हरियाणा : जूझते जुझारू लोग 114
लम्बी और सहज दौड़ – जयकिशन अत्रि
सत्यपाल सिवाच
जिला कैथल के गाँव करोड़ा में श्रीमती शान्ति देवी और श्री फग्गू राम के घर 4 जून 1952 को बेटे ने जन्म लिया। नाम दिया गया – जयकिशन यानी श्री कृष्ण की जय हो। साधारण किसान परिवार था। माता-पिता ने खेती और पशुपालन के जरिए पाँच बेटों और दो बेटियों को बड़ा किया।
जयकिशन ने पोस्टग्रेजुएशन तक शिक्षा प्राप्त की। मधुर भाषी और सहज स्वभाव के जयकिशन अत्री अपने बचपन के मित्रों, सहपाठियों और नौकरी में आने के बाद सहकर्मियों के प्रिय बन गए। वे रिश्तों को बनाने और निभाने में विश्वास करते हैं। वे 16 अक्तूबर 1981 को लोक निर्माण विभाग भवन एवं सड़क शाखा में एस.डी.सी. नियुक्त हुए और 30 जून 2010 को एस. ए. सी. पद से सेवानिवृत्त हुए।
नौकरी में आने के बाद वे हरियाणा लोक निर्माण विभाग फील्ड मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन में सक्रिय हो गए थे। सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद वे कर्मचारियों के सामूहिक आन्दोलन का हिस्सा बने। वे शुरू से ही जागरूक और न्यायप्रिय व्यक्ति रहे। इसीलिए भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ लड़ाई में भाग लेने लगे। सन् 1986-87 के संघर्ष में उन्हें चार्जशीट किया गया था। वे फूलसिंह श्योकन्द और बनवारीलाल बिश्नोई के भूखहड़ताल के संकल्प से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। इसलिए बेझिझक लड़ाई में डटे रहे।
जयकिशन अत्रि 1987-94 अपने विभाग की एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष रहे। सन् 1990-92 में कैथल में सर्व कर्मचारी संघ के जिला कोषाध्यक्ष का कार्यभार संभाला। 1992-93 में फिर अपनी यूनियन के जिला प्रधान बने। सन् 1994 में उन्हें राज्य स्तर पर उपाध्यक्ष चुना गया और 1996-98 तक राज्य में वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। उन्हें वर्ष 1997 में सर्वकर्मचारी संघ जिला कुरुक्षेत्र का अध्यक्ष बनाया गया और 2009 तक इस पद पर रहे। 2007-09 वे विभागीय यूनियन में कुरुक्षेत्र जिले के अध्यक्ष के साथ राज्य में 1999-2010 में उपाध्यक्ष रहे। उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद 2011-25 मुख्य सलाहकार रखा गया है।
संघर्षों में निरंतर भागीदारी के साथ-साथ उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, मैस वर्करज और एन.आई.टी. को संगठित करने में योगदान दिया। अब वे रिटायर्ड कर्मचारियों के बीच भी काम करते हैं। जयकिशन अत्रि का सौम्य व्यवहार और सबको साथ लेकर चलने का गुण ऐसा है कि वे आसानी से सहयोग प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने कभी किसी अधिकारी या राजनेता के साथ रिश्ते जोड़ने की चेष्टा नहीं की। उन्हें लगता है कि पहले आर्थिक लाभ मिलने की इच्छा से लड़ाई को समर्थन अधिक मिल जाता था। अब नौकरी को बचाने का मुद्दा प्रमुख है। इसलिए बड़ा हिस्सा लड़ाई में आने से कतराता है।
जयकिशन का विवाह सन् 1974 में श्रीमती श्यामा देवी से हुआ। उनके दो बच्चे हैं। बेटा ज्योतिषी है और बेटी साहित्यकार है। वह कविताएं लिखती हैं। फिलहाल इनका परिवार कैथल शहर के आदर्श नगर में रहता है। सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक- सत्यपाल सिवाच
