भाई को बहन की हड्डियां लेकर क्यों आना पड़ा बैंक?

भाई को बहन की हड्डियां लेकर क्यों आना पड़ा बैंक?

कहां पहुंच गया है देश, संवेदनाएं समाज में गरीबी की विवशताओं पर कब का अहसास खो चुकी हैं !

उड़ीसा के क्योंझर से आई एक खबर फिर शर्मिंदा करती है और हमसे सवाल करती है कि आखिर हमारा सिस्टम किसके लिए काम करता है?

एक गरीब आदिवासी युवक जीतू मुंडा की बहन की दो महीने पहले मौत हो गई थी। उसकी बहन के खाते में ₹19,300 बचे थे — कोई बड़ी रकम नहीं, लेकिन उसके जैसे इंसान के लिए वही जीवन और मौत का फर्क हो सकती थी। वह बार-बार बैंक गया, हाथ जोड़े और कहा कि उसे उसकी मरहूम बहन के खाते के पैसे की सख्त जरूरत है। उसे एक ही जवाब मिला — “खाताधारक को खुद आकर साइन करना होगा।”

उसने हर बार सफाई दी कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी। कागज़ के काल्पनिक नियम इंसान की सच्चाई से बड़े हो गए। संवेदनाएं हमारे समाज में गरीबी की विवशताओं पर कब का अहसास खो चुकी हैं !

और फिर जो हुआ, वह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। मजबूरी में एक दिन वह अपनी बहन के कंकाल के अवशेष लेकर बैंक आ पहुंचा — सिर्फ यह साबित करने के लिए कि वह सच बोल रहा था।

जरा सोचिए, एक भाई को अपनी बहन की हड्डियां लेकर बैंक क्यों जाना पड़ा?

यह सिर्फ एक आदमी की कहानी नहीं है, यह उस संवेदनहीन सिस्टम का चेहरा है जो गरीब, आदिवासी और दलितों के साथ अक्सर ऐसा ही व्यवहार करता है। जहां ताकतवर लोगों के लिए नियम मोड़ दिए जाते हैं, फाइलें दौड़ने लगती हैं, वहीं गरीब के लिए वही नियम दीवार बन जाते हैं।

हम खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहकर गर्व करते हैं। लेकिन क्या इस “विकास” का कोई मतलब है, अगर एक गरीब को अपने हक के ₹19,000 पाने के लिए अपनी बहन की हड्डियां उठानी पड़ें?

यह घटना बताती है कि हमारे सिस्टम में इंसानियत से ज्यादा कागज़ की कीमत है, दर्द से ज्यादा प्रक्रिया की अहमियत है। गरीब की आवाज़ आज भी उतनी ही कमजोर है, जितनी पहले थी।

सवाल यह है — जीतू मुंडा की इस हालत का कोई कभी जिम्मेदार ठहराया जाएगा?
और उससे भी बड़ा सवाल — कितने और जीतू मुंडा हर रोज़ इसी तरह चुपचाप अपमान और पीड़ा झेल रहे हैं?

शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

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