हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 98
प्रबुद्ध, प्रगतिशील और संघर्षशील – रमेश कुमार जाखड़
सत्यपाल सिवाच
दादरी जिले के बिगोवा गांव में सुश्री ब्रह्मा देवी और श्री रत्न सिंह के घर 1 जनवरी 1964 को जन्मे रमेश कुमार ऐसे शख्स हैं जिन्हें सही मायने में मिशनरी कहा जा सकता है। उन्हें अपने माता- पिता से संस्कार व सद्गुण हासिल किए। माता जी अनपढ़ होते हुए भी वैज्ञानिक मानसिकता की पक्षधर थीं। यद्यपि उन्हें भगवान में गहरा विश्वास था और आध्यात्मिक विचारों की धनी होने के कारण प्राणी मात्र से प्रेम करती थी। उनके पिता श्री रत्नसिंह मेहनती किसान थे। कक्षा तीन तक पढ़े थे और जब नौ साल के थे तभी रमेश के दादा जी का देहांत हो गया था। इसके चलते उनके पिता जी का जीवन गरीबी और संघर्ष में बीता था। इनके चाचा जगमालसिंह आर्यसमाजी, पहलवान तथा हिंदी सत्याग्रह आंदोलन के सबसे छोटी आयु के सत्याग्रही थे। वे चार भाई तथा दो बहन हैं। कक्षा एक से आठवीं तक गांव के मिडिल स्कूल में और मैट्रिक राजकीय उच्च विद्यालय माजरा (दूबलधन) से उत्तीर्ण की। उसके बाद राजकीय महाविद्यालय दूबलधन से ग्रेजुएशन, की गणपतराय रासिवासिया एजूकेशन महाविद्यालय चरखी दादरी से शिक्षा स्नातक और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से गणित विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन उत्तीर्ण की।
9 फरवरी 1995 को राउवि ढाब ढाणी में गणित अध्यापक नियुक्त हो गए और 30 अप्रैल 2022 को गणित प्रवक्ता पद से रावमावि डावला से सेवानिवृत्त हुए। वे अपने विषय के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ बहुत समर्पित व रचनाधर्मी अध्यापक रहे। सभी परीक्षा परिणाम अच्छे रहे। दो को छोड़कर सभी एसीआर में ए या ए + ग्रेड रहा। दसवीं में नौ बच्चे जिनके शत-प्रतिशत तथा आठवीं में सत्ताईस बच्चे शत-प्रतिशत। 57 बच्चों ने एन एम एम एस छात्रवृत्ति प्राप्त की, जो चार वर्षों के लिए होती है यानी नौंवी से बारहवीं। पहले पांच सौ रूपये मासिक थे, बाद में हजार रुपये मासिक हो गई।
गणित माडल प्रतियोगिता में एक बार राज्य भर में प्रथम स्थान, एक बार द्वितीय स्थान तथा जिला स्तर पर ग्यारह बार प्रथम रहे। रमेश जाखड़ शिक्षक के रूप में पूर्णतया मिशनरी मोड और समर्पण भाव से काम करने के लिए जाने जाते हैं।
रमेश जाखड़ को यूनियन से जोड़ने का काम मोती राम कलकल ने किया। रमेश इस बात से सतर्क रहते हुए संगठन में इस सोच के साथ सक्रिय रहे कि कहीं कोई मोती राम पर अंगुली न उठा दे कि आपने अच्छे शिक्षक को नहीं जोड़ा। सांगठनिक विचारधारा में सबसे ज्यादा सत्यपाल सिवाच के विचारों से प्रभावित रहे।
शिक्षक को सही शिक्षक बनाने का मंच हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति है। वहां लगभग सभी सम्मानित हैं लेकिन डा प्रमोद गौरी, डॉक्टर आर.एस. दहिया, डॉक्टर महावीर नारवाल तथा वेदप्रिय को विशेष रूप से याद करते हैं।
एडहॉक यूनियन में जिले का वरिष्ठ उपप्रधान बल्कि एडहोक यूनियन के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ में खंड के हर पद पर तो जिला में आडिटर तथा प्रधान पद पर काम का अवसर मिला। राज्य में शिक्षा कोर कमेटी का सदस्य तो रहे और शैक्षिक स्थितियों को मौलिक नजर से देखते रहे हैं। जो भी काम सौंपा गया उसे तन्मयता से पूरा करने का प्रयास किया। सर्व कर्मचारी संघ में जिला सहसचिव, किसान सभा में जिला स्तर पर काम किया। रिटायर्ड कर्मचारी संघ में झज्जर खंड का प्रधान रहे।
वे औपचारिक पुरस्कार के पीछे नहीं भागते थे। एक बार गलती से राज्य शिक्षक पुरस्कार के लिए एप्लाई कर दिया। तीन सितंबर को हड़ताल के लिए स्कूलों में घूम रहे थे, जिस खंड शिक्षा अधिकारी ने एप्लाई के लिए तैयार किया था का फोन आया कि हड़ताल मत भरना, आपके अवार्ड में दिक्कत हो सकती है, वह पल बहुत ही खुशी का था। मैं ऊण स्कूल में था, रमेश जी ने स्पीकर ऑन करके कहा – “श्रीमान जी मैं इनको हड़ताल की कह रहा हूं और मैं अस्थाई सुख के लिए स्थाई सुख को कैसे छोड़ूं?” आपका धन्यवाद कि आपके कारण आज यह बात कह पाया। व्यक्तिगत रूप से अच्छा यह हुआ कि उस वर्ष किसी को भी सरकार ने अवार्ड दिया ही नहीं।
परिवार का सहयोग अपने आप अच्छा था क्योंकि इन्होंने कभी भी अपने घर परिवार में कोई विशेष योगदान नहीं दिया। नौकरी के दौरान नवंबर से फरवरी तक एक्स्ट्रा पीरियड लिए और क्षतिपूर्ति की। संगठन में आने के बाद तो कभी भी कक्षा दसवीं की ग्रीष्मकालीन अवकाश पंद्रह जून से पहले नहीं किए। वे अपने गांव में तो सुबह पांच बजे बच्चों को खेलने के लिए बुला लेते थे। शाम को ढाई बजे छुट्टी के एक घंटा बाद यानी साढ़े तीन बजे से शाम छः बजे तक अतिरिक्त कक्षाएं एवं खेल चलता। गांव में पुस्तकालय चलाया जिसका समय शाम सवा छह बजे से रात नौ बजे तक रहता।
वे मौलिक रूप से आदर्शवादी हैं। संगठन में रहते हुए नेताओं के संपर्क में आना तो दूर की बात, उनसे बात करना भी अच्छा नहीं लगता था। खंड प्रधान होते हुए उनका नाम एसडीएम से सम्मानित करने के लिए बीईओ ने भेजने की तैयारी कर रखी थी, वे कार्यालय में गए और तुरंत अपना नाम हटवा कर खंड के दूसरे मेहनती शिक्षक का नाम लिखवाया। अधिकारियों ने मान सम्मान दिया, इन्होंने भी उन्हें मान सम्मान दिया। कभी भी व्यक्तिगत काम बारे में नहीं कहा। शिक्षक साथियों के जायज काम खूब मन लगाकर किए।यह संयोग ही रहा कि जिस जिस स्कूल में सेवाएं दी,वे सभी स्कूल अपग्रेड हुए। वे स्कूल या तो वरिष्ठ माध्यमिक बने या स्कूल को क्लस्टर के रूप में चुना गया।
वर्तमान के लिए संदेश – अपने मूल काम में अपना सौ फीसदी देते हुए सार्वजनिक क्षेत्रों के बचाव के लिए भी सौ प्रतिशत देना। वैज्ञानिक मानसिकता के साथ व्यापक भाईचारा कायम रखना एवं बढ़ाना। कार्यसंस्कृति पैदा होते ही, संघर्ष की प्रवृत्ति बढ़ जायेगी।
सन् 1985 में सुश्री अनीता देवी के साथ विवाह हुआ। इनके दो लड़के हैं। बड़ा बेटा अश्विनी कुमार बी.टेक. करके प्राइवेट कंपनी में गुड़गांव में है और छोटा बेटा लोकेश कुमार एक छोटी सी परचून की दुकान झज्जर में चलाता है। बड़ी पुत्रवधू सरकारी स्कूल में कच्ची भर्ती में कम्प्यूटर टीचर हैं। छोटी पुत्रवधू जीएनएम का कोर्स कर निजी हस्पताल में नर्स हैं। दो पोते और दो पोतियां हैं। फिलहाल परिवार झज्जर में रहता है।
अब कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए हैं। उन्हें लगता है कि राजनैतिक दल कभी भी जनसंगठनों से बेहतर नहीं हो सकते। वे सकारात्मक बदलाव के हिमायती हैं। वर्तमान परिदृश्य में भी नयी राह की तलाश में हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
