मास्टर सतबीर सिंह भैंसवालिया : हरियाणवी लोक गायन व संस्कृति के ‘ किशोर कुमार ‘
मनजीत सिंह सहायक प्रोफेसर उर्दू कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र (गांव भावड सोनीपत)
मास्टर सतबीर सिंह भैंसवालिया हरियाणा की लोक संस्कृति में अपने आप में एक समृद्ध विरासत है। वह हरियाणा के किशोर कुमार कह सकतें हैं उन्होंने हमेशा साफ सुथरा गाया। इसकी की रागनी, सांग, लोकसंगीत सदियों से लोगों के मनोरंजन और सामाजिक जागरूकता का माध्यम रहे हैं। हरियाणवी संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाने में अनेक लोक कलाकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन महान कलाकारों में मास्टर सतबीर सिंह का नाम अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी मधुर आवाज़, सरल व्यक्तित्व और लोककला के प्रति समर्पण से हरियाणवी रागनी को नई पहचान दिलाई। वे केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि हरियाणा की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक थे।
प्रारम्भिक जीवन
मास्टर सतबीर सिंह का जन्म 13 अप्रैल 1951 को हरियाणा के सोनीपत जिले के एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ। उनका बचपन गाँव के सामान्य वातावरण में बीता। ग्रामीण जीवन की सादगी, खेत-खलिहान, चौपाल और लोकगीतों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। बचपन से ही उन्हें संगीत सुनने और गाने का शौक था। गाँव में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों में वे बढ़-चढ़कर भाग लेते थे।
उस समय हरियाणा में रागनी और सांग की परंपरा लोगों के मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करती थी। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी लोक कलाकारों को बड़े उत्साह से सुनते थे। सतबीर सिंह भी इन कार्यक्रमों से बहुत प्रभावित हुए और धीरे-धीरे उनकी रुचि लोकगायन की ओर बढ़ती चली गई। परिवार आर्थिक रूप से अधिक संपन्न नहीं था, लेकिन उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी कला साधना जारी रखी।
संगीत के प्रति लगाव
संगीत के प्रति उनका प्रेम बचपन से ही स्पष्ट दिखाई देने लगा था। वे गाँव की चौपालों में होने वाली रागनियों को बड़े ध्यान से सुनते और उन्हें याद करने का प्रयास करते थे। उनकी आवाज़ में स्वाभाविक मिठास थी, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। धीरे-धीरे उन्होंने लोकधुनों और रागनियों का अभ्यास शुरू कर दिया।
उनकी गायकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे गीतों को केवल गाते ही नहीं थे, बल्कि उन्हें पूरी आत्मा से प्रस्तुत करते थे। उनके शब्दों में सच्चाई और भावनाओं में गहराई होती थी। यही कारण था कि श्रोता उनकी रागनियों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।
रागनी जगत में प्रवेश
सन 1971 में मास्टर सतबीर सिंह ने रागनी मंच पर अपनी सक्रिय पहचान बनानी शुरू की। उस समय हरियाणा में अनेक प्रसिद्ध रागनी गायक मौजूद थे, लेकिन सतबीर सिंह ने अपनी अलग शैली और प्रभावशाली प्रस्तुति से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी आवाज़ में मिठास, शब्दों में स्पष्टता और प्रस्तुति में आत्मविश्वास दिखाई देता था।
उन्होंने गाँव-गाँव जाकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया। मेलों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी रागनियों की विशेष मांग रहती थी। उनकी लोकप्रियता धीरे-धीरे पूरे हरियाणा में फैलने लगी। लोग दूर-दूर से उनकी रागनी सुनने आते थे। उनके द्वारा गाए गए किस्से ,किस्सा पिंगला भरथरी, नौ रत्न,किस्सा जैमल फत्ता,किस्सा नल दमयंती,किस्सा सेठ ताराचंद,किस्सा वीर विक्रमाजीत (खाण्डेराव),किस्सा पद्मावत,किस्सा भक्त पूरणमल, ताराचंद,बणदेबी, ब्रह्मज्ञान, आदि मशहूर हैं।
गायकी की विशेषताएँ
मास्टर सतबीर सिंह की गायकी में हरियाणा की मिट्टी की खुशबू महसूस होती थी। उनकी रागनियाँ समाज की वास्तविकताओं को दर्शाती थीं। वे अपनी कला के माध्यम से सामाजिक संदेश भी देते थे। उनकी रचनाओं में भाईचारा, नैतिकता, परिवार, समाज और संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी।
हरियाणवी संस्कृति के संवाहक
मास्टर सतबीर सिंह ने हरियाणवी बोली और संस्कृति को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उस समय आधुनिकता के प्रभाव के कारण लोककलाओं का महत्व धीरे-धीरे कम हो रहा था। ऐसे समय में उन्होंने लोकगीतों और रागनियों को जीवित रखने का कार्य किया।
उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को हरियाणवी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी रागनियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं थीं, बल्कि वे सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम भी थीं। उनके गीतों में ग्रामीण जीवन की सादगी, किसानों की मेहनत और समाज की परंपराओं का जीवंत चित्रण मिलता है।
लोकप्रिय रागनियाँ और मंचीय सफलता
मास्टर सतबीर सिंह की अनेक रागनियाँ लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुईं। उनकी आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि लोग घंटों तक उन्हें सुनते रहते थे। उन्होंने हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में भी अपनी प्रस्तुतियाँ दीं और हरियाणवी लोककला का प्रचार किया।
उनकी मंचीय उपस्थिति बहुत प्रभावशाली होती थी। वे श्रोताओं के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर लेते थे। मंच पर उनका आत्मविश्वास और सरल व्यवहार लोगों को प्रभावित करता था। उनकी रागनियाँ आज भी लोकसंगीत प्रेमियों द्वारा बड़े उत्साह से सुनी जाती हैं।
संघर्ष और सादगी
सफलता प्राप्त करने के बावजूद मास्टर सतबीर सिंह ने कभी घमंड नहीं किया। वे अत्यंत सरल और विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को निरंतर आगे बढ़ाया।
उनका जीवन संघर्ष, मेहनत और समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि व्यक्ति में प्रतिभा और लगन हो, तो वह कठिन परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज के समय में जब आधुनिक संगीत का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, तब भी मास्टर सतबीर सिंह की रागनियाँ लोगों के दिलों में जीवित हैं। नई पीढ़ी उनके गीतों से प्रेरणा लेती है। वे हरियाणवी लोकसंगीत के उन कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी कला से अमिट छाप छोड़ी।
उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि जीवन के मूल्य भी सिखाती हैं। उनके गीतों में सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक गौरव की भावना दिखाई देती है। यही कारण है कि उन्हें हरियाणा की लोकधरोहर का अमूल्य रत्न माना जाता है।
निधन और अमर योगदान
मास्टर सतबीर सिंह का निधन हरियाणवी लोकसंगीत जगत के लिए एक बड़ी क्षति था। उनके जाने से लोककला जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ जिसे भर पाना कठिन है। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रागनियाँ और उनका योगदान सदैव अमर रहेंगे।
उनकी आवाज़ आज भी लोगों के दिलों में गूँजती है। गाँवों की चौपालों, सांस्कृतिक आयोजनों और लोकसंगीत के मंचों पर आज भी उनकी रचनाएँ सुनाई देती हैं। उन्होंने हरियाणवी संस्कृति को जो पहचान दिलाई, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
मास्टर सतबीर सिंह हरियाणा की लोकसंस्कृति के ऐसे महान कलाकार थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोककला की सेवा में समर्पित कर दी। उन्होंने अपनी गायकी से हरियाणवी रागनी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और समाज को संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया। उनकी सादगी, संघर्ष और कला के प्रति समर्पण उन्हें एक महान व्यक्तित्व बनाते हैं।
हरियाणवी लोकसंगीत के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, संस्कृति और लोककला के प्रतीक बनकर सदैव याद किए जाते रहेंगे।

लेखक – मनजीत सिंह
