सुनीता – छात्र जीवन से पकड़ ली थी संघर्षों की राह

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-124

सुनीता – छात्र जीवन से पकड़ ली थी संघर्षों की राह

सत्यपाल सिवाच

कर्मचारी आन्दोलन के बड़े किरदार और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय नॉन-टीचिंग इम्प्लाइज एसोसिएशन के पूर्व महासचिव भीमसिंह सैनी और जनवादी महिला समिति कुरुक्षेत्र की पूर्व जिला अध्यक्ष श्रीमती कमलेश रानी की बेटी सुश्री सुनीता ने कर्मचारी आन्दोलन में एक समर्पित और समझदार कार्यकर्ता की पहचान बनाई। सुनीता का जन्म दिनांक 05 जुलाई 1965 को पटियाला पंजाब में हुआ था। तीन बहन और दो भाइयों में वे सबसे बड़ी हैं। पिता जी की नौकरी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में रहते उनका परिवार निकट ही शान्तिनगर में रहता था। सुनीता ने बी.ए. बीएड, इतिहास में एम.ए., एम.फिल. और डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन उपाधियां हासिल कीं।
वे 03.02.1994 को शिक्षा विभाग में तदर्थ आधार पर एस. एस. मिस्ट्रेस नियुक्त हुई। संगठन के संघर्षों के चलते दिनांक 01.10.2003 से उनकी सेवाएं नियमित हुईं तथा 31.07.2023 को इतिहास विषय के प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त हुईं। सरकारी सेवा में आने से पहले उन्होंने तीन वर्ष (1991-93) तक प्राइवेट स्कूल में सेवाएं दी। वे एक संवेदनशील इन्सान और प्रबुद्ध शिक्षक होने के नाते अपने छात्रों व अभिभावकों में लोकप्रिय रहीं। उनकी पहली नियुक्ति राजकीय उच्च विद्यालय चमरोड़ी में हुई थी। मैं भी उन दिनों वहाँ हिन्दी अध्यापक था। वे बहुत लगन व परिश्रम से अपना काम करती थी।
संगठन और संघर्षों का परिवेश तो उन्हें स्वाभाविक रूप से घर पर ही उपलब्ध हो गया था। वे विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए 1980 से 1986 एस.एफ आई. में रहीं। उन्हें जिला संयोजक व राज्य कमेटी सदस्य बनाया गया था। जब कुरुक्षेत्र में जनवादी महिला समिति का गठन हुआ तो सुनीता अपनी माँ के वहाँ पर योगदान देने लगीं और 1985 से 2013 तक महिला समिति में रहीं। वे रादौर ब्लॉक में सचिव व जिला कमेटी में उपप्रधान रहीं। सरकारी नौकरी में आते ही सेवानिवृत्त होने तक हरियाणा राजकीय/विद्यालय अध्यापक संघ में सक्रिय रहीं तथा 2007-13 तक यमुनानगर जिले में वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहीं। सेवानिवृत्ति के बाद रिटायर्ड कर्मचारी संघ की सदस्य हैं।
वे संगठन में सक्रिय होने के कारणों और अनुभवों को साझा करते हुए बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही गलत बातों और अन्याय के खिलाफ लड़़ना सिखाया गया था। वे लड़कियों को आगे लाने और नेतृत्वकारी भूमिका संभालने की हिमायती रही हैं। वास्तव में संघर्ष हमारे जीवन का हिस्सा हैं। इनके जरिए व्यक्तित्व का विकास भी होता है। संगठन परिवार को भी ताकत देता है। पहले अपने पिता से और विवाह के उपरांत अपने जीवन साथी एम.पी. सिंह से संगठन में बने रहने के लिए प्रेरणा मिली।
वे नौकरी में आने के बाद हुए सभी संघर्षों, धरने, प्रदर्शन, रैली, हड़ताल आदि में शामिल रहीं। उन्हें प्रत्यक्ष रूप से सीधे उत्पीड़न तो नहीं झेलना पड़ा, लेकिन जब पुलिस पिताजी या एम.पी. सिंह की गिरफ्तारी के लिए दबिश देती तो मानसिक उत्पीड़न होता था। बाद में यूनियन में सक्रिय होने के बाद यह सामान्य सा लगने लगा। सुनीता इस बात सन्तुष्ट हैं कि संगठन में आने पर स्वयं सुरक्षा का भाव जन्म लेता है। वे सर्वकर्मचारी संघ द्वारा कामकाजी महिलाओं के लिए अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश, छह माह के प्रसूति अवकाश तथा चाइल्ड केयर लीव तथा स्थानांतरण में वरीयता का श्रेय सर्वकर्मचारी संघ के संघर्षों को देती हैं। ऐसा करने से संघर्षों में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है।
वे इस बात से बेहद खुश और संतुष्ट हैं कि संघर्षों के दौरान परिवार ने पूरी मजबूती से साथ दिया। पिता, पति, बेटा और पुत्रवधू सभी एकमत से इस लाइन के समर्थक रहे हैं। वे कभी किसी राजनेता अथवा उच्च अधिकारियों के संपर्क में नहीं आई। दरअसल यह उनकी और परिवार की फितरत में ही नहीं था। कभी निजी कार्य के लिए अतिरिक्त जुगाड़ करने की कोशिश नहीं की। कभी जरूरत आई तो यूनियन के साथियों ने उसे हल करवाने में मदद की। उनके घर के भीतर लोकतांत्रिक और आपसी विमर्श का माहौल रहा है। इसलिए गलतियों से बचने की ट्रेनिंग अपने आप हो जाती है। उन्हें किसी ऐसे कार्य का ध्यान नहीं है जिसके उन्हें बाद पछताना पड़ा हो।
मैं उन्हें सन् 1980 से जानता हूँ। मेरी पहली नियुक्ति कुरुक्षेत्र में हुई तो विश्वविद्यालय के छात्रों, कर्मचारियों और शिक्षकों के साथ संगठन के परिचय हो गया था। सुनीता के पिता जी श्री भीमसिंह सैनी मेरे उसी दौर के मित्रों में हैं। सुनीता और एम.पी.सिंह के साथ विवाह मेरे सुझाव पर ही हुआ। वे बेटी और दामाद की तरह हमारे परिवार से जुड़े रहे। उन्होंने अपने परिवार से संयत, गरिमामय और संवेदनशील व्यवहार सीखा है।
वे संगठन की सुदृढ़ता के चिंता प्रकट करते हुए कहती हैं कि ठीक का साथ और गलत का विरोध करें; सोशल मीडिया के साथ साथ निजी संपर्क को प्रमुखता दें; अपने को अपडेट रखने के लिए स्वाध्याय करें और कथनी और करनी का फर्क न रखें। उन्हें लगता है कि पहले समय पर संगठन की हस्तक्षेप करने की ताकत अधिक थी और लंबित कामों को हल करवाने के प्रभाव से कर्मचारियों का भरोसा जमता था। अब भले ही सदस्यता बढ़ी है लेकिन हस्तक्षेप की ताकत घटी है। कार्यकर्ताओं को ठोस अनुभव से सबक लेना चाहिए।
● व्यक्तिगत रूप से न्याय, कुशलता व दृष्टि का विकास करें ताकि लोग प्रभावित होकर संगठन में आए।
●अपने संगठन की वोअच्छी बाते बताई जाये जो दूसरे संगठनों में नहीं है। दूसरे की आलोचना करने में अपना समय न लगाएँ।
●अपने व्यक्तिगत जीवन में शास्त्रीय नृत्य की तरह, प्रश्नात्मक व उत्तर जैसी विधा, भाषण कौशल की कला को सीखने में शामिल करना चाहिए।
फिलहाल सुनीता का परिवार 220/12, शास्त्री कॉलोनी, रादौर, जिला यमुनानगर में रहता है। उनका विवाह 25 सितम्बर 1987 को जगाधरी निवासी एम.पी. सिंह के साथ बहुत सादगी और बिना दहेज के हुआ था। सुनीता के जीवन साथी एम.पी. सिंह बहुत ही उम्दा शख्स थे। दुर्भाग्य से सड़क दुर्घटना ने उन्हें छीन लिया। उनके असमय जाने के बाद सुनीता ने जिस तरह परिवार को संभाला यह उल्लेखनीय है परिवार में एक बेटा मोहित सिंह है जो एम.कॉम. बीएड तथा सी.ए. (ड्रॉप आऊट) है और अपना ऑनलाइन काम कर रहा है। पुत्रवधू सरिता बीबीए, बीएड, एम एस सी (कम्प्यूटर साईंस) है और को-ऑपरेटिव सोसायटी यमुनानगर में सब-इंस्पेक्टर है। दस वर्षीय पोती ऐरा सिंह पाँचवीं कक्षा में पढ़ती है और पोता अविराज सिंह अढ़ाई वर्ष का है।

 

लेखक- सत्यपाल सिवाच

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