कविता
भंवर जाल में फंसीं औरतें
अनुपम शर्मा
भंवर जाल में फंसी औरतें
कशमकश में बंधी औरतें
कुछ कर गुजरने की चाह थी
पर बंधनों में बांधी गईं औरतें
स्वच्छंद उड़ने की चाह थी
पर लालची आंखों से डरीं औरतें
कलम चलाने की चाह थी
पर दो पाटन में पाटी गईं औरतें
साहित्य पढ़ने की चाह थी
भटियार खाने में झोंकी गईं औरतें
आसमान छूने की चाह थी
पर परम्पराओं में जकड़ी गईं औरतें
नारी सशक्तिकरण के नारों में थी
पर सिर्फ विज्ञापनों में छपी औरतें।
आधुनिकता की अंधी दौड़ में
कब तक जाएंगी ठगी औरतें।
सोचो, समझो फिर विचार करो
कब तक रहोगी तुम ,
भंवर में फंसीं औरतें।
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