पृथ्वी दिवस पर जागने के प्रयास
कुलभूषण उपमन्यु
इस वर्ष पृथ्वी दिवस का थीम है “हमारी शक्ति, हमारी पृथ्वी”. भारतीय परंपरा में पृथ्वी को बहुत आदर दिया गया है.अथर्व वेद में तो पूरा सूक्त है जिसमें पृथ्वी की स्तुति है और पृथ्वी द्वारा दी गई सेवाओं के लिए धन्यवाद ज्ञापन है. पृथ्वी सूक्त के बाहरवें श्लोक में ऋषि कहता है, “ हे धरती माता आपको नमन है, आपके केंद्र में नाभि है, जिसमें से जीवन शक्ति निकलती है, हमें उस शक्ति में अवशोषित और शुद्ध करें, हे धरती माता मैं आपका पुत्र हूँ, और वर्षा मेरे लिए पिता तुल्य है. वह हमें जल की शक्ति से परिपूर्ण करदे.”
पृथ्वी दिवस मनाने की शुरुआत 1969 में कैलिफोर्निया के तट पर तेल टैंकर से तेल के रिसाव के कारण जल जीवों के भारी विनाश के बाद हुई. सेनेटर गेलार्ड नेल्सन ने यह विनाश देखा जो समुद्र तल पर खनिज तेल के फैलने से हुआ था.
नेल्सन ने इस मुद्दे पर जागरूकता फ़ैलाने के लिए कालेजों में “टीच इन” कार्यक्रम शुरू किए. डेनिस हेस और अन्य आन्दोलन कारियों के साथ मिलकर इस जागरूकता अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर फ़ैलाने का निश्चय किया गया. जिसकी शुरुआत 22 अप्रैल, 1970 को राष्ट्रीय स्तर पर की गई.
इस दिन को पृथ्वी दिवस का नाम दिया गया. यानि पृथ्वी के स्वास्थ्य की चिंता करने का दिन. यह विचार धीरे धीरे अमेरिका में भारी जन दबाव का कारण बना और इसी के चलते शुद्ध जल और शुद्ध वायु कानून अमेरिका में पारित हुए. इस समय 192 देशों में यह दिवस मनाया जाता है और विकास की दिशा को पर्यावरण मित्र दिशा में मोड़ने की जरूरत पर ध्यान खींचने का प्रयास किया जाता है.
2000 के बाद से इसका मुख्य लक्ष जलवायु परिवर्तन बन गया. क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण जन जीवन को भारी कठिनाइयों का सामना करने की स्थितियां बन गई हैं. पूरी दुनियां में इसके चलते प्राकृतिक आपदाओं में भारी वृद्धि हो रही है और यह स्थिति दिन ब दिन खराब होती जा रही है.
अति वृष्टि, अनावृष्टि, समुद्री तूफ़ान की दर और तीव्रता में वृद्धि, असामयिक बर्फबारी, ग्लेशियर पिघलना आदि अनेक चुनौतियां विश्व स्तर पर पेश हो रही हैं. पृथ्वी के स्वास्थ्य में पेश हो रही चुनौतियों के कारणों की ओर ध्यान खींचने की दृष्टि से हर वर्ष अलग अलग विषय चुने जाते हैं.
2024 में प्लास्टिक प्रदूषण विषय चुना गया था. इस वर्ष “हमारी शक्ति, हमारी पृथ्वी” विषय है. सच में पृथ्वी की जीवनी शक्ति के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं हो सकता. हालांकि जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए घातक अन्य गतिविधियों को वैज्ञानिक विकास से चिन्हित कर लिया गया है किन्तु हमारी जीवन शैली ऐसी बन गई है कि हर कदम पर पृथ्वी के स्वास्थ्य पर आघात होता जा रहा है.
सबसे ज्यादा समस्या उर्जा की अत्यधिक मांग जो लगातार बढती ही जा रही है, से पैदा हो रही है क्योंकि उर्जा उत्पादन के लिए प्रयुक्त तकनीक मुख्यता खनिज तेल, कोयला जैसे संसाधनों पर आधारित है. जिससे निकलने वाले धुंए से वायु मंडल में ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा होता है और वायु मंडल का तापमान बढ़ता जा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संगठन द्वारा 2030 तक औद्योगिक क्रांति के बाद से वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेंटीग्रेड के भीतर रोकने का संकल्प ले कर इस दिशा में कई वैश्विक समझौते किए गए हैं. ताकि तापमान वृद्धि के लिए जिम्मेदार उर्जा उत्पादन में होने वाले ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण किया जा सके.
बाध्यकारी नियमों में ढील देकर पेरिस समझौते द्वारा स्वयं घोषित लक्ष्य घोषित करके उनकी प्राप्ति के प्रयास किए जा रहे हैं किन्तु बड़े प्रदूषण कारक अमेरिका जैसे देशों ने इस समझौते से किनारा कर लिया है. इससे प्रतीत होता है कि इस खतरे के प्रति गंभीरता कितनी उथली है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पास भी कोई बाध्यकारी शक्ति न होने के चलते ये अच्छे प्रयास सफल होने में संदिग्ध हो जाते हैं. भयानक युद्ध भी हानिकारक गैस उत्सर्जन का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं. इस परिस्थिति से उबरने के लिए उर्जा उत्पादन और अन्य उत्पादन के तरीकों को पर्यावरण मित्र बनाना, विकल्पों की तलाश और यथा संभव सादगी को अपनाना ही हो सकता है. अनावश्यक उपभोग से बचा जा सकता है.
“यूज़ एंड थ्रो” उत्पादन संस्कृति से बाहर निकलना भी जरूरी है. इससे संसाधनों पर भारी दबाव तो पड़ता ही है, अनावश्यक उर्जा की खपत भी बढ़ती है. ऐसे उत्पाद बनाने पर ध्यान देना होगा जिनकी मरम्मत करके लंबे समय तक प्रयोग किया जा सके. उर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक स्वच्छ उर्जा की ओर मुड़ना होगा. दुनियां भर में हो रहे प्रयास आशा की किरण तो हैं किन्तु नाकाफी हैं.
प्लास्टिक एक जरूरी बुराई बन चुका है. इसे छोड़ भी नहीं सकते और बिना छोड़े पृथ्वी के ऊपर पड़ने वाले इसके घातक प्रभावों से बच भी नहीं सकते. पैकिंग सामग्री के विकल्प तलाश कर प्लास्टिक उपयोग को कुछ कम तो किया ही जा सकता है. प्लास्टिक से बचाव इसी में है कि इसके प्रयोग की मात्रा कम की जाए, पुन:चक्रिकरण की सख्त व्यवस्था हो और जैविक रूप से सड़ने योग्य जैविक संसाधनों से प्लास्टिक बनाने की प्रक्रियाओं और शोध को गंभीरता पूर्वक बढ़ाया जाए.
बाजारों से सामान लाने के लिए कपड़े के थैलों का प्रयोग करके सिंगल यूस प्लास्टिक की मांग कम की जा सकती है. हमारे देश में कुल विद्युत् उत्पादन 524 गीगा वाट है. जिसमें से 71% अभी भी कोयले और जीवाश्म इंधन से होता है. भारत वर्ष ने 2030 तक 500 गीगा वाट स्वच्छ उर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है.
आशा की जानी चाहिए कि हम इसे हासिल कर सकेंगे. जो स्वयं पृथ्वी की रक्षा के लक्ष्यों को पूरा कर लेगा वही दुनियां के अन्य देशों को भी इस दिशा में प्रगति करने के लिए जोर डाल कर कह सकेगा. पृथ्वी दिवस के अवसर पर पुन: पृथ्वी के प्रति भारतीय परंपरागत मातरि दृष्टि की स्थापना करके एक सशक्त पहल की जासकती है.
लेखक पर्यावरण विद हैं।
