गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार सत्यम वर्मा समेत गिरफ्तार छह अन्य लोगों को रिहा करे यूपी सरकार
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सत्यम वर्मा रिहाई मंच ने बुद्धिजीवियों कलाकारों से एकजुट होकर प्रतिरोध का किया आह्वान
नई दिल्ली। बुधवार 28 अप्रैल 2026 को ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ ने नई दिल्ली के प्रेस क्लब में वरिष्ठ पत्रकार, अनुवादक और जनबुद्धिजीवी सत्यम वर्मा तथा छह अन्य छात्र, कलाकार और सामाजिक ऐक्टिविस्ट्स आदित्य आनंद, रूपेश राय, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान की उप्र पुलिस द्वारा ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी के मुद्दे पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस को ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी, पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव, प्रलेस के सचिव विनीत तिवारी, जन मीडिया के सम्पादक अनिल चमड़िया, मानवाधिकारकर्मी हिमांशु कुमार और केशव आनन्द ने सम्बोधित किया।
प्रेस को जारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि प्रेस कान्फ्रेंस में कविता कृष्णपल्लवी ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ पत्रकार, बुध्दिजीवी, लेखक, दर्जनों विश्व क्लासिक्स के अनुवादक तथा भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज के सम्पादक सत्यम वर्मा को नोएडा मज़दूर आन्दोलन में हिंसा के मामले में फंसाकर सरासर ग़ैर क़ानूनी ढंग से गिरफ़्तार किया गया, जबकि उन्होंने नोएडा में कदम तक नहीं रखा था और नोएडा के मज़दूरों और ऐक्टिविस्टों से उनका कोई सम्पर्क तक नहीं था।
उन्होंने बताया कि दरअसल सत्यम वर्मा को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाकर पुलिस और प्रशासन एक महत्वपूर्ण आवाज़ को चुप कर देना चाहता है जो वर्तमान सत्ता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिया रखता है। सत्यम पर पुलिसिया शिकंजे का कारण यह है कि वह नियमित रूप से जनता की समस्याओं और मुद्दों पर लिखते रहते हैं, सरकार की नीतियों के मुखर आलोचक हैं, ‘जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान’, ‘अरविन्द मेमोरियल ट्रस्ट’ जैसी संस्थाओं से जुड़े हैं तथा ‘मज़दूर बिगुल’ में लेखन करते रहते हैं।
पुलिस नोएडा मज़दूर आन्दोलन में भड़की हिंसा से ‘मज़दूर बिगुल’ को और ‘मज़दूर बिगुल’ को इन संस्थाओं से जोड़कर सत्यम को “षडयंत्र का मास्टरमाइंड” साबित करना चाहती है और विरोध के उनके स्वर को चुप कर देना चाहती है।
कविता कृष्णपल्लवी ने विस्तार से बताया कि, किस तरह पुलिस ने सत्यम को 11अप्रैल से ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था जब उसने बिना किसी वारंट या नोटिस के जनचेतना पहुँचकर उनसे और कात्यायनी से लम्बी पूछताछ की। फिर 13 अप्रैल को सत्यम, कात्यायनी और संजय को थाने बुलाकर दिनभर बैठाये रखा गया । उसके बाद 17 अप्रैल को सिर्फ एक फ्लोर का सर्च वारंट होने के बावजूद समूचे जनचेतना परिसर की तथा कात्यायनी और सत्यम के पूरे आवास की तलाशी ली गयी।
आवास की तलाशी का कोई सर्च वारंट नहीं था। इन दोनों ही जगहों से पुलिस ने कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, किताबें, फ़ाइलें और डायरियाँ बिना कोई सीजर मेमो दिये ही ज़ब्त कर लीं। इस पूरी कार्रवाई के दौरान सत्यम और कात्यायनी को न तो ज़रूरी दवाएँ लेने दी गयीं न तो वकीलों से सम्पर्क करने दिया गया। उस दिन सत्यम को ग़ैरक़ानूनी ढंग से गिरफ़्तार करने के दो दिनों बाद नोएडा कोर्ट के समक्ष पेश किया गया। कविता कृष्णपल्लवी ने इस अंधेरगर्दी और अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े होने के लिए सभी जागरूक नागरिकों और बुध्दिजीवियों का आह्वान किया।
प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव विनीत तिवारी ने सत्यम की गिरफ़्तारी तथा मज़दूर अधिकारों का समर्थन करने वाली सभी प्रगतिशील आवाज़ों और ऐक्टिविस्टों के पुलिस द्वारा अपराधीकरण की निंदा की। उन्होंने इस्राइल द्वारा फ़िलिस्तीनी राजनीतिक बंदियों को फाँसी देने के क़ानून बनाने का हवाला देते हुए इस बात पर चिंता प्रकट की कि सत्तारूढ़ फ़ासिस्ट यहाँ भी उसी राह पर चलते हुए असहमति की आवाज़ों को कुचलने के लिए क़ानूनों और गिरफ़्तारियों का सहारा ले रहे हैं।
उन्होंने आह्वान किया कि सभी लेखकों, कवियों, कलाकारों और जागरूक नागरिकों को सत्यम और अन्य कार्यकर्ताओं तथा मज़दूरों की रिहाई के लिए आवाज़ उठानी होगी। सरकार मज़दूर आन्दोलन से भयाक्रांत हो गयी है और वह मेहनतकशों की बात सुनने के बजाय बेशर्मी से पूँजीपतियों की सेवा कर रही है। उन्होंने याद दिलाया कि दमन का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही पुराना प्रतिरोध का इतिहास भी है, इसलिए हमें प्रतिरोध जारी रखना होगा।
पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारियों की भर्त्सना करते हुए, बिना किसी सबूत के गिरफ़्तार किये गये सभी लोगों की अविलम्ब रिहाई की माँग की। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पीयूसीएल का एक प्रतिनिधिमण्डल जल्दी ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से मिलेगा। उन्होंने कहा कि पुलिस और प्रशासन फैक्ट्री मालिकों से साठगांठ करके सभी दिशा-निर्देशों और क़ानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन कर रहे हैं। वे डी. के. बोस गाइडलाइन्स और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का भी पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि पुलिस अभी तक यह नहीं बता रही है कि उसने वास्तव में कितने मज़दूरों को अवैध रूप से गिरफ़्तार करके रखा है।
प्रतिरोध मज़दूरों का अधिकार है और इसे किसी भी रूप में छीना नहीं जा सकता। पुलिस को जवाबदेह होना ही पड़ेगा। उन्होंने मुख्यधारा की मीडिया द्वारा ग़ैरक़ानूनी और अन्यायपूर्ण ढंग से गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं और बुध्दिजीवियों को अपराधी बनाकर पेश करने की प्रवृत्ति की भी भर्त्सना की और कहा कि इन ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारियों और सत्यम वर्मा जैसे बुध्दिजीवियों और छह अन्य ऐक्टिविस्टों के चरित्र-हनन के कुत्सित प्रयासों के विरुद्ध एक व्यापक जन-अभियान चलाने की ज़रूरत है।
मानवाधिकारकर्मी हिमांशु कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का उदाहरण दिया और कहा कि अगर भगतसिंह आज होते तो वह भी मज़दूरों के बीच होते। तमाम स्वाधीनता सेनानी मज़दूरों के बीच काम करना चाहते थे। लेकिन आज अगर वे ऐसा करते तो उन पर भी ‘नक्सल’ या ‘पाकिस्तानी’ होने का ठप्पा लगा दिया जाता। आज जो भी मज़दूरों के लिए, वंचितों के लिए आवाज़ उठाता है, उसे प्रताड़ित किया जाता है और तरह-तरह से बदनाम किया जाता है। लोग दस हजार की पगार पर जी नहीं सकते। यह सामूहिक हत्या के समान है। हिंसा पुलिस ने भड़कायी है और गोदी मीडिया मज़दूरों पर इस तरह तोहमत लगा रही है मानो कोर्ट ने उन्हें दोषी करार दे दिया हो।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि मज़दूर अपने जीने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, उनकी ज़िन्दगी के हालात उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर रहे हैं और वे इस तथ्य के बावजूद सड़कों पर उतरे हैं कि काले लेबर कोड्स ने यूनियन बनाने और आन्दोलन करने जैसी चीज़ों को लगभग असम्भव बना दिया है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मज़दूरों के साथ एकजुटता दिखलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर ‘मास्टरमाइंड’ और ‘साज़िशकर्ता’ जैसे लेबल चस्पाँ करके यह सरकार ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार जैसे ही रवैये का प्रदर्शन कर रही है। संसद की बहसों में मज़दूरों की कभी चर्चा तक नहीं आती। मज़दूर आन्दोलन को बदनाम करने और दबाने की साज़िशें हर सूरत में बंद होनी चाहिए। यह लोकतंत्र पर हमला है और इसका प्रतिकार करने के लिए पत्रकारों, कलाकारों और बुध्दिजीवियों को आगे आना ही होगा।
निहायत ग़ैरक़ानूनी ढंग से गिरफ़्तार और प्रताड़ित किये गये आदित्य आनंद के भाई केशव आनन्द ने विस्तार से बताया कि किसतरह अन्य सारे ऐक्टिविस्ट्स भी अवैध तरीके से गिरफ़्तार किये गये और पुलिस हिरासत में उन्हें यातनाएं भी दी गयीं। उन्होंने तमाम साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए बताया कि हिंसा भड़काने की सारी साज़िश पुलिस ने ही रची थी, व्हाट्सऐप ग्रुपों में भड़काऊ मेसेज पुलिस ने ही डलवाये थे और निहायत षड्यंत्रकारी ढंग से रूपेश और आदित्य आदि को मुख्य “साज़िशकर्ता” साबित करने की कोशिश की और फिर लखनऊ में बैठे सत्यम वर्मा को भी इस लपेटे में ले लिया गया।
उन्होंने बताया कि पुलिस जिन लोगों को ” षड्यंत्र का मास्टरमाइंड” बता रही है, उनके ख़िलाफ़ एक भी सबूत पेश कर पाने में विफल रही है, फिर भी गोदी मीडिया पुलिस के वर्ज़न के आधार पर सनसनीखेज कहानियाँ परोस रहा है और मज़दूर आन्दोलन के पक्ष में खड़े ऐक्टिविस्टों और बुध्दिजीवियों के विरुद्ध देशव्यापी दुष्प्रचार अभियान चला रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस का समापन करते हुए कविता कृष्णपल्लवी ने पत्रकारों, मीडियाकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों और नागरिकों का आह्वान किया कि उन्हें सच्चाई और न्याय के पक्ष में खड़ा होना होगा और आवाज़ उठानी होगी।
