे नहीं मालूम उस सिपाही ने अपनी पढ़ाई लिखाई किस स्तर तक की हुई थी।

नेताजी के विचारों बारे उसकी ऐसी धारणा स्वगत थी, सुनी सुनाई थी अथवा पढ़-लिख कर बनी थी।

लेकिन मोटे तौर पर एक निष्कर्ष तो निकल ही सकता है कि उक्त कविता पुस्तक ने उसे गहरे तक प्रभावित किया होगा।

तभी उसने अपनी प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों का सहारा लिया होगा?

बेशक इस अतिरंजना, असमानता और अनुपयुक्त तुलना के पीछे समुचित जानकारी का अभाव भी हो सकता है।

हरियाणा और उत्तर प्रदेश के समाज में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में बहुत सी किंवदन्तियां भी प्रचलित हैं।

हरियाणा के सांगियों और रागिनी के लोक-गायको ने भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के “किस्से और रागणी” खुद बनाकर भी खूब गाए हैं।

क्योंकि यह लेखक खुद भी नेताजी का बड़ा प्रशंसक है परंतु खुद को नेता जी सुभाष चंद्र बोस के “चरणों की धूल” बराबर मानता है।

क्योंकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस आधुनिक इतिहास की बहुत बड़ी हस्ती हैं।

नेताजी की सोच, संघर्ष और बलिदान की बराबरी भविष्य में भी शायद ही कोई कर पाए!

अन्त में एक बार फिर हम नतमस्तक होकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नमन करते हैं!

आइए इसी पुस्तक में से एक कविता के कुछ बंद आज फिर से पढ़ लेते हैं:

1.

जब फसल वफ़ा ना देती हो!

और खून पसीना लेती हो!

घटिया बीज कंपनी देती हो !

और पैसे मोटे लेती हो !

ना ‘कीड़ेमार’ भी असर करें !

फिर कीड़े छोड़, किसान मरें !

रो-रो के विधवा बैन करें !

फिर टूम-ठेंकरी रहन धरें !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

 

2

जब किडनी किसान बेचता हो !

और सारा ही ज़हान देखता हो !

ना कोई कुछ भी करता हो !

और बेबस इनसां मरता हो !

यूं सरेआम ऐलान करे !

फिर गुरदे’ वो नीलाम करे !

कि सत्ता की अब तो नज़र फिरे?

भई! दिन बरजण के आन पड़े !

 

3

जब सब तरियां की रोक हटे !

आयात बढ़े, निर्यात घटे !

सरकार फ़र्ज़ नै बेच हटे !

फिर जनता का ही गला़ कटे !

कर्ज़ बढ़े और नकदी खपे !

दिन-रात वो पूंजीवाद जपे !

यूं दुनिया में उसका रोब तपे !

भई!दिन भर बरजण के आन पड़े !

 

4

जब शेयर’ जम्प लगाते हों !

दस-बारह हजार पे जाते हों।

लिखते-ही-लिखते चढ़ जाते हों !

फिर सिर के बल गिर जाते हों !

छल़-पूंजी की जात दिखाते हों!

व्यौपारी भी फांसी खाते हों !

खुद बन्दे आग लगाते हों !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

 

5

जब सेहत, शिक्षा फिजूल बणे !

मिल-बैठ ना सोचें सारे जणे !

मैं तो देखूं तेरी ओड़ ने !

तूं देखे किसी और कणे’ !

अब सत्ता की टेढ़ी नजर तणे !

कि लोग मस्तगे बहुत घणे !

फिर पड़ें चाबने लौह-के चणे !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

 

6

जब बोतल में पानी बिकने लगे !

लूट की रोटी सिकने लगे !

जब खून शराब से सस्ता हो !

मज़दूर की हालत खस्ता हो !

(अ) नाज़ स्टोर में सड़ता हो !

और दर्द पेट में बढ़ता हो !

ना दवा लिए भी घटता हो !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

 

7

जब शिक्षक ठेके पे भरती हो !

सरकार ही ऐसा करती हो !

फिर शिक्षा का तो टील्ला हो?

ना युवकों का कोई हिल्ला हो !

न्यूं सारा ऊंट-मटील्ला हो !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

 

(2006 उत्तरार्ध)

————————

1. उड़ीसा के गांवों में किडनी बेचने की घटना।

1. शेयर बाजार। 

2. तरफ/ओर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *