कविता
नेता, पुलिस और जेल का खेल
ओमसिंह अशफ़ाक
नेता-पुलिस का बेढब मेल,
बेढब मेल..!
जेल के अंदर ठेलम-ठेल..!
नेताजी तो होल-सेलर था,
पट्ठों का था—काम रिटेल…!
काम रिटेल….!
एक खा गया राशन का डिपो,
एक पी गया मिट्टी का तेल,
मिट्टी का तेल!
फत्ता अकेला क्या कर लेता,
थाने पहुंचा अर्जी गेल…!
अर्जी गेल….!
नेताजी तो आगे ही बैठ्या था-
फत्ते को दिया परे धकेल…!
परे धकेल…!
थानेदार तै वो नेता बोला-
मेरी सुनके डाल ले कान में तेल…!
कान में तेल…!
पट्ठों को मेरे कुछ मत कहिए-
फत्ते को तू डाल नकेल…!
डाल नकेल….!
फत्ते को तो अंदर ठोका,
मुलजिमान की ले ली बेल…!
ले ली बेल….!
न्यायाधीश भी चक्कर खा गया,
लिखी नागरी पढ़ी बरेल…!
पढ़ी बरेल…..!
‘अगली पेशी पर देखेंगे,
स्टेटस-को में भेजो जेल’…!
‘भेजो जेल’…..!
फत्ता तो ये पूछता रह गया, के
संविधान भी—हो गया फेल….?
हो गया फेल…?
‘अगली पेशी तक तू टिकजा,
तेरा पैरोकार भी जा गा जेल’…!
जा गा जेल…!
नेता-पुलिस का बेढब मेल,
बेढब मेल…!
जेल के अंदर ठेलम-ठेल!
(2006 में किसी समय)
