गुमनाम किसान नायिकाएँ: एक समीक्षा
डॉ. रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक,
पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज,
करनाल (हरियाणा, इंडिया).
**(8 मार्च2026 को महिला दिवस के अवसर पर कृषक महिलाएं व कृषकश्रमिक महिलाएं प्रिंट मीडियाऔर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सेअदृश्य रही है.इस लेख में प्रस्तुत है कृषक महिलाओंऔर कृषक श्रमिक महिलाओं की विभिन्न मुख्य किसान आंदोलन में भूमिका.)
संक्षिप्त:
भारतीय समाज में यह अवधारणा है कि भारत में महिलाएं केवल घर की चार दिवारी तक सीमित रही है .परंतु ऐतिहासिक साक्ष्य व शोध इसका खंड़न करते हैं. आधुनिक पुरातात्विकऔर एवं नृवंश विज्ञानसंबंधी साक्ष्यों के अनुसार महिलाओं की भूमिका कृषि और शिकार दोनों कार्य करने की रही है. ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात को भी सिद्ध करते हैं कि कृषि की उत्पत्ति का पथ प्रदर्शक महिलाएं रही हैं. यही कारण है कि इतिहासकारों के अनुसार पुरूषों की अपेक्षा प्रथम किसान महिलाएं हैं ,आदिकाल में मुख्य कार्य-कृषि करना,पशुपालन करनाऔरजनजाति समुदाय के लिए भोजन तैयार करने में महिलाओं की भूमिका लगभग 80 प्रतिशत रही है.
परिवर्तन एक वैश्विक नियम:
परिवर्तन एक वैश्विक नियम है. आखेट से कृषि की तरफ़ बदलाव के साथ खानाबदोश समुदायों की भूमिकाएँ स्थिर जीवन शैली की बदलने लगी.परिणामस्वरूप महिलाओं की भूमिकाओं भी बदलाव हने लगा ,यद्यपि वे शुरू में किसान थीं, लेकिन हल जैसी ज़्यादा मेहनत वाली टेक्नोलॉजी आने के बाद, पुरुषों ने अक्सर बड़े पैमाने पर खेती संभाल ली, जबकि महिलाएँ फसलों का प्रबंधन करने , काटने और प्रसंस्करण करने केसाथ – साथ घर के काम करने व जानवरों की देखभाल भी करती थीं.
सन् 2017 के शोध के अनुसार नियोलिथिक, ब्रॉन्ज़ और आयरन एज की पुराने ज़माने की हड्डियों की जांच (बोन डेंसिटी) से पता चलता है कि लगातार, बारम्बार और मुश्किल हाथ का काम महिलाओं की ज़िंदगी का एक निरन्तर हिस्सा था. यह शोध इस इस बात को सिद्ध करती है कि पुरुषों के शरीर के ऊपरी हिस्से की हड्डियों की मज़बूती में काफ़ी कम थी क्योंकि पुराने ज़माने के पुरुष ज़्यादातर निचले शरीर के काम करते थे, जैसे दौड़ना और शिकार करना—–और पौधे लगाना, जुताई करना और खेती के बाकी अन्य सभी काम महिलाओं पर छोड़ देते थे. परिणामस्वरूप महिलाओं ने बिना थकावट दृढ़ निश्चय के साथ प्रयास जारी रखे और कृषि में प्रथम क्रांति की नींव रखी.
पाषाण काल और नव पाषाण काल (8000-4000 ईसा पूर्व) के दौरान फसलों (गेहूं, जौ) और पशुओं (भेड़, बकरी) की महत्वपूर्ण खेती और पालतूकरण में तेजी आई. इसके प्रारंभिक प्रमाण उत्तर-पश्चिम (मेहरगढ़, अब पाकिस्तान) और गंगा के मैदान में मिलते हैं, जबकि सिंधु घाटी में 4500 ईसा पूर्व तक उन्नत सिंचाई प्रणाली विकसित हो चुकी थी.
तीन मुख्य भूमिकाएँ:
इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता कि केवल खानाबदोश समुदाय के काल में ही नहीं अपितु वैदिक, उत्तर-वैदिक, बौद्ध और जैन काल में भीआम महिलाओं के अपने परिवारों में तीन आवश्यक कार्य-घरेलू कार्य , पशुपालन कार्य और कृषि कार्य करके अहम भूमिकाएँ निभाई हैं.ग्रामीण महिलाएँ आज भी ये तीनों भूमिकाएँ निभा रहीं हैं. अत:महिलाएं सदियों से खेती-बाड़ी के कार्यों में अग्रणीय हैं.
विस्तार:
विश्व में लगभग 900 मिलियन महिलाएं कृषि में काम करती हैं. लेकिन, 90 से ज़्यादा देशों में महिलाओं को ज़मीन का मालिकाना हक नहीं है. विश्व में , महिलाओं के पास खेती लायक ज़मीन का 20% से भी कम हिस्सा है. कुछ अनुमानों के मुताबिक सिर्फ़ 10% महिलाओं के पास ही ज़मीन है.पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे सन् 2019-20 के मुताबिक, भारत की 75.7% ग्रामीण महिलाएँ खेती के काम में हिस्सा लेती हैं, फिर भी खेती करने वाले समुदायों में सिर्फ़ 13.87% महिलाओं के पास ज़मीन पर कानूनी अधिकार हैं.खेती न करने वाले समुदायों में स्थिति और भी खराब है, जहाँ सिर्फ़ 2% महिलाओं के पास ज़मीन का कानूनी मालिकाना हक है. इसका मतलब है कि खेती करने वाले समुदायों में लगभग 86% और खेती न करने वाले समुदायों में 98% महिलाओं के पास ज़मीन से जुड़ी कोई प्रॉपर्टी नहीं है.
किसान महिलाएँ व कृषि श्रमिक महिलाएँ किसानआंदोलनों में क्यों भाग लेती हैं?
यह एक यक्ष प्रश्न है कि महिलाएं के पास कृषि योग्य जमीन लगभग नग्णय है और कृषि कार्यों में संल्गन होने बावजूद भी अदृश्य हैं उसके बावजूद भी किसान आन्दोलोनो महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वास्तव में कृषि प्रत्येक देश कीजीवन रेखा हैऔर महिला किसान कोईअपवाद नहीं हैं.कृषि के उत्पादों पर ही उनका पारिवारिक,सामाजिक व आर्थिक जीवन निर्भर करता है.सरकारों की नीतियों ,नियमों व कानूनों का सर्वाधिक प्रभाव उनके पारिवारिक जीवन पर पड़ता है खेती के संकट से उनकी रोज़ी-रोटी, परिवार का गुज़ारा और खाने की सुरक्षा को सीधा खतरा होता है. खेती के काम में ज़रूरी योगदान देने वाले होने के नाते, वे आर्थिक तंगी, पुरुष किसानों में आत्महत्या की ऊँची दर और अपनी कोशिशों को पहचान न मिलने को लेकर गहरा गुस्सा महसूस करती हैं. इन आंदोलनों में उनकी भागीदारी पुरुष-प्रधान सोच को चुनौती देती है और किसानों के तौर पर उनकी पहचान को मज़बूत करती है.
इसके अलावा, उनके शामिल होने से आंदोलन की मांगों का दायरा बढ़ा है और इसमें ज़मीनहीन महिलाओं के लिए ज़मीन के अधिकार, खेती के काम करने वाले मज़दूरों के लिए गारंटी वाली कम से कम मज़दूरी और समान वेतन जैसे ज़रूरी मुद्दे शामिल हो गए हैं. यह बदलाव ग्रामीण इलाकों में वकालत के अंदर जेंडर के डायनामिक्स को पूरी तरह से बदल देता है। इसलिए महिला किसान और खेतिहर मज़दूर भी किसान आंदोलनों में हिस्सा लेती हैं.
महिला किसान संगठन:
भारत में प्रथम महिला किसान संगठन किसानिन सभा( “किसान देवी की सभा” (किसान महिला संघ)की स्थापना 19 फरवरी, 1925को हुई.19 फरवरी,1925 को प्रतापगढ़(अवध) में एक सर्वमहिला सम्मेलन आयोजित किया गया .यह पूरी तरह से महिलाओं का प्रथम सम्मेलन था तथा इसकी अध्यक्षता जय कुमारी ने की थी. ओडिशा में ‘उत्कल प्रांतीय किसान सभा’ की संस्थापक- मालती चौधरी ),श्रीमती यमुना(जमुना)कारजी (अध्यक्ष, किसान सभा), सन्1942 में महिला संगठन महिला आत्म रक्षा समिति सन्1942 (वूमेन सेल्फ डिफेंस लीग सन्1942) तथा “नारी वाहिनी की स्थापना की गई.
गुमनाम किसान नायिकाएँ::
जय कुमारी (महिला किसान संगठन किसानिन सभा(19 फरवरी,1925)}, मालती चौधरी (ओडिशा में ‘उत्कल प्रांतीय किसान सभा’ की संस्थापक-), श्रीमती यमुना(जमुना)कारजी, (अध्यक्ष, किसान सभा), तेभागा किसान आंदोलन (सन् 1946- सन् 1947)में बिमला माझी, इला मित्रा, मनी कुंतल सेन, रेणु चक्रवर्ती इत्यादि का नाम उल्लेखनीय हैं. परंतु इन सब में सर्वाधिक प्रसिद्ध महिला बिमला माझी हैं. बिमला माझी को पुलिस के द्वारा घेर लिया गया और एक महीने तक उन्हें पिंजरे में तब तक बंद रखा जब तक उन पर 140 मुकदमें दायर नहीं हुए. इन मुकदमों में बिमला माझी को ढाई वर्ष की जेल की सजा मिली. बिमला माझी किसान आंदोलन का एक अलग महान उदाहरण हैं.तेभाग आंदोलन में महिलाओं की अग्रणीय भूमिका रही है.
तेलंगाना किसान आंदोलन (सन्1946- सन्1951) में चित्याला एलम्मा , सुनीति चौधरी, बीना दास, दुर्गा देवी, प्रतिभा वाडेदार, लछम्मा जमालुनिस्सा बेगम’, बेली ललिता इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं. बेली ललिता तेलंगाना प्रतिरोध की ‘कोकिला’ के रूप प्रसिद्ध है.इनके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ भूमिका अदा करने वाली महिलाओं में मल्लू स्वराज्यम (आंध्र महासभा से संबंधित), पद्मा देशपांडे( नवयुवक मंडल से संबंधित), एन.सत्यवती (आंध्र युवती मंडली से संबंधित) ,जशोदाबेन (नवजीवन मंडली से संबंधित) कांग्रेस पार्टी की नेत्री पद्मजा नायडू इत्यादि महिलाओं ने पुरुषों और महिलाओं को शोषण और अत्याचार के विरुद्ध लामबंद करने में अभूतपूर्व भूमिका अदा की है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवाद)महिला नेताओं में प्रमुख
सुशीतल राय चौधरी(Sushital Ray Chowdhury), नर्मदा अक्का (केंद्रीय समिति), अनुराधा गांधी (Anuradha Ghandy-सिद्धांतकार) और गुम्मादिवेल्ली रेणुका(चैते) (गुरिल्ला युद्ध में भूमिका और एक लेखिका), अरुणा( आंध्र-ओडिशा विशेष क्षेत्रीय समिति की एक वरिष्ठ नेता), तथा मादी सुकांति और कौशल्या खिला , सुंदरी (छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की पूर्व खूंखार नक्सली ) प्रमुख हैं.
किसान आन्दोलन: महिलाओं की भूमिका:
भारत में राष्ट्रीय आंदोलन तथा उपनिवेशवाद विरोधी सशस्त्र आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है. 20वीं सदी के पहले आधे हिस्से में हुए जाने-माने किसान आंदोलनों में ताना आंदोलन (1912-1914), बिजोलिया किसान आंदोलन (1924), बारडोली किसान आंदोलन (जून 1928), वर्ली आदिवासी किसान आंदोलन (1945), तेभागा किसान आंदोलन (1946-1947), और तेलंगाना हथियारबंद किसान आंदोलन (1946) शामिल हैं। 1951 से किसान आंदोलनों, नक्सली आंदोलन (19 मई, 1967 से अब तक), किसान आंदोलन (2020-2021) और ऑल इंडिया किसान सभा, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले अलग-अलग किसान आंदोलनों में महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई है.
तेभागा (1946-47), तेलंगाना (1946-51) और नक्सलवादी (1967 के बाद) आंदोलन में महिलाओं की भूमिका: अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष
A. तेभागा किसान आंदोलन में महिलाओं की अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष दो प्रकार की भूमिका है:
प्रथम, अप्रत्यक्ष रूप में प्रारंभ में इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका गौण तथा सहायक के रूप में रही है. महिलाओं के द्वारा किए गए कार्यों में फसलों की कटाई में ग्रामीण महिलाओं मदद करना व उनका विश्वास जीतना, नेताओं के लिए खाना बनाना, पहरेदारी करना, खतरे की स्थिति में अलार्म बजाना इत्यादि मुख्य हैं.
द्वितीय, प्रत्यक्ष रूप में कार्य और समय उजागर हुए जब कम्युनिस्ट पार्टी का पुरुष नेतृत्व सशस्त्र आंदोलन करने से संकोच कर रहा था. महिलाओं ने दृढ़ निश्चय करके आंदोलन की कमान सम्भाली. महिलाओं ने इस आंदोलन में लाल झंडे, झाड़ू ,मिर्ची पाउडर तथा कृषि व ऱसोई उपकरणों का प्रयोग शस्त्रों के रूप में किया. जब स्थानीय पुलिस तथा जमींदारों के पैरा-मलिशिया के द्वारा संघर्षरत किसानों को घेर लिया तो महिला मलिशिया (महिला दस्तों) संख्या की अधिक होने कारण उन्हें खदेड़ दिया गया. इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं.
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B. तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी
तेभागा आंदोलन की भांति तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप में रही है.
प्राथमिक चरण में महिलाओं की भागीदारी अप्रत्यक्ष थी .महिलाओं को संघर्ष की रणनीति के संबंध में नीति निर्माण करने का अथवा परिवर्तन करने में उनकी सहभागिता लगभग ना के बराबर थी .परंतु जब परिवार के पुरुष सदस्य –महिलाओं के पति, बुजुर्ग, बेटे एवं युवा वर्ग पुलिस के अत्याचारों के भय के कारण घर परिवारों को छोड़कर जंगलों में जाकर गुरिल्ला दस्तों में शामिल हो गए .यद्यपि उस समय भी कुछ युवा महिलाएं गुरिल्ला दस्तों में हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेकर पुरुषों के साथ मिलकर गुरिल्ला युद्ध में भाग ले रही थी. परंतु पुरुषों के गांवों छोड़कर गुरिल्ला दस्तों में सम्मलित होने के पश्चात गांवों, घरों, जमीन, फसलों, पशुओं व अपनी गरिमा की सुरक्षा करने का कार्य महिलाओं को करना पड़ा परिणाम स्वरूप महिलाओं की भूमिका में एकदम अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया. वे ग्रामीण परिस्थिति एवं पुलिस, रज़ाकारों एवं सैन्य बलों के रणनीति के अनुसार अपनी रणनीतियों में परिवर्तन करती रही और स्थानीय स्तर पर आंदोलन का नेतृत्व करके वे नीति निर्माता के रूप में भी निर्णायक भूमिका में आ गई.
द्वितीय चरण में महिलाओं के द्वारा अनेक कार्य किए गए .इन में जंगलों में शिविरों में रहने वाले गुरिल्ला दस्तों के संदेशवाहक का कार्य, अपने घरों, गांव, जमीन, फसल और पशुओं की सुरक्षा करना, गुरिल्ला दस्तों की सहायता करना, उनके लिए जंगलों में भोजन और पानी की आपूर्ति करना, विश्राम एवं सुरक्षा की व्यवस्था करना, भेष बदलकर पुलिस और सैन्य बलों की गतिविधियों की निगरानी रखना और उनके संबंध में जानकारी गुरिल्ला दस्तों तक पहुंचाना इत्यादि मुख्य कार्य थे. गुरिल्ला दस्तों और पुलिस के बीच मुठभेड़ के समय महिलाओं के द्वारा आंदोलनकारियों को गुलेल चलाने के लिए पत्थरों की आपूर्ति करना भी महिलाओं का मुख्य कार्य था.ग्रामीण महिलाओं के तेभागा आंदोलन की भांति मिर्ची पाउडर, लाठियों, डंडो, झाड़ू, मुसल, चाकू, गोफन, पत्थर इत्यादि मुख्य हथियार थे. सताधारियों के अत्याचारों से बचने के लिए महिलाओं के द्वारा उनका घेराव भी कर लिया जाता था. इनके अतिरिक्त गुरिल्ला प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं के द्वारा आधुनिकतम हथियारों -बंदूक और राइफल का प्रयोग किया गया.
C.नक्सलवादी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी
मल्लरिका सिन्हा रॉय के अनुसार नक्सलवादी आंदोलन में आदिवासी गरीब किसान महिलाओं की भूमिका केवल पृष्ठभूमि और छवि की नहीं रही है. अपितु उन्होंने इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया है .नक्सलवादी महिला दस्तों के द्वारा हिंसक कृत्यों में भी भाग रही हैं. महिलाओं की भागीदारी में गोरिल्ला युद्ध की रणनीति व शैली का व्यावहारिक ज्ञान , क्रांतिकारी साथियों को अपने घरों में आश्रय देना,उनको भोजन और आराम देना, घर के बाहर सुरक्षा का पहरा देना, गांव दर –गांव जाकर महिलाओं और पुरुषों को नक्सलवादी आंदोलन का पैगाम देना, संगठित करना, आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करना, हथियारों की सप्लाई करना, गोरिल्ला युद्ध की शैली समझाना, ट्रेनिंग देना और रणनीति की व्याख्या करना, पुलिस व अर्धसैनिक बलों के साथ मुकाबला करते हुए सुरक्षा करना, नक्सलवादी युवकों के साथ जंगलों में रहकर कैंपों में ट्रेनिंग लेना व अभ्यास करना और पुलिस अथवा अर्धसैनिक बलों के विरूध पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सुरक्षा करना इत्यादि मुख्य कार्य हैं. पुलिस अथवा अर्धसैनिक बलों के द्वारा गिरफ्तार किए जाने के पश्चात पुलिस कस्टडी में नक्सलवादी महिलाओं के साथ लैंगिक हिंसा , यौन शोषण, ,अभूतपूर्व टॉर्चर व अमानवीय व्यवहार भी किया जाता है . नक्सलवादी महिलाओं की एनकाउंटर की असत्य और सत्य दोनों प्रकार की घटनाएं समाचार पत्रों की सुर्खियां भी होती हैं.
तेभागा (1946-47), तेलंगाना (1946-51) और नक्सलवादी (1967 के बाद) आंदोलनो महिलाओं के नज़रिए से : महत्वपूर्ण समानताएं
तेभागा (1946-47), तेलंगाना (1946-51) और नक्सलवादी (1967 के बाद): आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी के संबंध में महत्वपूर्ण समानताएं हैं, जो वर्ग संघर्ष और लैंगिक उत्पीड़न के परस्पर प्रभाव से प्रेरित थीं. महिलाओं के दृष्टिकोण से, इन आंदोलनों की विशेषता बड़े पैमाने पर सक्रिय भागीदारी, पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव और आर्थिक शोषण तथा पितृसत्तात्मक हिंसा दोनों का सामना करना था।:
महिलाओं के दृष्टिकोण से प्रमुख समानताएं इस प्रकार हैं:
· पहली, तीनों आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका सिर्फ़ छवि का नामोनिशान नहीं थी, बल्कि इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में सक्रिय लड़ाकू और उग्रवादी सम्पूर्ण सहभागिता शामिल थी.महिलाओं ने सहायक भूमिकाओं से आगे बढ़कर सक्रिय, अक्सर उग्रवादी भूमिकाएँ निभाईं.. तेलंगाना में, वे गुरिल्ला इकाइयों का हिस्सा थीं; तेभागा में, वे धान की रक्षा में सबसे आगे थीं; और नक्सलवादी आंदोलन में, वे कट्टरपंथी कार्रवाई में शामिल थीं.
दूसरी, तीनों आंदोलनों में, महिलाओं ने न सिर्फ़ पुरुषों का साथ दिया, बल्कि हथियारों से लैस विद्रोहों और शांतिपूर्ण रैलियों में पुरुषों के बराबर हिस्सा भी लिया.
तीसरी, महिलाओं को पुलिस की क्रूरता, हिंसा और टॉर्चर का सामना करना पड़ा. इसलिए, पुलिस की क्रूरता से बचने और अपने बच्चों को बचाने के लिए, उन्होंने सेल्फ-डिफेंस ग्रुप बनाए और गुरिल्ला ट्रेनिंग ली, और बहादुरी से पुलिस का सामना किया.
· चौथी, तीनों ही आंदोलन सामंतवादी व जमींदारी व्यस्थाओं के खिलाफ थे .तेलंगाना आंदोलन ज़मींदारों और सामंतों द्वारा जबरन श्रम (तेलंगाना में) और महिलाओं के यौन शोषण शोषण शोषण के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष था
पांचवीं, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, शोषण और आत्मरक्षा,मान सम्मान व नाना प्रकार अन्याय ने उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया.
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छठी ,इन तीनोंआंदोलनों में महिलाओं ने पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं , घरेलू हिंसा, लैगिक हिंसा , यौन शोषण ,शराबखोरी तथा अन्य महिला विरोधी परम्पराओं को चुनौती दी. परन्तु पितृसत्तामक व्यवस्था की जडे़ इतनी गहरी हैं जो आज तक भी जारी हैं
सातवीं,, इन तीनों आंदोलनों में, महिलाओं ने ज़मीन के अधिकार, “लैंड टू टिल्लर’ ,और पुरूषों के बराबर मज़दूरी के लिए लड़ाई लड़ी.
आठवीं , ग्रामीण, आदिवासी और निम्न जाति की महिलाओं लामबंदी व सक्रिय सहभागिता के कारण यह तीनों जन संघर्ष व जन आंदोलनों में मे परिवर्तित हो गए,
संक्षेप में तीनों आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी के संबंध में महत्वपूर्ण समानताएं हैं, जो वर्ग संघर्ष और लैंगिक उत्पीड़न के परस्पर प्रभाव से प्रेरित थीं. महिलाओं के दृष्टिकोण से, इन आंदोलनों की विशेषता बड़े पैमाने पर सक्रिय भागीदारी, पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव और आर्थिक शोषण तथा पितृसत्तात्मक हिंसा दोनों का सामना करना था. इन आंदोलनों की समृद्ध विरासत ने कुछ राज्यों में ज़मींदारी व्यवस्था को खत्म किया और भूमि सुधार कानून बनाए, और भविष्य के किसान आंदोलनों के लिए नींव रखी और सामाजिक बदलाव के पथ को प्रशस्त किया.
D.सन् 2020 -सन् 2021 का राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन: सन् 2020 -सन् 2021
कोरोना काल की पृष्ठभूमि में भारत सरकार के द्वारा 5 जून 2020 को तीन अध्यादेश राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के पश्चात असाधारण राजपत्र में प्रकाशित किए गए . भारत सरकार के द्वारा इनको संसद की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया गया. संसद की स्वीकृति व राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के पश्चात यह अध्यादेश अधिनियम बन गए: यह अधिनियम निम्नलिखित हैं:
1. आवश्यक वस्तु अधिनियम 1 अप्रैल 1955 (संशोधन ) , अधिनियम 2020,
2. किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा)), अधिनियम 2020,
3.कृषि उत्पाद मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान अनुबंध( सशक्तिकरण एवं सुरक्षा), अधिनियम 2020.
यह तीनों कृषि कानून 27 सितंबर 2020 को लागू हो गए. जनता में निराशा, हताशा, और भय का वातावरण था. संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में सन् 2020 -सन् 2021 का राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन चलाया गया और इनको काले कानून कह कर आलोचना की. इनको ‘फसल और नस्ल’ के लिए खतरनाक माना गया. 378 दिन तक निरंतर शांतिपूर्ण चलने वाले ऐतिहासिक किसान आंदोलन लगभग 750 किसान शहीद हुए.परिणामस्वरूप भारत सरकार की चूलें हिल गई तथा राजनीतिक जमीन खिसकने से चुनावी भविष्य खतरे नजर आने लगा तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर 2021 को (गुरु पर्व प्रकाश उत्सव के दिन) को तीन कृषि कानूनों को को निरस्त करने की घोषणा की. लघु संकीर्णताओं की दीवार तोड़ने वाला स्वतंत्र भारत का यह पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन है .किसान आंदोलन में लगभग 750 किसानों की कुर्बानी ने भारतीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया है . इसके अतिरिक्त इस आंदोलन ने जनता में अभूतपूर्व जागरूकता उत्पन्न की. अंत: किसान आंदोलन लोक शक्ति की राजशक्ति पर अभूतपूर्व विजय है.
किसान आंदोलन सन् 2020-सन् 2021 : महिलाओं की भूमिका:
पंजाब में” जेल भरो आंदोलन” के समय आश्चर्यजनक किंतु सत्य बात तो यह है कि दो चार -चार साल की बच्चियों तथा एक 6 साल की बच्ची ने जेल भरो आंदोलन में भाग लिया . इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की है. जब परिवार के पुरुष रैलियों, धरनों तथा प्रदर्शनों में भाग ले रहे थे तो महिलाओं ने घर, परिवार, कृषि और पशुओं की देखभाल जिस तरीके से की इसे हम महिलाओं की वास्तविक आत्मनिर्भरता,आत्म सम्मान, स्वाभिमान और महिला सशक्तिकरण की विशिष्ट पराकाष्ठा मानते हैं .महिलाओं ने ट्रैक्टरों ,ट्रैक्टर ट्रालियों, कारों,स्कूट्रों व मोटर साइकिलों, को स्वंय चला कर रैलियों व धरना स्थलों पर पंहुची व पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर भाग लिया.महिलाओं ने धरना स्थलों पर लंगर सेवाएं प्रदान की और महिला किसान दिवस जैसे अवसरों पर महिलाओं ने आंदोलन की कमान अपने हाथ में ली और मंचों केसंचालन ले कर दिन-रात पहरा भी दिया. इस आंदोलन में महिलाएंअपनी अपनी स्थानीय भाषाओं में गीत गाते हुए व नाचते हुए भाग ले रही थी जैसेकि किसी तीज त्यौहार, सांस्कृतिक समारोहों व शादियों में भाग लेती हैं .जब पुरूष कुर्बानी दे रहे थे उनका खून भी खोल रहा था औरतें कैसे पीछे रह सकती थीं?. लगभग378 दिन चलने वाले इस आंदोलन में समस्त भारत में महिला विरोधी एक घटना को छोड़कर कर कोई अप्रिय घटना हीं हुई हमारा मानना है कि आंदोलन में महिलाएं घर सेअधिक सुरक्षित रही हैं. महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने लैंगिक, धर्म, जाति.क्षेत्र और भाषा की सीमाओं को तोड़कर एक नई चेतना पैदा करने का सार्थक प्रयास किया और पुरुष किसानों की यह सोच बदल दी कि महिलाओं के योगदान को कम नहीं आंकना चाहिए.
महिला किसान नेता:
यह किसान आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्व में चलाया गया था, जिसमें पुरुष सदस्यों का दबदबा था. इसके बावजूद भी, महिलाएं नेता और आंदोलन की पहचान बनकर उभरीं.प्रमुख महिला किसान नेताओं में कविथा कुरुगंती, वीरा सिंधु पाल, सुखविंदर कौर मान, गुरप्रीत कौर रंधावा और मोहिंदर कौर हैं महिला किसान अधिकार मंच की लीडर मोहिंदर कौर (बठिंडा—पंजाब) ने कंगना रनौत (कांगड़ा से BJP MP) के खिलाफ बठिंडा कोर्ट में मानहानि का केस किया है.
महिला किसान नेताओं ने सामूहिक रसोई,, लीगल-एड डेस्क और मेडिकल सहायता समायोजन किया, महिलाओं को आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए इकट्ठा किया,धरने, जुलूस और प्रोटेस्ट मार्च मे भाग लेने केलिए प्रेरित करने हेतु सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया . 26 जुलाई 2021 को लगभग 200 महिला किसानों के एक ग्रुप ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहली बार ऑल किसान महिला संसद का आयोजन किया. महिला किसान संसद (विशेषकर 2021 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान) में उठाए गए प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:भूमि स्वामित्व और पहचान का अभाव,वेतन मेंअसमानता , समान कार्य के लिए समान वेतन,निर्णय लेने में भागीदारी की कमी,तकनीकी और संस्थागत बाधाएँ , घरेलू कार्यों, कृषि कार्यों व पशुपालन संबंधी कार्यो के तीहरे बोझ के कारण शारीरिक और मानसिक चुनौती,जलवायु और आर्थिक संकट की चुनौती भूमि में हक (land title), क्रेडिट तक पहुंच . महिला किसान नेताओं ने नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया को भी निरन्तर संबोधित किया.
अंत में, महिलाओं की भूमिकाओं को पुनर्परिभाषित किया गया तथा वे 20 वीं शताब्दी से निष्क्रिय व छाया भागीदारी की अपेक्षा प्रत्यक्ष भागीदारी के कारण किसान महिलाओं को लामबंद करने ,संगठित करने व नेतृत्व करने में आत्मनिर्भर हो कर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. महिला किसानों ने आत्मनिर्भरता, अधिक वित्तीय स्वतंत्रता और अपनी सक्रिय भागीदारी की मांग की है.भारत में, 20वीं सदी और इस सदी में महिला किसान आंदोलन और दूसरे महिला आंदोलनों की वजह से, महिलाओं के लिए कानून, नीतियां और योजनाएं बनीं और एजुकेशनल, आर्थिक और राजनीतिक मज़बूती पक्की करने के लिए संविधान में भी बदलाव किए गए. सन् 2020-सन्2021के राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन में किसान महिलाओं और खेतिहर मज़दूर महिलाओं की भागीदारी ने शांतिपूर्ण क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया, क्योंकि प्रजातंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है.

